ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 32/ मन्त्र 19
दश॑ ते क॒लशा॑नां॒ हिर॑ण्यानामधीमहि। भू॒रि॒दा अ॑सि वृत्रहन् ॥१९॥
स्वर सहित पद पाठदश॑ । ते॒ । क॒लशा॑नाम् । हिर॑ण्यानाम् । अ॒धी॒म॒हि॒ । भू॒रि॒ऽदाः । अ॒सि॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् ॥
स्वर रहित मन्त्र
दश ते कलशानां हिरण्यानामधीमहि। भूरिदा असि वृत्रहन् ॥१९॥
स्वर रहित पद पाठदश। ते। कलशानाम्। हिरण्यानाम्। अधीमहि। भूरिऽदाः। असि। वृत्रऽहन् ॥१९॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 32; मन्त्र » 19
अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 3
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अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे वृत्रहन् ! यतस्त्वं भूरिदा असि तस्मात्ते हिरण्यानां कलशानां दशाधीमहि ॥१९॥
पदार्थः
(दश) (ते) तव (कलशानाम्) घटानाम् (हिरण्यानाम्) (अधीमहि) प्राप्नुयाम (भूरिदाः) बहूनां दाता (असि) (वृत्रहन्) शत्रुहन्ता ॥१९॥
भावार्थः
यो मनुष्यो बहुप्रदो भवति तस्य मित्राणि बहूनि जायन्ते ॥१९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (वृत्रहन्) शत्रुओं के नाश करनेवाले ! जिससे आप (भूरिदाः) बहुतों के देनेवाले (असि) हो इससे (ते) आपके (हिरण्यानाम्) सुवर्ण के बने हुए (कलशानाम्) घटों के (दश) दशसंख्यायुक्त समूह को हम लोग (अधीमहि) प्राप्त होवें ॥१९॥
भावार्थ
जो मनुष्य बहुत देनेवाला होता है, उसके मित्र बहुत होते हैं ॥१९॥
विषय
दश 'हिरण्य कलश'
पदार्थ
[१] प्रस्तुत ऋग्वेद के दस मण्डल मानो दस कलश हैं, जो कि हितरमणीय ज्ञानजल से परिपूर्ण हैं। हे प्रभो! हम ते आपके इन दश-दस (हिरण्यानाम्) = हितरमणीय ज्ञान-जल से परिपूर्ण कलशानाम्-कलशों का घटों का अधीमहि स्मरण करते हैं इन्हें धारण करने का प्रयत्न करते हैं। इनके धारण से हमारे जीवन में प्राण श्रधा आदि सब कलाओं का उत्तम निवास होगा 'कला: शेरते अस्मिन्' । [२] हे वृत्रहन्- सब वासनाओं को विनष्ट करनेवाले प्रभो! आप निश्चय से भूरिदाः = अत्यन्त देनेवाले असि-हैं। 'भूरि' = जीवन पालन व पोषण के लिए आवश्यक सब वस्तुओं के देनेवाले हैं। इस वेदज्ञान से हमारा जीवन सब कलाओं से परिपूर्ण हो जाता है।
भावार्थ
भावार्थ- हम दश हिरण्य-कलशों का धारण करें।
विषय
राजा सेनापति के प्रति प्रजा की नाना प्रार्थनाएं और और आकाक्षाएं । और राजा के कर्त्तव्य । पक्षान्तर में आचार्य के कर्त्तव्य । राजा से रक्षा, धन, ज्ञान, न्याय आदि की प्रार्थना ।
भावार्थ
हे (वृत्रहन्) विघ्नकारी, बढ़ते शत्रु, विघ्नों और अज्ञानों को नाश करने हारे ! राजन् एवं विद्वन् ! तू (भूरिदाः असि) बहुत देनेहारा है । (ते) तेरे (हिरण्यानां) हित और रमणीय, धनपूर्ण (कलशानां दश) दश कलशों के सदृश हितकारी मनोहर वेदवाणियों, दश मण्डलों को हम (अधीमहि) धारण करें, स्वाध्याय कर मनन और चिन्तन करें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः ॥ १—२२ इन्द्रः । २३, २४ इन्द्राश्वौ देवते ॥ १, ८,९, १०, १४, १६, १८, २२, २३ गायत्री । २, ४, ७ विराङ्गायत्री । ३, ५, ६, १२, १३, १५, १६, २०, २१ निचृद्गायत्री । ११ पिपीलिकामध्या गायत्री । १७ पादनिचृद्गायत्री । २४ स्वराडार्ची गायत्री ॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
जो माणूस दानी असतो त्याचे मित्र खूप असतात. ॥ १९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
We study, research and produce tens of jars of liquid gold. Destroyer of ignorance and poverty, you are the giver and creator of unbounded wealth.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The relations between a ruler and wealthy men on one side, and teachers and preachers on the other side are narrated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O ruler! you finish your enemies and with the exploits give away money to the teachers and preachers. Let us receive tens of pitchers full of golden coins.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
One who is a philanthropist and gives plenty to others, such a ruler of rich person earns the friendship of several other persons.
Foot Notes
(कलशानाम् ) घटानाम् । = Of the pitchers. (हिरण्यानाम् ) स्वर्ण निर्मितानाम्ः । = Made of gold. (दस) अनेके दशसंख्याकाः । = Several tens. (वृत्तहत् ) शत्रुहन्ता । = One who finishes his enemies.
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