ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 32/ मन्त्र 17
ऋषिः - वामदेवो गौतमः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - पादनिचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
स॒हस्रं॒ व्यती॑नां यु॒क्ताना॒मिन्द्र॑मीमहे। श॒तं सोम॑स्य खा॒र्यः॑ ॥१७॥
स्वर सहित पद पाठस॒हस्र॑म् । व्यती॑नाम् । यु॒क्ताना॑म् । इन्द्र॑म् । ई॒म॒हे॒ । श॒तम् । सोम॑स्य । खा॒र्यः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
सहस्रं व्यतीनां युक्तानामिन्द्रमीमहे। शतं सोमस्य खार्यः ॥१७॥
स्वर रहित पद पाठसहस्रम्। व्यतीनाम्। युक्तानाम्। इन्द्रम्। ईमहे। शतम्। सोमस्य। खार्यः ॥१७॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 32; मन्त्र » 17
अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 1
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अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे धनाढ्य ! व्यतीनां युक्तानां सहस्रं सोमस्य खार्यः शतं सन्ति ता इन्द्रं प्राप्येमहे ॥१७॥
पदार्थः
(सहस्रम्) (व्यतीनाम्) गमनकर्तॄणाम् (युक्तानाम्) समाहितानाम् (इन्द्रम्) दुष्टदर्त्तारं राजानम् (ईमहे) याचामहे (शतम्) (सोमस्य) धान्याद्यैश्वर्यस्य (खार्यः) एतत्परिमाणमितान्यन्नादीनि ॥१७॥
भावार्थः
ये धनाढ्यान् प्राप्यासंख्यान् पदार्थान् याचन्ते ते स्वल्पं लभन्ते ये च न याचन्ते ते बहु प्राप्नुवन्ति ॥१७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे धनाढ्य पुरुष (व्यतीनाम्) गमन करनेवाले (युक्तानाम्) उत्तम प्रकार सावधान चित्त हुए जनों का (सहस्रम्) एक सहस्र और (सोमस्य) धान्य आदि ऐश्वर्य की (खार्यः, शतम्) सौ खारी अर्थात् सौ मन तुले हुए अन्न आदि पदार्थ हैं उनकी (इन्द्रम्) दुष्टों को नाश करनेवाले राजा को प्राप्त होकर (ईमहे) याचना करते हैं ॥१७॥
भावार्थ
जो धनाढ्य जनों को प्राप्त होकर असङ्ख्य पदार्थों की याचना करते हैं, वे थोड़ा पाते हैं और जो याचना नहीं करते हैं, वे बहुत पाते हैं ॥१७॥
विषय
'शतं सोमस्य खार्य:'
पदार्थ
[१] हम (व्यतीनाम्) = [वि-अत् गतौ] विशिष्ट गतिवाले (सहस्त्रं युजानाम्) = शरीर रथ में सदा आनन्दपूर्वक जुते हुए इन्द्रियाश्वों को (इन्द्रम्) = उस इन्द्रियों के अधिष्ठाता प्रभु से (ईमहे) = माँगते हैं। प्रभु हमारे लिए उन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराएँ, जो कि प्रसन्नतापूर्वक कार्यों में तत्पर रहें । कर्मेन्द्रिय रूप अश्व यज्ञमार्ग का प्रसन्नतापूर्वक आक्रमण करें और ज्ञानेन्द्रियरूप अश्व ज्ञानप्राप्ति के मार्ग पर आगे और आगे बढ़ते चलें । [२] इस प्रकार अपने-अपने कर्म में लगी हुई इन्द्रियाँ विषयों से अनाक्रान्त रहती हैं और शरीर में सोम का रक्षण होता है। हम प्रभु से (सोमस्य) = इस सोम के [वीर्यशक्ति के] (शतं खार्य:) = सैंकड़ों मनों को चाहते हैं। हमें बहुत ही इस सोमशक्ति की प्राप्ति हो ।
भावार्थ
भावार्थ- हमारी इन्द्रियाँ सदा अपने-अपने कार्य में लगी रहें और हमारे शरीर में सोमशक्ति सुरक्षित रहे।
विषय
राजा सेनापति के प्रति प्रजा की नाना प्रार्थनाएं और और आकाक्षाएं । और राजा के कर्त्तव्य । पक्षान्तर में आचार्य के कर्त्तव्य । राजा से रक्षा, धन, ज्ञान, न्याय आदि की प्रार्थना ।
भावार्थ
हम (युक्तानां) जुते हुए (व्यतीनां) विशेष वेग से जाने वाले अश्वों और नियुक्त वेतन पर रक्खी रक्षा करने वाली सेनाओं, भोगादि प्राप्त करने वाली प्रजाओं के बीच (सहस्रं) सर्व सहनशील, बलवान् (इन्द्रम्) ऐश्वर्यवान् राजा या राज्य की हम (ईमहे) याचना करते हैं कि (सोमस्य) ओषधि अन्नादि के (खार्यः शतं) सैकड़ों मन हमें: प्राप्त हों ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः ॥ १—२२ इन्द्रः । २३, २४ इन्द्राश्वौ देवते ॥ १, ८,९, १०, १४, १६, १८, २२, २३ गायत्री । २, ४, ७ विराङ्गायत्री । ३, ५, ६, १२, १३, १५, १६, २०, २१ निचृद्गायत्री । ११ पिपीलिकामध्या गायत्री । १७ पादनिचृद्गायत्री । २४ स्वराडार्ची गायत्री ॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
जे धनाढ्य लोकांजवळ असंख्य पदार्थांची याचना करतात त्यांना थोडे मिळते व जे याचना करीत नाहीत त्यांना जास्त मिळते. ॥ १७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, leader of power, pleasure and excellence, we pray for a thousand top speed generalists and a thousand intensive specialists and a hundred barrels of the soma of national excellence and celebrative joy.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The subject of teacher and preacher further continues.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
The teachers and preachers who approach a wealthy person to beg large amount of money and food grains, they hardly get any response, however, well-meaning and conscious, they may be. Likewise, the cases are decided scornfully by the ruler, when they go on begging. The moral is not be greedy by ideal persons teachers and preachers.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those who go on begging from the affluent persons and rulers, they get very little response and respect. In contrast, those who do not beg, they gain plenty.
Foot Notes
(व्यतीनाम्) गमनकर्तृणाम् । = Of those who approach. (युक्तानाम् ) समाहितानाम् = Of the well meaning in consumption. (इन्द्रम्) दुष्टहर्त्तारं राजानम् । =To the ruler who quells the rogues. (ईमहे) याचामहे । = Beg. (खायं:) एतत्परिमाणमितान्यन्नादीनि । = Plenty of food grains and materials.
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