ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 32/ मन्त्र 22
प्र ते॑ ब॒भ्रू वि॑चक्षण॒ शंसा॑मि गोषणो नपात्। माभ्यां॒ गा अनु॑ शिश्रथः ॥२२॥
स्वर सहित पद पाठप्र । ते॒ । ब॒भ्रू इति॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒ण॒ । शंसा॑मि । गो॒ऽस॒णः॒ । न॒पा॒त् । मा । आ॒भ्या॒म् । गाः । अनु॑ । शि॒श्र॒थः॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र ते बभ्रू विचक्षण शंसामि गोषणो नपात्। माभ्यां गा अनु शिश्रथः ॥२२॥
स्वर रहित पद पाठप्र। ते। बभ्रू इति। विऽचक्षण। शंसामि। गोऽसनः। नपात्। मा। आभ्याम्। गाः। अनु। शिश्रथः ॥२२॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 32; मन्त्र » 22
अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 6
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अष्टक » 3; अध्याय » 6; वर्ग » 30; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे गोषणो विचक्षण ! यौ बभ्रू अहं प्रशंसामि तौ ते शिक्षकौ स्याताम्। आभ्यां त्वं नपात् सन् गा मानु शिश्रथः ॥२२॥
पदार्थः
(प्र) (ते) तव (बभ्रू) सकलविद्याधारकावध्यापकोपदेशकौ (विचक्षण) प्राज्ञ (शंसामि) (गोषणः) यो गाः सनुते याचते तत्संबुद्धौ (नपात्) यो न पतति (मा) (आभ्याम्) सह (गाः) पृथिव्यादीन् (अनु) (शिश्रथः) श्रथ्नाति ॥२२॥
भावार्थः
हे जिज्ञासो ! त्वमध्यापकमुपदेशकं च प्राप्य पुरुषार्थेन विद्यामुपदेशञ्च सद्यो गृहाणालस्यं मा कुरु ॥२२॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (गोषणः) गौ माँगनेवाले (विचक्षण) उत्तम ज्ञाता ! जो (बभ्रू) सम्पूर्ण विद्याओं के धारण करनेवाले अध्यापक और उपदेशक की मैं (प्र, शंसामि) प्रशंसा करता हूँ वे (ते) आपके शिक्षक होवें (आभ्याम्) इनके साथ आप (नपात्) नहीं गिरनेवाले होते हुए (गाः) पृथिव्यादिकों को (मा) मत (अनु, शिश्रथः) शिथिल करते हैं ॥२२॥
भावार्थ
हे जिज्ञासु ज्ञान को चाहनेवाले ! तू अध्यापक और उपदेशक को पाकर पुरुषार्थ से विद्या और उपदेश को शीघ्र ग्रहण कर, आलस्य मत कर ॥२२॥
विषय
ज्ञानवाणियों का अहिंसन
पदार्थ
[१] हे (विचक्षण) = प्राज्ञ इन्द्र ! (ते) = आपके (बभ्रू) = इन भरण करनेवाले इन्द्रियाश्वों का (प्रशंसामि) = खूब ही शंसन करता हूँ। इन में कर्मेन्द्रियाँ हमारे जीवन में यज्ञादि उत्तम कर्मों का भरण करती हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ हमारे जीवन में ज्ञान का पोषण करती हैं, एवं ये 'बभ्रू' हैं। [२] हे (गोषण:) = ज्ञानवाणियों के देनेवाले, (नपात्) = न गिरने देनेवाले प्रभो! आप (आभ्याम्) = इन ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों से (गाः) = ज्ञानवाणियों को (मा) = मत (अनुशिश्रथः) = हिंसित करिए। इन ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हम खूब ही ज्ञानवाणियों को प्राप्त करें।
भावार्थ
भावार्थ- हमारी ज्ञान की इन्द्रियाँ ज्ञानवाणियों को हिंसित न करनेवाली हों। कर्मेन्द्रियाँ यज्ञादि कर्मों का भरण करें। इस प्रकार हम पतन से बचे रहें ।
विषय
दो आंखों के तुल्य सस्नेह रहने का राजा प्रजा वर्गों को उपदेश ।
भावार्थ
हे (विचक्षण) विशेष ज्ञान को देखने हारे ! हे (गो-सनः) वेदवाणी और पृथिवी के दान करने हारे ! हे (नपात्) स्वयं न गिरने और अन्यों को न गिरने देने हारे ! (ते) तेरे (बभ्रू) सबको भरण पोषण करने वाले विद्वान् दया शील स्त्री पुरुषों की, माता पिताओं की और अश्ववत् राष्ट्ररथ को लेजाने वालों की (प्रशंसामि) खूब प्रशंसा करता हूं तू (आभ्याम्) इन दोनों से शिक्षित होकर (गाः) वाणियों और राष्ट्र की भूमियों वा गौओं के तुल्य धनादि के देने वाली प्रजाओं के प्रति (मा अनु शिश्नथः) अपने को शिथिल मतकर । और प्रजाओं को भी शिथिल, उदासीन और स्नेहहीन मत होने दे ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः ॥ १—२२ इन्द्रः । २३, २४ इन्द्राश्वौ देवते ॥ १, ८,९, १०, १४, १६, १८, २२, २३ गायत्री । २, ४, ७ विराङ्गायत्री । ३, ५, ६, १२, १३, १५, १६, २०, २१ निचृद्गायत्री । ११ पिपीलिकामध्या गायत्री । १७ पादनिचृद्गायत्री । २४ स्वराडार्ची गायत्री ॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
हे जिज्ञासू व ज्ञानपिपासू, तू अध्यापक व उपदेशकाकडून पुरुषार्थाने विद्या व उपदेश ग्रहण कर, आळस करू नकोस. ॥ २२ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Lord of omniscience and the universal eye, giver of the Divine Word and the earth and her wealth, power and presence imperishable, I praise and celebrate your divine agencies that bear and bring us the wealth of life. Let these divinities keep it up, and allow not the earths and inspirations to slacken.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The chapter of teacher and preacher goes on.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
A seeker of knowledge states-I eulogize the teacher and preacher who ask for or request for the cow progeny and are well-versed in the knowledge and knower of all the disciplines. Your teacher should be the above the standard. In their accomplishment, you never faulter and make the land (and people) strengthened to save it from deterioration.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O seeker of knowledge! you acquire knowledge and receive sermons from the teacher and preacher with strenuous efforts. It should be fulfilled easily and no delay be allowed.
Foot Notes
(वभ्रु) सकल विद्याधारकावध्यापकोपदेशको । = The teacher and preacher holding all disciplines of learning. (विचक्षण) प्राज्ञ। = Wise man. (शंसामि) = Admire. (गोषण:) यो गाः सन्ते याचते तत्संबुद्धौ । = One who seeks the cow progeny. It is a call here to the pupils. (नपात्) यो न् पतति । = Who does not faulter. (शिश्रथः) स्रध्नाति। = Not to allow its deterioration.
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