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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 25 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 25/ मन्त्र 18
    ऋषिः - विश्वमना वैयश्वः देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - पादनिचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    परि॒ यो र॒श्मिना॑ दि॒वोऽन्ता॑न्म॒मे पृ॑थि॒व्याः । उ॒भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । यः । र॒श्मिना॑ । दि॒वः । अन्ता॑न् । म॒मे । पृ॒थि॒व्याः । उ॒भे इति॑ । आ । प॒प्रौ॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒हि॒त्वा ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि यो रश्मिना दिवोऽन्तान्ममे पृथिव्याः । उभे आ पप्रौ रोदसी महित्वा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि । यः । रश्मिना । दिवः । अन्तान् । ममे । पृथिव्याः । उभे इति । आ । पप्रौ । रोदसी इति । महित्वा ॥ ८.२५.१८

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 25; मन्त्र » 18
    अष्टक » 6; अध्याय » 2; वर्ग » 24; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Mitra, Brahmana, is the brilliant scholar who, like the sun, with his vision reaches and measures the bounds of heaven and earth and with his knowledge and grandeur traverses both earth and heaven.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो आपल्या विज्ञानाने जगावर परोपकार करतो तोच ब्राह्मण असतो. ॥१८॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    ब्राह्मणगुणान् दर्शयति ।

    पदार्थः

    यो मित्रो ब्राह्मणः । दिवः=द्युलोकस्य । पृथिव्याश्च । अन्तान्=सीम्नः । रश्मिना=विज्ञानतेजसा । परिममे= परिमिनोति । पुनः । महित्वा=ज्ञानस्य महत्त्वेन । यः । उभे+रोदसी=उभौ लोकौ । आपप्रौ=आप्राति=प्रपूरयति ज्ञानेन कर्मणा च ॥१८ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्राह्मणों के गुण दिखलाते हैं ।

    पदार्थ

    (यः) जो ब्राह्मण (दिवः+पृथिव्या+अन्तान्) द्युलोक और पृथिवी के अन्तिम सीमा को (रश्मिना) विज्ञान तेज से (परिममे) नापते हैं और (महित्वा) ज्ञान की महिमा से (उभे+रोदसी) दोनों पृथिवी और द्युलोक को ज्ञान और कर्म से (आपप्रौ) पूर्ण करते हैं ॥१८ ॥

    भावार्थ

    वही ब्राह्मण है, जो निज विज्ञान से संसार का परोपकार कर रहा है ॥१८ ॥

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    विषय

    विश्वपति वरुण, प्रकाशस्वरूप ईश्वर

    भावार्थ

    ( यः ) जो परमेश्वर ( रश्मिना ) तेजोवत व्यापक सामर्थ्य से ( दिवः पृथिव्याः अन्तान् ) आकाश और भूमि इनकी परली सीमाओं को भी ( परि ममे ) मापता है। वही ( महित्वा ) अपने महान् सामर्थ्य से ( उभे रोदसी ) आकाश और भूमि दोनों लोकों को ( आ पप्रौ ) पूर्ण करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वमना वैयश्व ऋषिः॥ १—९, १३—२४ मित्रावरुणौ। १०—१२ विश्वेदेवा देवताः॥ छन्दः—१, २, ५—९, १९ निचृदुष्णिक्। ३, १०, १३—१६, २०—२२ विराडष्णिक्। ४, ११, १२, २४ उष्णिक्। २३ आर्ची उष्णिक्। १७, १० पादनिचृदुष्णिक्॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    प्रभु की महिमा का सर्वत्र दर्शन

    पदार्थ

    [१] (य:) = जो प्रभु हैं, वे (दिवः) = द्युलोक के तथा (पृथिव्याः) = पृथिवीलोक के (अन्तान्) = अन्तों को (रश्मिना) = अपने तेज से (परिममे) = [परिमिनोति] मापते हैं, अपने प्रकाश से द्युलोक व पृथिवी- लोक के अन्तों को अवभासित करते हैं। [२] वे प्रभु (उभे रोदसी) = दोनों द्यावापृथिवी को (महित्वा) = अपनी महिमा से आपप्रौ पूरित करते हैं। इन द्यावापृथिवी में सर्वत्र प्रभु की महिमा का प्रकाश हो रहा है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु द्युलोक, पृथिवीलोक को अपने प्रकाश से प्रकाशित कर रहे हैं। इन लोकों में सर्वत्र प्रभु की महिमा का प्रकाश हो रहा है।

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