ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 35/ मन्त्र 15
ऋ॒भु॒मन्ता॑ वृषणा॒ वाज॑वन्ता म॒रुत्व॑न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव॑म् । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण चादि॒त्यैर्या॑तमश्विना ॥
स्वर सहित पद पाठऋ॒भु॒ऽमन्ता॑ । वृ॒ष॒णा॒ । वाज॑ऽवन्ता । म॒रुत्व॑न्ता । ज॒रि॒तुः । ग॒च्छ॒थः॒ । हव॑म् । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
ऋभुमन्ता वृषणा वाजवन्ता मरुत्वन्ता जरितुर्गच्छथो हवम् । सजोषसा उषसा सूर्येण चादित्यैर्यातमश्विना ॥
स्वर रहित पद पाठऋभुऽमन्ता । वृषणा । वाजऽवन्ता । मरुत्वन्ता । जरितुः । गच्छथः । हवम् । सऽजोषसौ । उषसा । सूर्येण । च । सोमम् । पिबतम् । अश्विना ॥ ८.३५.१५
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 35; मन्त्र » 15
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 3
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Ashvins, generous divinities of humanity, blest with the Rbhus, engineers, technicians and craftsmen, Vajins, pioneers moving forward at top speed, Maruts, vibrant forces of defence and protection, rise to the call of the celebrant and go forward with the Adityas, visionaries of the nation, children of mother earth, in unison with the sun and the dawn of every new day.
मराठी (1)
भावार्थ
राजाच्या प्रजेत सर्व प्रकारचे शिल्पी (कारागीर) शेतकरी व ज्ञान विज्ञानाचे उपदेशक ब्राह्मण असतात. ॥१५॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे राजानौ ! युवाम् । ऋभुमन्ता । तक्षा, लोहकारः स्वर्णकारो रथकार इत्येवंविधा व्यवसायिवर्गा ऋभव उच्यन्ते । तैर्युक्तौ स्थः । पुनः युवां वृषणा=अन्नादीनां वर्षितारौ स्थः । पुनः वाजवन्ता=ज्ञानिनौ स्थः व्याख्यातमन्यत् ॥१५ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
हे राजन् ! तथा हे मन्त्रिदल ! आप दोनों (ऋभुमन्ता) तक्षा, वरही, लोहार, सुनार, रथकार इस प्रकार के व्यवसायी पुरुषों का नाम ऋभु है, उनसे युक्त हैं । पुनः (वृषणा) अन्नादि पदार्थों की वर्षा करनेवाले हैं । पुनः (वाजवन्ता) ज्ञान-विज्ञानसंयुक्त हैं । शेष पूर्ववत् ॥१५ ॥
विषय
धर्मवान्, तेजस्वी, ज्ञानी, सत्यवान् पुरुषों के सत्संगी होकर जीवनभर व्यतीत करने का उपदेश।
भावार्थ
आप दोनों ( ऋभु-मन्ता ) सत्य ज्ञान से चमकने वाले पुरुषों से युक्त, (वृषणा) बलवान्, सुखों के दाता, ( वाजयन्ता ) ऐश्वर्य ज्ञानवान् ( मरुत्वन्ता ) प्राणों और पुरुषों के स्वामी होकर ( जरितुः हवं गच्छथः ) उपदेष्टा, विद्वान् के आह्वान वा उपदेश को प्राप्त करो। शेष पूर्ववत्। इसी प्रकार सैन्य एवं नायक भी शिल्पियों से युक्त, बलवान्, ऐश्वर्यवान् और मरने मारने वाले वीर भटों से युक्त होकर ( जरितुः ) राष्ट्र को जीर्ण करने वाले शत्रु के ( हवम् ) आह्वान, रण ललकार को प्राप्त करें ( शेष पूर्ववत् )।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्यावाश्व ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः—१—५, १६, १८ विराट् त्रिष्टुप्॥ ७–९, १३ निचृत् त्रिष्टुप्। ६, १०—१२, १४, १५, १७ भुरिक् पंक्ति:। २०, २१, २४ पंक्ति:। १९, २२ निचृत् पंक्ति:। २३ पुरस्ता- ज्ज्योतिर्नामजगती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
विषय
ऋभुमन्ता-वृषणा-वाजवन्ता
पदार्थ
[१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (ऋभुमन्ता) = ऋभुवाले हो [ऋतेन भाति] सत्यज्ञान दीत होनेवाले हो। (वृषणा) = सुखों का वर्षण करनेवाले हो और (वाजवन्ता) = प्रशस्त बलवाले हो अवशिष्ट मन्त्र भाग १३ पर द्रष्टव्य है।
भावार्थ
भावार्थ- प्राणसाधना से सत्यज्ञान, सुख तथा शक्ति प्राप्त होती है।
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