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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 35/ मन्त्र 23
    ऋषिः - श्यावाश्वः देवता - अश्विनौ छन्दः - पुरस्ताज्योतिर्नामजगती स्वरः - निषादः

    न॒मो॒वा॒के प्रस्थि॑ते अध्व॒रे न॑रा वि॒वक्ष॑णस्य पी॒तये॑ । आ या॑तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा॑म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न॒मः॒ऽवा॒के । प्रऽस्थि॑ते । अ॒ध्व॒रे । न॒रा॒ । वि॒वक्ष॑णस्य । पी॒तये॑ । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् । अ॒व॒स्युः । वा॒म् । अ॒हम् । हु॒वे॒ । ध॒त्तम् । रत्ना॑नि । दा॒शुषे॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नमोवाके प्रस्थिते अध्वरे नरा विवक्षणस्य पीतये । आ यातमश्विना गतमवस्युर्वामहं हुवे धत्तं रत्नानि दाशुषे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नमःऽवाके । प्रऽस्थिते । अध्वरे । नरा । विवक्षणस्य । पीतये । आ । यातम् । अश्विना । आ । गतम् । अवस्युः । वाम् । अहम् । हुवे । धत्तम् । रत्नानि । दाशुषे ॥ ८.३५.२३

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 35; मन्त्र » 23
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 17; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Ashvins, complementary leading powers of humanity, the yajna of love and non-violence with words of reverence and homage is begun, the soma is refreshing and overflowing, pray come to drink the soma and join the celebration. Come and come again. Praying for protection and promotion, I call upon you to come and bless the generous yajaka with the jewels of life.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    राजपुरुष सर्वांच्या हितासाठी केलेल्या सत्कर्मा(यज्ञाने) ने तृप्त होतात. त्यासाठी त्यांच्या प्रजेने निष्काम भावनेने सत्कर्मात प्रवृत्त राहावे. ॥२३॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे अश्विनौ ! नरा नेतारौ ! नमोवाके नमोवचने नमः शब्दस्य वाग् उच्चारणं यत्र तस्मिन् । अध्वरे यागे प्रस्थिते उपस्थिते प्रस्तुते सति । युवाम् । विवक्षणस्य प्रवहणशीलस्य सोमस्य पीतये । आगच्छतम् । शेषं पूर्ववत् ॥२३ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (अश्विना) हे अश्विद्द्वय (नरा) हे सर्वनेता राजन् तथा मन्त्रिदल ! (नमोवाके) जिसमें नमः शब्द का उच्चारण हो, ऐसे (अध्वरे) यज्ञ के (प्रस्थिते) प्रस्तुत होने पर आप दोनों ! (विवक्षणस्य) प्रवहणशील सोम के (पीतये) पीने के लिये (आयातम्) आवें । शेष पूर्ववत् ॥२३ ॥

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    विषय

    परस्पर आदर करो।

    भावार्थ

    हे ( अश्विना ) जितेन्द्रिय पुरुषो ! ( नरा ) हे उत्तम नायक और नेय जनो ! ( अध्वरे ) यज्ञ में (नमो-वाके प्रस्थिते) नमःयुक्त वचन प्रारम्भ होने पर ( विवक्षणस्य ) विशेष रूप से वहन करने योग्य, विशेष वचन योग्य पद या ज्ञान के (पीतये) रक्षा और पान करने के लिये आप लोग ( आयातम् ) आवें और (गतम् ) जावें। मैं ( अवस्युः ) रक्षा और ज्ञान-तृप्ति चाहता हुआ ( वां हुवे ) आप दोनों को बुलाता, प्रार्थना करता हूं, आप (दाशुषे रत्नानि धत्तम्) दानशील, आत्मसमर्पक पुरुष को उत्तम २ पदार्थ प्रदान करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः—१—५, १६, १८ विराट् त्रिष्टुप्॥ ७–९, १३ निचृत् त्रिष्टुप्। ६, १०—१२, १४, १५, १७ भुरिक् पंक्ति:। २०, २१, २४ पंक्ति:। १९, २२ निचृत् पंक्ति:। २३ पुरस्ता- ज्ज्योतिर्नामजगती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    नमस्कार-अध्वर

    पदार्थ

    [१ हे (नरा) = उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले प्राणापानो! आप (नमोवाके प्रस्थिते) = प्रभु के प्रति नमस्कार वचनों के प्रस्थित होने पर, प्रभु की प्रति नम उक्ति के करने पर तथा अध्वरे यज्ञों के होने पर (विवक्षणस्य पीतये) = विशिष्ट उन्नति के साधनभूत सोम के [ वक्ष् To grow पान के लिये प्राप्त होवो। अव]शिष्ट मन्त्र भाग २२ मन्त्र पर द्रष्टव्य है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्राणसाधना के साथ प्रभु के प्रति नमन करें तथा यज्ञात्मक कर्मों में प्रवृत्त हों । यही सोमरक्षण का मार्ग है।

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