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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 35/ मन्त्र 9
    ऋषिः - श्यावाश्वः देवता - अश्विनौ छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    श्ये॒नावि॑व पतथो ह॒व्यदा॑तये॒ सोमं॑ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तमश्विना ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    श्ये॒नौऽइ॑व । प॒त॒थः॒ । ह॒व्यऽदा॑तये । सोम॑म् । सु॒तम् । म॒हि॒षाऽइ॑व । अव॑ । ग॒च्छ॒थः॒ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    श्येनाविव पतथो हव्यदातये सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथः । सजोषसा उषसा सूर्येण च त्रिर्वर्तिर्यातमश्विना ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    श्येनौऽइव । पतथः । हव्यऽदातये । सोमम् । सुतम् । महिषाऽइव । अव । गच्छथः । सऽजोषसौ । उषसा । सूर्येण । च । सोमम् । पिबतम् । अश्विना ॥ ८.३५.९

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 35; मन्त्र » 9
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 15; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Like falcons you fly carrying holy gifts to the generous yajaka. Like veteran scholars you fly to assess the merit of our soma distilled in yajnic experiments and to anticipate its future possibilities. O twin divines united with the sun and the dawn, come thrice in the day, visit our sessions and help us to advance.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    राजा व मंत्री यांनी दानी प्रजेला अत्यंत लवकर समृद्ध करावे. ॥९॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे राजानौ ! हव्यदातये=हव्यदात्रे=दानकर्त्त्रे पुरुषाय । सुतं सोमं प्रति । श्येनौ विहगौ इव पतथो गच्छथः । व्याख्यातमन्यत् ॥९ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    हे राजन् ! तथा मन्त्रिवर्ग ! आप दोनों (हव्यदातये) दानी पुरुष के लिये (सुतं+सोमम्) मनुष्यसम्पादित सोम की ओर (श्येनौ+इव) श्येन नाम के पक्षी जैसे (पतथः) जाते हैं । यह आपकी अधिक प्रशंसा है ॥९ ॥

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    विषय

    दो श्येनों के तुल्य उनके कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( अश्विना ) स्त्री पुरुषो ! आप दोनों ( हव्य-दातये ) ग्राह्य पदार्थ वा उत्तम खाद्य पदार्थ के देने वा यज्ञ के लिये ( श्येनौ इव ) दो श्येनों के समान वेग से उत्तम विमान रथादि से जाते हुए वा उत्तम आचारवान् होकर ( सुतं सोमं अव गच्छथः ) यज्ञ में उत्पादित सोम ओषधि रस, तद्वत् आनन्द को प्राप्त करो। शेष पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः—१—५, १६, १८ विराट् त्रिष्टुप्॥ ७–९, १३ निचृत् त्रिष्टुप्। ६, १०—१२, १४, १५, १७ भुरिक् पंक्ति:। २०, २१, २४ पंक्ति:। १९, २२ निचृत् पंक्ति:। २३ पुरस्ता- ज्ज्योतिर्नामजगती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    श्येनौ इव

    पदार्थ

    [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (हव्यदातये) = [हव्यानांदातिः यस्य] यज्ञशील पुरुष के लिये (सुतं सोमं) = उत्पन्न हुए हुए सोम के प्रति इस प्रकार (पतथः) = गति करते हो, (इव) = जिस प्रकार (श्येनौ) = दो श्येन [बाज ] पक्षी गति करते हैं। श्येन गतिशील हैं, प्राणापान भी गतिशील हैं। श्येन शत्रुभूत पक्षियों को समाप्त करता है, ये प्राणापान शत्रुभूत वासनाओं को समाप्त करते हैं। वासना समाप्ति के द्वारा ये हमें यज्ञशील बनाते हैं। शेष मन्त्रभाग मन्त्र संख्या सात पर द्रष्टव्य है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणापान दो श्येन पक्षियों के समान हैं। ये वासनारूप चिड़ियों को समाप्त करके सोम का रक्षण करते हैं, और हमें यज्ञशील बनाते हैं।

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