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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 35/ मन्त्र 17
    ऋषिः - श्यावाश्वः देवता - अश्विनौ छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    क्ष॒त्रं जि॑न्वतमु॒त जि॑न्वतं॒ नॄन्ह॒तं रक्षां॑सि॒ सेध॑त॒ममी॑वाः । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ सुन्व॒तो अ॑श्विना ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क्ष॒त्रम् । जि॒न्व॒त॒म् । उ॒त । जि॒न्व॒त॒म् । नॄन् । ह॒तम् । रक्षां॑सि । सेध॑तम् । अमी॑वाः । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    क्षत्रं जिन्वतमुत जिन्वतं नॄन्हतं रक्षांसि सेधतममीवाः । सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं सुन्वतो अश्विना ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    क्षत्रम् । जिन्वतम् । उत । जिन्वतम् । नॄन् । हतम् । रक्षांसि । सेधतम् । अमीवाः । सऽजोषसौ । उषसा । सूर्येण । च । सोमम् । पिबतम् । अश्विना ॥ ८.३५.१७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 35; मन्त्र » 17
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Animate, energise and develop the defence and administrative forces, sustain and inspire the people in general whosoever they are, destroy the evil and the violent, eliminate ill-health and disease and in unison with the sun and the dawn of every new day create new soma of joy and life’s excitement.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    राजपुरुषाचे हे कर्तव्य आहे की, प्रजेतील क्षत्रियांना प्रसन्न ठेवावे. ॥१७॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे राजानौ ! युवां क्षत्रं=क्षत्रियजातिं बलिष्ठदलं । जिन्वतं प्रसादयतम् उत तदर्थञ्च नॄन्=सर्वान् मनुष्यान् । जिन्वतं प्रसादयतम् । व्याख्यातमन्यत् ॥१७ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    हे राजन् ! तथा हे मन्त्रिमण्डल ! आप दोनों मिलकर (क्षत्रम्) क्षत्रिय जाति अर्थात् बलिष्ठ दल को (जिन्वतम्) प्रसन्न रक्खा करें (उत) और उनकी प्रसन्नता के लिये (नॄन्) सर्व मनुष्यों को (जिन्वतम्) अपना प्रिय बनावें । शेष पूर्ववत् ॥१७ ॥

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    विषय

    ज्ञानवृद्धि, कर्मवृद्धि, रक्षोहनन, दुष्टनाशन, क्षत्रविजय, गोवृद्धि, प्रजावृद्धि का उपदेश।

    भावार्थ

    ( क्षत्रं जिन्वतम् ) आप दोनों धन और बल-वीर्य की वृद्धि करो । ( नॄन् जिन्वतम् ) नायक पुरुषों को बढ़ावो। शेष पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः—१—५, १६, १८ विराट् त्रिष्टुप्॥ ७–९, १३ निचृत् त्रिष्टुप्। ६, १०—१२, १४, १५, १७ भुरिक् पंक्ति:। २०, २१, २४ पंक्ति:। १९, २२ निचृत् पंक्ति:। २३ पुरस्ता- ज्ज्योतिर्नामजगती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    बल-उन्नतिपथ पर बढ़ना

    पदार्थ

    [१] हे प्राणापानो! आप (क्षत्रम्) = क्षतों से त्राण करनेवाले बल का हमारे में वर्धन करो। (उत) = और (नृन् जिन्वतम्) = उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाले मनुष्यों का प्रीणन करो। अवशिष्ट मन्त्रभाग मन्त्र संख्या १६ पर व्याख्यात है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणसाधना द्वारा सोमरक्षण होकर हमारा बल बढ़ता है तथा हम उन्नतिपथ पर आगे बढ़ पाते हैं।

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