ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 35/ मन्त्र 3
विश्वै॑र्दे॒वैस्त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒हाद्भिर्म॒रुद्भि॒र्भृगु॑भिः सचा॒भुवा॑ । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ पिबतमश्विना ॥
स्वर सहित पद पाठविश्वैः॑ । दे॒वैः । त्रि॒ऽभिः । ए॒का॒द॒शैः । इ॒ह । अ॒त्ऽभिः । म॒रुत्ऽभिः । भृगु॑ऽभिः । स॒चा॒ऽभुवा॑ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वैर्देवैस्त्रिभिरेकादशैरिहाद्भिर्मरुद्भिर्भृगुभिः सचाभुवा । सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना ॥
स्वर रहित पद पाठविश्वैः । देवैः । त्रिऽभिः । एकादशैः । इह । अत्ऽभिः । मरुत्ऽभिः । भृगुऽभिः । सचाऽभुवा । सऽजोषसौ । उषसा । सूर्येण । च । सोमम् । पिबतम् । अश्विना ॥ ८.३५.३
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 35; मन्त्र » 3
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 14; मन्त्र » 3
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 14; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Ashvins, associated with all the thirty three brilliant, plentiful and generous divine powers of nature and humanity, scientifically energised liquids, vibrant pilots and controlled winds, intellectuals and scientists who dispel the darkness and ignorance of society, and in union with the dawn of a new sun in life, receive, preserve, develop and bring the soma energy for the peace and joy of humanity here and now.
मराठी (1)
भावार्थ
तेहतीस देवांपासून लाभ घेणारे राजा व त्याचे मंत्री सुखाचे अधिकारी असतात. ॥३॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे अश्विनौ । युवां विश्वैः=सर्वैर्देवैः । त्रिभिरेकादशैः=त्रयस्त्रिंशद्भिः । अद्भिर्जलैः । मरुद्भिर्मरुद्गणैः । भृगुभिर्भर्जनकारिभिरग्निभिः । सचाभुवा सहभूतौ स्थः । अन्यदुक्तम् ॥३ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
हे राजन् ! तथा अमात्यदल ! आप (विश्वैः+देवैः) सर्वदेव अर्थात् (त्रिभिः) त्रिगुणित (एकादशैः) एकादश याने ३३ (तेंतीस) देवों के (अद्भिः) जलों के (मरुद्भिः) मरुद्गणों के तथा (भृगुभिः) भर्जनकारी अग्नियों के (सचाभुवा) साथ ही उत्पन्न हुए हैं । आगे पूर्ववत् ॥३ ॥
विषय
रथी-सारथी, राजा-सचिव आदिवत् उनके कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे ( अश्विना ) उत्तम जितेन्द्रिय स्त्री पुरुषो ! आप दोनों ( सचा-भुवा ) सदा एक साथ (स-जोषसा) प्रेमपूर्वक रहते हुए ( उषसा सूर्येण च ) उषा, सूर्य के सदृश सुशोभित रहकर ( त्रीभिः एकादशैः ) तीन ग्यारह, अर्थात् ३३ ( विश्वैः देवैः ) समस्त विद्वानों (अद्भिः) जलवत् शान्तिदायक आप्त जनों,(मरुद्भिः) वातों के समान बलवान्, (भृगुभिः) दुष्टों के नाशकारी, तेजस्वी पुरुषों द्वारा (सोमं पिबतम्) ऐश्वर्य का पालन और उपभोग करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
श्यावाश्व ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः—१—५, १६, १८ विराट् त्रिष्टुप्॥ ७–९, १३ निचृत् त्रिष्टुप्। ६, १०—१२, १४, १५, १७ भुरिक् पंक्ति:। २०, २१, २४ पंक्ति:। १९, २२ निचृत् पंक्ति:। २३ पुरस्ता- ज्ज्योतिर्नामजगती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
विषय
प्राणसाधना व तेंतीस देव
पदार्थ
[१] उषाकाल में सूर्योदय तक सेवन किये जाते हुए ये प्राणापान सोम का शरीर में रक्षण करें। [२] (इह) = इस जीवन में (त्रिभिः एकादशैः) = ११ पृथिवीलोक में, ११ अन्तरिक्षलोक में तथा ११ द्युलोक में इस प्रकार तीन गुणा ग्यारह, अर्थात् तेंतीस (विश्वैः देवैः) = सब देवों के साथ (सचाभुवा) = समवेत होकर होनेवाले ये प्राणापान सोम का पान करें। प्राणसाधना के द्वारा त्रिलोकी के ये तेंतीस देवता इस शरीर में भी विकसित होते हैं। पृथिवी के ग्यारह देवताओं का मुखिया अग्नि' है, अन्तरिक्ष के ११ देवों का मुखिया वायु है और द्युलोक के ११ देवों का मुखिया सूर्य है। प्राणसाधक के भी स्थूल शरीर में अग्नि व शक्ति की उष्णता होती है, हृदय में [वा गतौ ] गति का संकल्प होता है और मस्तिष्क में ज्ञान का सूर्य होता है। [२] (अद्भिः) = [अप्= कर्म] कर्मों के साथ, (मरुद्भिः) = शरीर में कार्य करनेवाली सब वायुओं के साथ तथा (भृगुभिः) = [भ्रस्ज् पाके] ज्ञान परिपाकों के साथ समवेत होकर होनेवाले ये प्राणापान सोम का पान करें। प्राणसाधक कर्मशील व परिपक्व ज्ञानवाला बनता है और उसके शरीर में सब वायुवें अपना-अपना कार्य ठीक प्रकार से करती हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्राणसाधना से शरीर में तेंतीस के तेंतीस देवों का ठीक विकास होता है। प्राणसाधक कर्मशील व परिपक्व ज्ञानवाला बनता है। इसके शरीर में सब मरुत् [वायु] ठीक से कार्य करते हुए शरीर का रक्षण करते हैं।
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