ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 67/ मन्त्र 11
ऋषिः - मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः
देवता - आदित्याः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
पर्षि॑ दी॒ने ग॑भी॒र आँ उग्र॑पुत्रे॒ जिघां॑सतः । माकि॑स्तो॒कस्य॑ नो रिषत् ॥
स्वर सहित पद पाठपर्षि॑ । दी॒ने । ग॒भी॒रे । आ । उग्र॑ऽपुत्रे । जिघां॑सतः । माकिः॑ । तो॒कस्य॑ । नः॒ । रि॒ष॒त् ॥
स्वर रहित मन्त्र
पर्षि दीने गभीर आँ उग्रपुत्रे जिघांसतः । माकिस्तोकस्य नो रिषत् ॥
स्वर रहित पद पाठपर्षि । दीने । गभीरे । आ । उग्रऽपुत्रे । जिघांसतः । माकिः । तोकस्य । नः । रिषत् ॥ ८.६७.११
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 67; मन्त्र » 11
अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 53; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 53; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Aditi, mother of brave and blazing Adity as, pray anoint us, make us immune and help us cross the seas of violence both deep and shallow, let no enemy, violence or disease harm and injure our coming generations.
मराठी (1)
भावार्थ
दीन व गभीर शब्दाने कमी व अधिक क्लेश दिसून येतो. येथे गभीर शब्दाचा अर्थ जल असा सायण करतो. जरी उदक नावात या शब्दाचा पाठ आहे तरी स्वाभाविक अर्थ हा वाटतो की, लहान-मोठ्या संकटात तू (सभा) आमचे रक्षण करतेस, त्यासाठी तू धन्यवादास पात्र आहेस. पुढेही आमच्या संतानांना नष्ट करू नये असा उपाय कर. ॥११॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे उग्रपुत्रे=न्यायशीलनाद् उग्रा=भयङ्कराः पुत्राः सभा सद्रूपा यस्याः सा उग्रपुत्रा । तत्सम्बोधने हे उग्रपुत्रे ! जिघांसतः=हन्तुमिच्छतः शत्रोः सकाशात् । दीने=क्षीणे=अगभीरे=गाधे । आ=पुनः । गभीरे=अगाधे च । अस्मान् । पर्षि=रक्ष । नः=अस्माकम् । तोकस्य बीजभूतस्य तनयस्य । माकिः रिषत्=मा कश्चिद् हिनस्तु ॥११ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(उग्रपुत्रे) हे उग्रपुत्रे अदाने सभे ! (जिघांसतः) हिंसक शत्रुओं से (दीने) गाध जल में या गाध संकट में (आ) और (गभीर) अति अगाध संकट में हम लोगों को (पर्षि) सदा बचाया करती है और इसी प्रकार बचाया कर । हे अदिते ! (नः+तोकस्य) हमारे बीजभूत सन्तानों को (माकिः+रिषत्) कोई प्रबल शत्रु भी विनष्ट न करने पावे, ऐसा प्रबन्ध आप करें ॥११ ॥
भावार्थ
दीन गभीर शब्द से अल्प और अधिक क्लेश द्योतित होता है । यहाँ गभीर शब्द का जल भी अर्थ सायण करते हैं । यद्यपि उदक नाम में इस शब्द का पाठ है, तथापि यहाँ स्वाभाविक अर्थ यह प्रतीत होता है कि छोटे बड़े सब संकट से आप हमारी रक्षा करती हैं, अतः आप धन्यवाद के पात्र हैं । आगे हमारा बीज नष्ट न हो, सो उपाय कीजिये ॥११ ॥
विषय
विदुषी माता के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे (उग्रपुत्रे) अर्थात् शत्रु को भय देने वाले पुत्रों की मातः ! तू ( जिघांसतः ) हनन करने की इच्छा वाले, हिंसक भाव वाले पुरुष से हमारी ( दीने ) दीन दशा में और (गभीरे) गृह, जंगल, अन्धकारादि में भी ( पर्षि ) सब प्रकार से रक्षा कर। ( नः तोकस्य ) हमारे सन्तान को ( माकि: ) और कोई भी ( नः रिषत् ) मार सके। इसी प्रकार राष्ट्र, भूमि ( State ) स्वयं स्वतन्त्र अन्य किसी देश के अधीन न हों, उसकी इतनी शक्ति हो कि इसका प्रत्येक पुत्र दीन से दीनदशा और गंभीर से गंभीर जंगल, जल, एकान्तादि में भी निर्भय हो, उस पर कोई अन्य देश वाला अंगुली तक न उठा सके।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मत्स्यः सांमदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनद्धा ऋषयः॥ आदित्या देवताः। छन्दः—१—३, ५, ७, ९, १३—१५, २१ निचृद् गायत्री। ४, १० विराड् गायत्री। ६, ८, ११, १२, १६—२० गायत्री॥
विषय
'दीन, गभीर, उग्र'
पदार्थ
[१] हे अदिते! स्वास्थ्य की देवते ! तू (दीने) = ऊँची उड़ान लेनेवाले - उच्च लक्ष्यवाले (गभीरे) = गम्भीर वृत्तिवाले (उग्रपुत्रे) = हमारे तेजस्वी पुत्र के विषय में (जिघांसतः) = हिंसा की कामनावाले पुरुष से (आपर्षि) = रक्षण करती है। स्वस्थ शरीर व स्वस्थ मनवाला यह हमारा सन्तान विनष्ट नहीं होता। [२] इस हिंसक का जाल (नः) = हमारे (तोकस्य) = सन्तान का (माकिः रिषत्) = हिंसन करनेवाला न हो ।
भावार्थ
भावार्थ-स्वास्थ्य हमारे सन्तानों को उच्च लक्ष्यवाला, गम्भीर प्रकृतिवाला व तेजस्वी बनाए । इन्हें कोई भी विषयजाल में न फंसा सके।
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