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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 67 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 67/ मन्त्र 7
    ऋषिः - मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः देवता - आदित्याः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    अस्ति॑ देवा अं॒होरु॒र्वस्ति॒ रत्न॒मना॑गसः । आदि॑त्या॒ अद्भु॑तैनसः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अस्ति॑ । दे॒वाः॒ । अं॒होः । उ॒रु । अस्ति॑ । रत्न॑म् । अना॑गसः । आदि॑त्याः । अद्भु॑तऽएनसः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्ति देवा अंहोरुर्वस्ति रत्नमनागसः । आदित्या अद्भुतैनसः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्ति । देवाः । अंहोः । उरु । अस्ति । रत्नम् । अनागसः । आदित्याः । अद्भुतऽएनसः ॥ ८.६७.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 67; मन्त्र » 7
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 52; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Adityas, children of light, rulers and administrators, generous and unpolluted by corruption, the relief for the distressed is ample freedom from distress, and the reward for the sinless is jewel graces of life.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    सभासदांनी सदाचाराने वागावे. कधीही पाप व अपराध करता कामा नये. कारण हिंसक पापी लोकांना महादंड व निरपराधी लोकांना श्रेय मिळते. ॥७॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे देवाः ! हे आदित्याः ! यूयम् । अद्भुतैनसः= अभूतापराधाः स्थ । किन्तु । अंहोः=हिंसाकर्तुर्जनस्य । उरु=महत्पापमस्ति यद्वा महद् बन्धनमस्ति । तथा अनागसः=निरपराधस्य । रत्नम्=रमणीयं श्रेयोऽस्ति ॥७ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (आदित्याः देवाः) हे देव सभासदों ! (अद्भुतैनसः) आप सब निरपराध और निष्पाप हैं । हे देवो ! (अंहोः) हिंसक अपराधी और पापी जनों का (उरु+अस्ति) महाबन्धन और (अनागसः) निरपराधी जनों के लिये (रत्नम्) रमणीय श्रेय होता है ॥७ ॥

    भावार्थ

    सभासद् अपने सदाचार को वैसा बनावें कि वे कभी पाप और अपराध करते हुए न पाए जाएँ, क्योंकि हिंसक पापी जनों को महादण्ड और निरपराधी को श्रेय मिलता है ॥७ ॥

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    विषय

    उत्तम शासक स्वयं अपराध से रहित हों।

    भावार्थ

    हे ( देवाः ) विद्वान् पुरुषो ! ( अंहोः ) हिंसक एवं पापकारी पुरुष का पाप या कष्ट भी ( उरु अस्ति ) बड़ा अधिक होता है। और (अनागसः) निरपराधी को (रत्नं उरु अस्ति) सुख भी बहुत होता है। हे ( आदित्याः ) अदिति अर्थात् उत्तम माता पिता के उत्तम पुत्रो ! एवं उत्तम विद्वान् व्रतधारी तेजस्वी पुरुषो ! आप लोग सदा ( अद्भुत एनसः ) पापरहित, निरपराधी होवो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मत्स्यः सांमदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनद्धा ऋषयः॥ आदित्या देवताः। छन्दः—१—३, ५, ७, ९, १३—१५, २१ निचृद् गायत्री। ४, १० विराड् गायत्री। ६, ८, ११, १२, १६—२० गायत्री॥

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    विषय

    'अद्भुतैनसः' आदित्याः

    पदार्थ

    [१] हे (देवाः) = ज्ञानी पुरुषो! (अंहो:) = पापी पुरुष का (उरु अस्ति) = धन अत्यधिक है। यह पाप से खूब धन कमा ले लेता है घर की इसे कमी नहीं रहती, पर (अनागसः) = निष्पाप पुरुष का ही (रत्नं अस्ति) = रमणीय धन होता है । सुपथ से कमाया गया धन ही जीवन में रमणीयता का कारण बनता है। [२] इसी से (आदित्यद्मः) = गुणों व ज्ञानों का आदान करनेवाले पुरुष अद्भुत (एनस:) = अभूतपाप होते हैं। ये कभी पाप में प्रवृत्त नहीं होते। पाप से ये धनार्जन नहीं करते।

    भावार्थ

    भावार्थ- पाप से कमाया धन अधिक होता हुआ भी रमणीयता का साधक नहीं होता । आदित्य विद्वान् सदा पाप से परे रहते हैं।

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