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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 67 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 67/ मन्त्र 19
    ऋषिः - मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः देवता - आदित्याः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    नास्माक॑मस्ति॒ तत्तर॒ आदि॑त्यासो अति॒ष्कदे॑ । यू॒यम॒स्मभ्यं॑ मृळत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न । अ॒स्माक॑म् । अ॒स्ति॒ । तत् । तरः॑ । आदि॑त्यासः । अ॒ति॒ऽस्कदे॑ । यू॒यम् । अ॒स्मभ्य॑म् । मृ॒ळ॒त॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नास्माकमस्ति तत्तर आदित्यासो अतिष्कदे । यूयमस्मभ्यं मृळत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न । अस्माकम् । अस्ति । तत् । तरः । आदित्यासः । अतिऽस्कदे । यूयम् । अस्मभ्यम् । मृळत ॥ ८.६७.१९

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 67; मन्त्र » 19
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 54; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Adityas, leaders of the human nation, that power and competence you give us to get over our problems is not our own, it is yours. Pray be kind and gracious and keep it up as ever before.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    राष्ट्रीय सभेच्या अधीन शेकडो, हजारो सेना तसेच कोष व प्रबंध असतो. ते सर्व प्रजेकडूनच एकत्रित केलेले असते सभेचे बल प्रजेपेक्षा अधिक असते. त्यासाठी सभेलाच मुख्यत्वे प्रजेचे रक्षण इत्यादीचा प्रबंध केला पाहिजे. ॥१९॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे आदित्यासः=आदित्याः ! अतिष्कदे= दुरितानामतिस्कन्दाय=अतिक्रमणाय । अस्माकम् । तत्तरः=स वेगो नास्ति यो वेगो भवत्सु वर्तते । अतो यूयमस्मभ्यम् । मृळत=मृडत=सुखयत ॥१९ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (आदित्यासः) हे सभासदों सभानेताओ ! (अतिष्कदे) दुःख, व्यसन आपत्ति आदिकों से बचने के और उन्हें भगाने कुचलने के लिये (अस्माकम्) हम लोगों में (तत्+तरः+न+अस्ति) वह वेग, सामर्थ्य विवेक नहीं है, जो आप लोगों में विद्यमान है, अतः हे सभ्यो ! (यूयम्) आप लोग ही (अस्मभ्यम्+मृळत) हमको सुख पहुँचावें और सामर्थ्य प्रदान करें ॥१९ ॥

    भावार्थ

    जिस कारण राष्ट्रिय सभा के अधीन शतशः सहस्रशः सेनाएँ कोष और प्रबन्ध रहते हैं और वे सब प्रजाओं की ओर से ही एकत्रित रहते हैं, अतः सभा का बल प्रजापेक्षया अधिक हो जाता है, अतः सभा को ही मुख्यतया प्रजाओं की रक्षा आदि का प्रबन्ध करना चाहिये ॥१९ ॥

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    विषय

    तेजस्वी विद्वान् पुरुषों के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( आदित्यासः ) ज्ञानवान् पुरुषो ! ( अस्माकं तत् तरः न अस्ति ) हमारे पास वह बल नहीं है, जो ( अति-स्कदे ) सब बन्धनों और कष्टों से पार ले चलने में समर्थ हो। ( यूयम् ) तुम सब ( अस्मभ्यं मृडत ) हमें सुखी करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मत्स्यः सांमदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनद्धा ऋषयः॥ आदित्या देवताः। छन्दः—१—३, ५, ७, ९, १३—१५, २१ निचृद् गायत्री। ४, १० विराड् गायत्री। ६, ८, ११, १२, १६—२० गायत्री॥

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    विषय

    तत् तर:

    पदार्थ

    [१] (आदित्यासः) = हे आदित्य विद्वानो ! (अस्माकं) = हमारा (तत्) = वह (तरः) = वेग व बल (न अस्ति) = नहीं है, जो (अतिष्कदे) = विषयों के बन्धन को लाँघने में समर्थ हो, अर्थात् हम स्वयं विषयासक्ति से ऊपर उठ जाएँगे, सो बात नहीं हैं। [२] हे आदित्यो ! (यूयं) = आप ही (अस्मभ्यं मृडत) = हमारे लिए सुख को देनेवाले होओ। आपकी कृपा होगी तभी हम ज्ञान को प्राप्त करके इस वासनाजाल से मुक्त हो सकेंगे।

    भावार्थ

    भावार्थ- आदित्य विद्वानों का सम्पर्क हमें उस ज्ञान के बल को प्राप्त कराएगा जो हमें वासनाजाल को तैरने में समर्थ करके सुखी करेगा।

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