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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 93 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 93/ मन्त्र 18
    ऋषिः - सुकक्षः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    बो॒धिन्म॑ना॒ इद॑स्तु नो वृत्र॒हा भूर्या॑सुतिः । शृ॒णोतु॑ श॒क्र आ॒शिष॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    बो॒धित्ऽम॑नाः । इत् । अ॒स्तु॒ । नः॒ । वृ॒त्र॒ऽहा । भूरि॑ऽआसुतिः । शृ॒णोतु॑ । शु॒क्रः । आ॒ऽशिष॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    बोधिन्मना इदस्तु नो वृत्रहा भूर्यासुतिः । शृणोतु शक्र आशिषम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    बोधित्ऽमनाः । इत् । अस्तु । नः । वृत्रऽहा । भूरिऽआसुतिः । शृणोतु । शुक्रः । आऽशिषम् ॥ ८.९३.१८

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 93; मन्त्र » 18
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 24; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    May Indra, lord of universal intelligence, destroyer of darkness, commander of universal success and joy, we pray, know our mind and listen to us for our heart’s desire for success.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जेव्हा मननशक्ती प्रबोध व कर्तृत्वशक्तीने संपन्न होते, तेव्हा जीवनपथातील सर्व बाधा दूर होतात व आत्यंतिक सफलता प्राप्त होते. ॥१८॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (नः) हम मानवों में जो (बोधिन्मनाः) बोधयुक्त मननशक्ति वाला है वह (इत्) ही (वृत्रहा) विघ्नहर्ता और (भूर्यासुतिः) सफलता वाला (अस्तु) होता है। ऐसा (शक्र) समर्थ मन (आशिषम्) कामना को (शृणोति) सुनता है॥१८॥

    भावार्थ

    जब मननशक्ति प्रबोध तथा कर्तृत्व शक्ति युक्त हो जाती है, तब जीवन-पथ की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और अपेक्षित सफलता मिलती है।॥१८॥

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    विषय

    पक्षान्तर में परमेश्वर के गुण वर्णन।

    भावार्थ

    ( वृत्र-हा ) शत्रुओं और विघ्नों का नाशक ( शक्रः ) शक्तिशाली पुरुष ( नः ) हमारे बीच ( बोधित्-मनाः ) ज्ञान से युक्त चित्त वाला, ) और ( भूरि-आसुतिः ) बहुत से अन्नों का स्वामी ( इत् अस्तु ) हो। वह ( नः आशिषम् ) हमारी कामना और प्रार्थना को ( शृणोतु ) श्रवण करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुकक्ष ऋषिः॥ १—३३ इन्द्रः। ३४ इन्द्र ऋभवश्च देवताः॥ छन्दः—१, २४, ३३ विराड़ गायत्री। २—४, १०, ११, १३, १५, १६, १८, २१, २३, २७—३१ निचृद् गायत्री। ५—९, १२, १४, १७, २०, २२, २५, २६, ३२, ३४ गायत्री। १९ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    'बोधिन्मना' प्रभु

    पदार्थ

    [१] वह (वृत्रहा) = वासना को विनष्ट करनेवाला प्रभु (नः) = हमारे लिये (इत्) = निश्चय से (बोधिन्मनाः) = ज्ञानयुक्त मन को देनेवाला हो । प्रभु हमें सदा प्रबुद्ध मन को प्राप्त करायें। वे प्रभु हमारे लिये (भूर्यासुतिः) = खूब ही सोम का सम्पादन करनेवाले हों। यह सोम ही तो मन आदि करणों [साधनों] की शक्ति का वर्धन करता है। [२] (शक्रः) = वह सर्वशक्तिमान् प्रभु हमारी (आशिषम्) = आशी:-इच्छा व प्रार्थना को (शृणोतु) = सुने । प्रभु हमारी सब कामनाओं को पूर्ण करें।

    भावार्थ

    भावार्थ- वासना को विनष्ट करनेवाले प्रभु हमें प्रवुद्ध मन को प्राप्त करायें, हमारे लिये सोम का सम्पादन करें और हमारी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हों।

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