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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 93 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 93/ मन्त्र 19
    ऋषिः - सुकक्षः देवता - इन्द्र: छन्दः - पादनिचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    कया॒ त्वं न॑ ऊ॒त्याभि प्र म॑न्दसे वृषन् । कया॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कया॑ । त्वम् । नः॒ । ऊ॒त्या । अ॒भि । प्र । म॒न्द॒से॒ । वृ॒ष॒न् । कया॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । आ । भ॒र॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कया त्वं न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृषन् । कया स्तोतृभ्य आ भर ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कया । त्वम् । नः । ऊत्या । अभि । प्र । मन्दसे । वृषन् । कया । स्तोतृऽभ्यः । आ । भर ॥ ८.९३.१९

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 93; मन्त्र » 19
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 24; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Indra, lord of power and prosperity, generous as cloud showers, by which modes of protection and promotion do you bless us with the joys we have, by which methods and graces do you bear and bring the wealth which the celebrants enjoy?

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    मन:शक्तीचे वर्णन करत भक्त त्याचा प्रदाता जो ईश्वर त्याचा महिमा वर्णन करतो. या सृष्टीत जीवात्म्याला परमेश्वराद्वारे जे संरक्षण व साह्य, मननशक्ती इत्यादीच्या माध्यमाने प्राप्त होत आहे, ते खरोखर अवर्णनीय आहे. ॥१९॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (वृषन्) सुख की वर्षा करने वाले, समर्थ भगवन्! (त्वम्) आप (कया) किस अद्भुत (ऊत्या) रक्षा व सहायता से (नः) हमें (अभि प्र मन्दसे) आनन्द देते हैं! और (कया) किस उत्तम रीति से (स्तोतृभ्यः) गुण कीर्तन करने वाले साधकों को (आ भर) परिपूर्ण करते हैं!॥१९॥

    भावार्थ

    मन की शक्ति का वर्णन करता भक्त उसके दाता प्रभु की महिमा गाता है। इस सृष्टि में जीवात्मा को प्रभु द्वारा जो संरक्षण व साहाय्य, मननशक्ति आदि से प्राप्त हो रहा है, वह अवर्णनीय है॥१९॥

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    विषय

    पक्षान्तर में परमेश्वर के गुण वर्णन।

    भावार्थ

    हे ( वृषन् ) बलशालिन् ! तू ( नः कया ऊत्या ) हमें किस प्रकार की रक्षण नीति से ( प्र मन्दसे ) पालन करके अधिक हर्षित होता है ? और (कया) किस नीति से ( स्तोतृभ्यः आ भर ) विद्वानों का सुख प्राप्त कराता है ?

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुकक्ष ऋषिः॥ १—३३ इन्द्रः। ३४ इन्द्र ऋभवश्च देवताः॥ छन्दः—१, २४, ३३ विराड़ गायत्री। २—४, १०, ११, १३, १५, १६, १८, २१, २३, २७—३१ निचृद् गायत्री। ५—९, १२, १४, १७, २०, २२, २५, २६, ३२, ३४ गायत्री। १९ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    कया उत्या

    पदार्थ

    [१] हे (वृषन्) = सुखों का वर्षण करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (नः) = हमारे लिये (कया उत्या) = कल्याणकर रक्षण के द्वारा (अभि प्रमन्दसे) = आनन्दित करनेवाले होते हैं। आप से रक्षित हुए हुए हम इह लोक के अभ्युदय व परलोक के निःश्रेयस को [अभि] प्राप्त करनेवाले बनकर आनन्द लाभ कर पाते हैं। [२] हे प्रभो! आप इस (कया) = कल्याणकर [ आनन्दमय] रक्षण के द्वारा (स्तोतृभ्यः) = स्तोताओं के लिये (आभर) = समन्तात् भरण व पोषण के लिये होइये।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु के रक्षण में हम इहलोक व परलोक की उन्नति करते हुए आनन्दित हों । प्रभु के रक्षण में हम ठीक से भरण व पोषण में समर्थ हों ।

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