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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 93 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 93/ मन्त्र 22
    ऋषिः - सुकक्षः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    पत्नी॑वन्तः सु॒ता इ॒म उ॒शन्तो॑ यन्ति वी॒तये॑ । अ॒पां जग्मि॑र्निचुम्पु॒णः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पत्नी॑ऽवन्तः । सु॒ताः । इ॒मे । उ॒शन्तः॑ । य॒न्ति॒ । वी॒तये॑ । अ॒पाम् । जग्मिः॑ । नि॒ऽचु॒म्पु॒णः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पत्नीवन्तः सुता इम उशन्तो यन्ति वीतये । अपां जग्मिर्निचुम्पुणः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पत्नीऽवन्तः । सुताः । इमे । उशन्तः । यन्ति । वीतये । अपाम् । जग्मिः । निऽचुम्पुणः ॥ ८.९३.२२

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 93; मन्त्र » 22
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 25; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    These sparkling life-giving streams of soma joys of life created by Indra in the world flow to the thirsty yajakas for their enlightenment and joy just as streams of water flow to the unsatiating sea.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्या प्रकारे समुद्र हळूहळू जल प्राशन करून ‘निचुम्पुण’ म्हणविला जातो. असेच साधकाने धैर्याने परमेश्वर निर्मित पदार्थांचे ज्ञान प्राप्त करावे. या प्रकारे ग्रहण केलेले द्रव्य त्याच्यासाठी ऐश्वर्याचे साधन बनते. ॥२२॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (पत्नीवन्तः) शुभशक्तियुक्त, (सुताः) उनके विज्ञानरूपी सार के रूप में निष्पन्न, (इमे) ये ऐश्वर्यदाता ईश्वर रचित पदार्थ (उशन्तः) अभीष्ट बने हुए (वीतये) साधक के भोग हेतु (यन्ति) उसे प्राप्त हो रहे हैं। जिस भाँति (अपाम्) जलों का (जग्मिः) ग्रहणशील (निचुम्पुणः) शनैः-शनैः पी जाने वाला सागर है वैसे ही (अपाम्) पदार्थों के रस या सारभूत विज्ञान को ग्रहण करने वाला साधक (निचुम्पुणः) शनैः-शनैः प्राप्तज्ञान कहा जाता है॥२२॥

    भावार्थ

    जिस भाँति सागर शनैः-शनैः जल पीकर 'निचुम्पुण' कहलाता है, वैसे ही साधक को चाहिये कि वह धीरता सहित परमेश्वर-रचित पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करे; इस भाँति ग्रहण किये हुए द्रव्य उसके हेतु ऐश्वर्य के साधन बनते हैं॥२२॥

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    विषय

    पक्षान्तर में परमेश्वर के गुण वर्णन।

    भावार्थ

    ( अपां जग्मिः ) जिस प्रकार समुद्र में समस्त नदी, जलधाराएं आकर मिलती हैं, वह जलधाराओं के प्राप्त होने का एकमात्र आधार है और जिस प्रकार वह समुद्र ही ( नि-चुम्पुणः ) जलों को अपने भीतर लेकर ही पूर्ण होता है, उसी प्रकार राजा भी ( अपां जग्मिः ) सब आप्त प्रजाओं का शरण जाने योग्य और ( निचुम्पणः ) समुद्रवत् उन से ही करादि लेकर तृप्त या पूर्ण होने वाला है। हे राजन् ! ( पत्नी वन्तः ) पालनकारिणी शक्ति या नीति से वा पत्नीयुक्त वाले गृहस्थ जन और ( सुताः ) अभिषिक्त वा पुत्रवत् प्रजा रूप ( इमे ) ये ( उशन्तः ) धनादि कामनावान् जन, ( वीतये ) रक्षा प्राप्त करने के लिये ( यन्ति ) तुझे प्राप्त होते हैं। ( २ ) इसी प्रकार परमेश्वर समुद्रवत् ( अपां जग्मिः ) समस्त जीवों का एकमात्र प्राप्तव्य है, वह पूर्ण है, वह सब विश्व को अपने भीतर लेकर भी पूर्ण है। ये उत्पन्न जीव उस पालक शक्ति से युक्त होकर भी सुख कामना से युक्त होकर रक्षार्थ भगवान् की शरण जाते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुकक्ष ऋषिः॥ १—३३ इन्द्रः। ३४ इन्द्र ऋभवश्च देवताः॥ छन्दः—१, २४, ३३ विराड़ गायत्री। २—४, १०, ११, १३, १५, १६, १८, २१, २३, २७—३१ निचृद् गायत्री। ५—९, १२, १४, १७, २०, २२, २५, २६, ३२, ३४ गायत्री। १९ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    अपां जग्मिः -निचुम्पुणः

    पदार्थ

    [१] (पत्नीवन्त:) = प्रशस्त पत्नियोंवाले, अर्थात् अपनी पत्नी के साथ सदा उत्तम कार्यों को करनेवाले (सुताः) = [सुतं अस्य अस्ति इति] सोम का सम्पादन करनेवाले इमे ये साधक (उशन्तः) = प्रभु प्राप्ति की कामनावाले होते हुए (वीतये यन्ति) = [To shine] प्रकाश के लिये गतिवाले होते हैं। इनका जीवन अधिकाधिक प्रकाशमय होता जाता है। [२] यह उपासक (अपां जग्मिः) = सदा कर्मों के प्रति जानेवाला, अर्थात् क्रियाशील होता है और (निचुम्पुणः) = [ नितरां चमनेन प्रीणति ] सोम के भक्षण अन्दर ही व्यापन के द्वारा अपना प्रीणन करनेवाला होता है। सोमरक्षण द्वारा अपने में प्रीति का अनुभव करता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- गृहस्थ में प्रशस्त पत्नीवाले होते हुए हम सोमरक्षण द्वारा प्रभु प्राप्ति की कामनावाले बनें। सदा क्रियाशील होते हुए सोमरक्षण द्वारा जीवन में प्रीति का अनुभव करें।

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