Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 93 के मन्त्र
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 93/ मन्त्र 7
    ऋषिः - सुकक्षः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    तमिन्द्रं॑ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे । स वृषा॑ वृष॒भो भु॑वत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । इन्द्र॑म् । वा॒ज॒या॒म॒सि॒ । म॒हे । वृ॒त्राय॑ । हन्त॑वे । सः । वृषा॑ । वृ॒ष॒भः । भु॒व॒त् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे । स वृषा वृषभो भुवत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । इन्द्रम् । वाजयामसि । महे । वृत्राय । हन्तवे । सः । वृषा । वृषभः । भुवत् ॥ ८.९३.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 93; मन्त्र » 7
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 22; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    That Indra, dynamic and enlightened mind and intelligence, we cultivate and strengthen for the elimination of the great waste, deep ignorance and suffering prevailing in the world. May that light and mind be exuberant and generous for us with showers of enlightenment.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    मनाच्या संकल्पशक्तीला बलवान बनवून तामस वृत्तीचे हनन केले जाऊ शकते. प्रबल संकल्पच सुखाचे कारण आहे. ॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (महे) विपुल (वृत्राय) ज्ञान अवरोधक तामस प्रवृत्ति को (हन्तवे) नष्ट करने हेतु हम (तम्) उस पूर्वोक्त (इन्द्रम्) प्रज्ञा को (वाजयामसि) बलवती बनाते हैं। (सः) हमारा मन (वृषा) ज्ञान की वर्षा से (वृषभः) सुखों की वर्षा करनेवाला (भुवत्) हो॥७॥

    भावार्थ

    मन की संकल्प शक्ति को बलवान् बना कर ही तामस प्रवृत्तियों को मारा जा सकता है। प्रबल संकल्प ही सुख का मूल है॥७॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    पक्षान्तर में परमेश्वर के गुण वर्णन।

    भावार्थ

    ( तम् इन्द्रम् ) उस शत्रुहन्ता, सूर्यवत् तेजस्वी को हम ( वृत्राय हन्तवे ) बड़े भारी, बढ़ते शत्रु वा वपन नाश करने के लिये ( वाजयामसि ) अधिक बलवान् करते हैं। ( सः वृषाः ) वह बलवान् पुरुष ही ( वृषभः भुवत् ) सब सुखों, ऐश्वर्यों का दाता सर्वश्रेष्ठ है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुकक्ष ऋषिः॥ १—३३ इन्द्रः। ३४ इन्द्र ऋभवश्च देवताः॥ छन्दः—१, २४, ३३ विराड़ गायत्री। २—४, १०, ११, १३, १५, १६, १८, २१, २३, २७—३१ निचृद् गायत्री। ५—९, १२, १४, १७, २०, २२, २५, २६, ३२, ३४ गायत्री। १९ पादनिचृद् गायत्री॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    वृषा वृषभः भुवत्

    पदार्थ

    [१] (तं इन्द्रम्) = उस शत्रु-विद्रावक सर्वशक्तिमान् प्रभु को (वाजयामसि) = हम अपने अन्दर गतिवाला करते हैं। अर्थात् सदा उसे अपने अन्दर अनुभव करने का प्रयत्न करते हैं। ऐसा करने पर वे प्रभु (महे) = उस महान्, अति प्रबल (वृत्राय हन्तव) = वृत्त के विनाश के लिये होते हैं। प्रभु हमारी वासना को विनष्ट करते हैं। [२] वासना को विनष्ट करके (सः) = वे (वृषा) = हमारे पर सुखों के सेवन करनेवाले प्रभु (वृषभः) = हमारे लिये साधनभूत धनों का वर्षण करनेवाले (भुवत्) होते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्रभु स्मरण करें। प्रभु हमारी वासना को विनष्ट करेंगे और हमें आवश्यक धन आदि साधनों को प्राप्त करायेंगे।

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top