यजुर्वेद - अध्याय 36/ मन्त्र 24
ऋषिः - दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः
देवता - सूर्यो देवता
छन्दः - भुरिग् ब्राह्मी
स्वरः - धैवतः
873
तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तꣳ शृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्र ब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥२४॥
स्वर सहित पद पाठतत्। चक्षुः॑। दे॒वहि॑त॒मिति॑ दे॒वऽहि॑तम्। पु॒रस्ता॑त्। शु॒क्रम्। उत्। च॒र॒त्। पश्ये॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। जीवे॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। शृणु॑याम। श॒रदः॑। श॒तम्। प्र। ब्र॒वा॒म॒। श॒रदः॑। श॑तम्। अदी॑नाः। स्या॒म॒। श॒रदः॑। श॒तम्। भूयः॑। च॒। श॒रदः॑। श॒तात् ॥२४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
तच्चक्षुर्देवहितम्पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतञ्जीवेम शरदः शतँ शृणुयाम शरदः शतम्प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम्भूयश्च शरदः शतात् ॥
स्वर रहित पद पाठ
तत्। चक्षुः। देवहितमिति देवऽहितम्। पुरस्तात्। शुक्रम्। उत्। चरत्। पश्येम। शरदः। शतम्। जीवेम। शरदः। शतम्। शृणुयाम। शरदः। शतम्। प्र। ब्रवाम। शरदः। शतम्। अदीनाः। स्याम। शरदः। शतम्। भूयः। च। शरदः। शतात्॥२४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथेश्वरप्रार्थनाविषयमाह॥
अन्वयः
हे परमात्मन्! भवान् यद्देवहितं शुक्रं चक्षुरिव वर्त्तमानं ब्रह्म पुरस्तादुच्चरत् तत् त्वां शतं शरदः पश्येम, शतं शरदो जीवेम, शतं शरदः शृणुयाम, शतं शरदः प्रब्रवाम, शतं शरदोऽदीनाः स्याम। शताच्छरदो भूयश्च पश्येम, जीवेम, शृणुयाम, प्रब्रवामोऽदीनाः स्याम च॥२४॥
पदार्थः
(तत्) चेतनं ब्रह्म (चक्षुः) चक्षुरिव सर्वदर्शकम् (देवहितम्) देवेभ्यो विद्वद्भ्यो हितकारि (पुरस्तात्) पूर्वकालात् (शुक्रम्) शुद्धम् (उत्) (चरत्) चरति सर्वं जानाति (पश्येम) (शरदः) (शतम्) (जीवेम) प्राणान् धारयेम (शरदः) (शतम्) (शृणुयाम) शास्त्राणि मङ्गलवचनानि चेति शेषः (शरदः) शतम् (प्र, ब्रवाम) अध्यापयेमोपदिशेम वा (शरदः) (शतम्) (अदीनाः) दीनतारहिताः (स्याम) भवेम (शरदः) (शतम्) (भूयः) अधिकम् (च) पुनः (शरदः) (शतात्)॥२४॥
भावार्थः
हे परमेश्वर! भवत्कृपया भवद्विज्ञातेन भवत्सृष्टिं पश्यन्त उपयुञ्जानाऽरोगाः समाहिताः सन्तो वयं सकलेन्द्रियैर्युक्ताः शताद्वर्षेभ्योऽप्यधिकं जीवेम, सत्यशास्त्राणि भवद्गुणांश्च शृणुयाम, वेदादीनध्यापयेम, सत्यमुपदिशेम, कदाचित् केनापि वस्तुना विना पराधीना न भवेम, सदैवमात्मवशाः सन्तः सततमानन्देमाऽन्यांश्चानन्दयेमेति॥२४॥
हिन्दी (7)
विषय
अब ईश्वर की प्रार्थना का विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे परमेश्वर! आप जो (देवहितम्) विद्वानों के लिये हितकारी (शुक्रम्) शुद्ध (चक्षुः) नेत्र के तुल्य सबके दिखानेवाले (पुरस्तात्) पूर्वकाल अर्थात् अनादि काल से (उत्, चरत्) उत्कृष्टता के साथ सबके ज्ञाता हैं, (तत्) उस चेतन ब्रह्म आपको (शतम्, शरदः) सौ वर्ष तक (पश्येम) देखें (शतम्, शरदः) सौ वर्ष तक (जीवेम) प्राणों को धारण करें, जीवें (शतम्, शरदः) सौ वर्ष पर्य्यन्त (शृणुयाम) शास्त्रों वा मङ्गल वचनों को सुनें (शतम्, शरदः) सौ वर्ष पर्य्यन्त (प्रब्रवाम) पढ़ावें वा उपदेश करें (शतम्, शरदः) सौ वर्ष पर्य्यन्त (अदीनाः) दीनतारहित (स्याम) हों (च) और (शतात्, शरदः) सौ वर्ष से (भूयः) अधिक भी देखें, जीवें, सुनें, पढ़ें, उपदेश करें और अदीन रहें॥२४॥
भावार्थ
हे परमेश्वर! आपकी कृपा और आपके विज्ञान से आपकी रचना को देखते हुए आपके साथ युक्त नीरोग और सावधान हुए हम लोग समस्त इन्द्रियों से युक्त सौ वर्ष से भी अधिक जीवें, सत्य शास्त्रों और गुणों को सुनें, वेदादि को पढ़ावें, सत्य का उपदेश करें, कभी किसी वस्तु के विना पराधीन न हों, सदैव स्वतन्त्र हुए निरन्तर आनन्द भोगें और दूसरों को आनन्दित करें॥२४॥
विषय
जीवेम् शरद शतम्
व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज
तो यह दोनो प्रकार के जो प्राणी हैं, मानो देखो, जो निम्न कोटि हैं, उनका जो लोक हैं, वह कृष्ण पक्ष है, और जो ऊर्ध्वा में कोटि के प्राणी हैं, कर्मकाण्डी हैं, जो ऊर्ध्वा में गमन करने वाले उनका शुक्ल पक्ष माना गया है। तो विचारक पुरूष कहते हैं, यह दोनो का मिलान होता है तो मिलान हो करके वह भी मुनिवरों! देखो, एक माह बन करके मनका बन जाता है, और वह मनका ही मुनिवरों! देखो, एक वर्ष की कोटि में क्या यह मनका ब्रह्मण देखो, एक माह में छह माह तो ऐसे होते हैं, जो मुनिवरों! देखो, शुक्ल पक्ष के कहलाते हैं और छह माह ऐसे होते हैं जो कृष्ण पक्ष कहलाते हैं परन्तु जब उन दोनों का मिलान होता है, उनका एक वर्ष बन जाता है। वह वर्ष भी मुनिवरों! देखो, मनका कहलाता है। वह सप्तमं ब्रह्मे लोकां वह मेरे प्यारे! देखो, वह मनका बन करके एक वर्ष का मनका बन करके वह शरद शतं बन जाता है। वह मानो देखो, सौ वर्षों का मुनिवरों! देखो, एक माला बन करके मानो देखो, धारण करता है, वह साधारण कोटि का प्राणी कहलाता है।
मेरे प्यारे! देखो, साधारण कोटि का जो प्राणी है, वह यह प्रार्थना करता है कि मैं शरदं बन जाऊं। शरद शतं मेरे प्यारे! जो ऊर्ध्वा में कोटि के प्राणी होते हैं, वह कहते हैं कि क्या प्रभु मेरी तो कोई आयु ही नही है, मानो देखो, मैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष मानो देखो, एक एक माह को एक एक वर्ष को एक एक शरदं में परणित करता हुआ वह अपने जीवन में मानो देखो, कल्प के आगे मैं भी रहूँ, और कल्प समाप्त हो जाएं उसके पश्चात भी मेरी स्मरण शक्ति बनी रहे, और मैं मानो देखो, शरीरों को पंच महा शरीरों को धारण करता रहूँ। परन्तु मेरे सुविचार बने रहें सु धारणा बनी रहें, तो इस प्रकार मुनिवरों! देखो, अपने में प्रार्थी बना रहता है।
तो विचार विनिमय क्या मैं इस सम्बन्ध में विशेष चर्चा न देता हुआ, केवल यह कि आज का हमारा वेदमन्त्र यह कहता है कि हे मानव! तू शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष को विचारक बन करके मानो देखो, तुम्हें अपनी ऊर्ध्वा कोटि को चुनं ब्रहे उसको चुनौती देने का प्रयास कर, जिससे तेरा जीवन एक महानता में परणित हो जाएं। तो मेरे प्यारे! देखो, हमारे यहाँ पूर्व काल में मैं महाभारत की गाथा वर्णन कर रहा था, इसीलिए मानव का अन्न पवित्र होना चाहिए, जो मानव देखो, शुक्ल पक्ष में जाना चाहता है। उस मानव के जीवन में एक मानो देखो, अन्नाद की प्रतिभा होनी चाहिए, वायु का सेवन करना चाहिए, और अन्तरिक्ष में परमाणु बह रहा है। उसका सेवन करना चाहिए, मानो देखो, उसका सेवन करता हुआ साधना में परणित होता रहे। साधक बन करके मेरे प्यारे! देखो, उसका शुक्ल पक्ष सिद्धता को प्राप्त करा देता हैं। वह अपने मानो पंच महाभौतिकता को कोटि में परणित कर देता है, ऊर्ध्वा में गमन कराता रहता है। विचार आता रहता है, बेटा! जो यह स्वीकार करते हैं कि मैं जितना आहार करता हूँ वह भी मेरा है मानो जो मैं दूसरों का भक्षण कर जाता हूँ वह भी मेरा है जब इस प्रकार के देखो, प्राणियों के हृदयों को कष्ट देने वाला प्राणी होता वह निम्न प्रकार का प्राणी होता है, मानो देखो, वह यह विचारता है कि जो मैं आहार कर रहा हूँ जो यह मेरा शरीर है, मैं इसी के पालन पोषण में लगा रहूँ, और इसी के पालन पोषण में मानो देखो, मेरी दैत्य प्रवृत्ति बनी रहे। तो इस प्रकार के जो प्राणी होते है। वह दैत्य प्रवृत्ति वाले कहलाते हैं। तो इसीलिए दोनो पक्ष हमारे लिए विचित्र माने गयें हैं।
विषय
प्रार्थनाविषयः
व्याखान
वह ब्रह्म, (चक्षुः) सर्वदृक् चेतन है तथा (देवहितम्) देव, अर्थात् विद्वानों के लिए वा मन आदि इन्द्रियों के लिए हितकारक मोक्षादि सुख का दाता है, (पुरस्तात्) सबका आदि-प्रथम कारण वही है (शुक्रम्) सबका करनेवाला किंवा शुद्धस्वरूप है। (उच्चरत्) प्रलय के ऊर्ध्व वही रहता है, उसी की कृपा से हम लोग (पश्येम शरदः शतम्) शत (१००) वर्ष तक देखें, (जीवेम्) जीवें, 66. (शृणुयाम) सुनें, (प्रब्रवाम) कहें, (अदीनाः स्याम) कभी पराधीन न हों, अर्थात् ब्रह्मज्ञान, बुद्धि और पराक्रमसहित इन्द्रिय तथा शरीर सब स्वस्थ रहें, ऐसी कृपा आप करें कि मेरा कोई अङ्ग निर्बल [क्षीण] और रोगयुक्त न हो तथा भूयः च शरदः शतात्" शत (१०० वर्ष) से अधिक भी आप कृपा करें कि शत (१००) वर्ष के उपरान्त भी हम देखें, जीवें, सुनें, कहें और स्वाधीन ही रहें ॥ ३७ ॥
भावार्थ
(तत्) बह ( देवहितम् ) देवों-विद्वानों का हितकारक, ( पुरस्तात् ) सर्वत्र समक्ष ( शुक्रम् ) शीघ्र कार्य करने में कुशल एवं शुद्ध, तेजस्वी, (चक्षुः) आंख के समान सबका निरीक्षक, सर्वाध्यक्ष होकर ( उत् चरत् ) सब उत्तम पद पर विराजे और कार्य करे । उसी प्रकार परमेश्वर भी ( पुरस्तात् ) पूर्व काल से ही शुद्ध सर्वज्ञ देवों विद्वानों का हितकारी ( उत्चरत्) सब से उच्च है । वह सर्वद्रष्टा, सबको आंख के समान पदार्थं निदर्शक रहकर शुद्ध तेज प्रदान करता है । उसी के प्रताप से हम ( शरद: शतम् ) सौ बरसों तक ( पश्येम ) देखें । ( शरदः शतं शृणुयाम) सौ बरसों तक श्रवण करें। (शरदः शतं प्र वाम) सौ बरसों तक उत्तम रीति से बोलें । (शरदः शतम् अदीनाः स्याम) सौ बरसों तक दीनता रहित होकर रहें। (शरदः शतात् भूयः च) और सौ बरसों से भी अधिक वर्षो तक हम देखें, जोवे, सुने, बोलें और अदीन होकर रहें ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
सूर्य: । भुरिग ब्राह्मी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
Bhajan
आज का वैदिक भजन 🙏 1082
ओ३म् तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत् । पश्ये॑म श॒रद॑: श॒तं जीवे॑म श॒रद॑: श॒तᳪ शृणु॑याम श॒रद॑: श॒तं प्र ब्र॑वाम श॒रद॑: श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रद॑: श॒तं भूय॑श्च श॒रद॑: श॒तात् ।। २४ ।।
यजुर्वेद 36/24
ओ३म् तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं शु॒क्रमु॒च्चर॑त् । पश्ये॑म श॒रद॑: श॒तं जीवे॑म श॒रद॑: श॒तम् ॥
ऋग्वेद 7/66/16
जग की आँख है अंशुमाली
शुक्र ज्योति में वो विभासे,
ज्योति बन के हित करें प्रभु,
प्रेरणाओं से जगाते
जग की आँख है अंशुमाली
निज प्रकाश से सर्वजगत् को,
देता दर्शन शक्ति वो,
वो है परम विशुद्ध चक्षु,
आदिकाल से सदा प्रभासे
जग की आँख है अंशुमाली
हित करे उन मानवों का,
जिनमें देव स्वभाव उत्तम,
ज्ञान और विज्ञान देकर,
निज प्रकाश में ढा़लते
जग की आँख है अंशुमाली
आओ !!! अन्तर नेत्रों से,
इस सूर्य को अनुभव करें,
दिव्य सूर्य का ज्ञान ले हम
सौ बरस जिया करें
जग की आँख है अंशुमाली
सौ बरस तक प्रभु कृपा से,
प्राणों को धारण करें,
सौ बरस तक आचरण हो,
शुद्धतम व्यवहार करें
जग की आँख है अंशुमाली
आत्म-दृष्टा के ही सम्मुख,
सौ बरस जीवें सुनें,
सौ बरस होवे प्रवचन
हो अदीन हर प्रकार से
जग की आँख है अंशुमाली
हों सबल यदि देह आत्मा,
आयु सौ से अधिक जियें ,
देख सुन बोलें जियें हम,
होवें वित्तपति प्रयास से
जग की आँख है अंशुमाली
शुक्र ज्योति में वो विभासे,
ज्योति बन के हित करें प्रभु,
प्रेरणाओं से जगाते
जग की आँख है अंशुमाली
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
रचना दिनाँक :- १९.७.२००१ १०.०५ pm
*राग :- *
शीर्षक :- वह सर्व हितकारी है
*तर्ज :- *
702-0103
अंशुमाली = सूर्य
शुक्र ज्योति = अग्नि स्वरूप ज्योति
विभास = चमक
अदीन = दीनाडा रहित, धनी
वित्तपति = महाधनी, कुबेर
Vyakhya
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :-- 👇👇
वह सर्व हितकारी है
देखो सामने यह सूर्य यह संसार की आंख यह देवों का हितकारी प्रभु अपने निर्मल शुक्र प्रकाश में चमक रहा है। उदित हो रहा है। नहीं और गंभीरता से देखो वह महान सूर्य प्रेरक प्रभु हममें से प्रत्येक के सम्मुख सदा उदयमान रहता है। अपने प्रकाश से संसार को दर्शन शक्ति देता हुआ सदा सब देव स्वभाव मनुष्यों का निरन्तर हित करता हुआ यह परम विशुद्ध चक्षु अनादि काल से चमक रहा है।
आओ मनुष्यों आओ हम इस सूर्य को देखते हुए 100 वर्ष तक जीते रहें। हम 100 वर्ष तक इस दिव्य सूर्य को अन्तर- नेत्रों से अनुभव करते रहें, और 100 वर्ष तक उसकी अनुकूलता में प्राणों को धारण करते रहें। ओह! यदि हम याद रखें कि वह आंख हमें सदा देख रही है। वह विशुद्ध चक्षु हमें निरन्तर ठीक ठीक जान रही है। तो हम क्यों ना विशुद्ध आचरण वाले होंगे? और क्यों ना पूरे 100 वर्ष तक जीने वाले होंगे ? यदि हम ध्यान रखें कि वह देवों का हित चक्षु निरन्तर हमारी अध्यक्षता कर रहा है, तो हम क्यों ना दिव्य आचरण वाले होंगे?क्यों न 100 वर्ष तक दिव्य जीवन ही बिताएंगे?
तो भाइयों आओ हम उस सूर्य के प्रकाश में 100 वर्ष देखें 100 वर्ष तक जीयें, उस दिव्य आंख के नीचे 100 वर्ष तक सुने 100 वर्ष तक प्रवचन करें और उसकी ही अध्यक्षता में 100 वर्ष तक अधीन स्वावलम्बी और उत्साह पूर्ण जीवन व्यतीत करें। उस की अध्यक्षता में रहना और दीन- पराधीन होना यह कैसे हो सकता है ?
नहीं नहीं हम तो 100 वर्षों से भी अधिक देर तक देखते और जीते हुए सुनते और सुनाते हुए और अपराधीन पुरुषार्थ में पूर्ण जीवन बिताएंगे,एवं अदीन होकर हम सब वर्ष से भी अधिक जिएंगेअवश्य 100 वर्ष से भी अधिक जीयेंगे।
विषय
अदीनता
पदार्थ
१. (तत्) = वह (चक्षुः) = सब पदार्थों के तत्त्व का दर्शक वेदज्ञान, जो (देवहितम्) = देवों में निहित होता है और देवों के लिए हितकर होता है, जो (शुक्रम्) = [ शुच् दीप्तौ ] सर्वतः देदीप्यमान है - शुद्ध है - निर्भान्त है, वह वेदज्ञान पुरस्तात् सृष्टि के प्रारम्भ में (उच्चरत्) = उच्चारण किया गया। पुरस्तात् वेदज्ञान के सृष्टि के प्रारम्भ में दिये जाने की आवश्यकता स्पष्ट है। मनुष्य का ज्ञान नैमित्तिक है- 'यदि उसे ज्ञान न दिया जाए तो वह उसे स्वयं विकसित कर लेगा' ऐसी सम्भावना नहीं है। गूँगी बहरी दासियों से वन में पाले गये बच्चे केवल मैं-मैं करना ही सीखे, क्योंकि उनके समीप बकरियाँ बँधी थी। वेद से प्राचीन कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। इन दोनों तथ्यों से यही परिणाम प्राप्त होता है कि 'वेदज्ञान सृष्टि के प्रारम्भ में दिया गया'। (देवहितम्) = [क] प्रभु ने इस वेदज्ञान को देवों के हृदय में स्थापित किया । ('यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्') जो श्रेष्ठ व निर्दोष थे, उन्हीं के हृदयों में वेदज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ। [ख] यह वेदज्ञान देवों का ही हितकर होता है। जो इस वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं उन्हीं देवों को इसका लाभ प्राप्त होता है। हम (शरदः शतम्) = सौ-के-सौ वर्ष - पर्यन्त (पश्येम) = इस वेदज्ञान को देखें। हम वेदों को पढ़ें, इनका नियमित स्वध्याय करें। (शरदः शतम्) = सौ-के-सौ वर्षपर्यन्त जीवेम इन वेदों को ही जीने का प्रयत्न करें, अर्थात् अपने जीवन को वेदानुसार बनाने के लिए यत्नशील हों। वेद को अपने जीवन में घटाने की कोशिश करना ही अपने जीवन को वेद पढ़ाना है। वेद को जीने का प्रयत्न करेंगे तभी लाभ होगा। (शरदः शतम्) = सौ वर्षपर्यन्त (शृणुयाम) = हम इन वेदों को सुनें तथा (शरदः शतम्) = सौ वर्ष पर्यन्त इन वेदों का ही (प्रब्रवाम) = प्रवचन करें, अर्थात् वेदोपदेश ही सुनें और सुनाएँ । शुभ की कथा शुभ प्रभाव को उत्पन्न करेगी ही । आचार्य ने इन्हीं शब्दों को ध्यान में रखते हुए इसे परमधर्म माना कि वे वेद पढ़ें [पश्येम] पढ़ाएँ [जीवेम] सुनें [शृणुयाम] सुनाएँ [प्रब्रवाम] ३. इस प्रकार वेदज्ञान का हमारे जीवनों पर यह परिणाम हो कि हम (शरदः शतम्) = सौ-के-सौ वर्षपर्यन्त (अदीनाः स्याम) = अदीन हों। हममें हीनता की भावना न हो। हम कृपण व अनात्मज्ञ न हों। अपनी महिमा को अनुभव करें। व्यावहारिक जगत् में न दबें न दबायें, न खुशामद करें और न ही खुशामद पसन्द हों। (शरदः शतात् भूयः च) = सौ से अधिक वर्ष भी हमारे जीवन इसी प्रकार वेद के पढ़ने-पढ़ाने व सुनने-सुनाने में व्यतीत हों और हम अदीन बने रहें। हमें सच्ची शान्ति इसी प्रकार प्राप्त होगी। वेदज्ञान ही मौलिक शान्ति देनेवाला है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु ने सृष्टि- आरम्भ में इस वेदज्ञान का उच्चारण किया है। हमें इसी के पढ़ने-पढ़ाने व सुनने सुनाने में लग जाना चाहिए और सदा अदीनतापूर्वक वर्त्तना चाहिए।
मन्त्रार्थ
(देवहितं तत्-शुक्रं चतुः पुरस्तात्-उच्चरत्) विद्वानों के हितकर वह शुभ्र ब्रह्म ज्योति सृष्टि के पूर्व से वर्तमान मेरे मन में प्रकाशित हुआ-हो रहा है या सूर्य ज्योति पूर्व दिशा से उदय हुआ होता है (शतं शरदः पश्येम) सौ शरद ऋतुओं-वर्षो तक उस ब्रह्म ज्योति को देखें अध्यात्म दृष्टि से या सूर्य ज्योति को नेत्रदृष्टि से देखें (शतं शरदः-जीवेम)उसे देखते हुए सौ वर्षों तक जीवें (शतं शरद:-शृणुयाम) सौ वर्षों तक सुनें (शतं शरदः प्रब्रवाम) सौ वर्षों तक प्रकृष्ट बोलें-प्रवचन करें (शतं शरद:-अदीनाः स्याम) सौ वर्षो तक दीनतारहित हों-रहें (शतात्-शरदः-भूयः) सौ वर्षों से भी अधिक वैसे ही देखते हुए प्राणों को धारण करते हुए सुनते हुए बोलते हुए दीनतारहित होते हुए रहें ॥२४॥
टिप्पणी
“सुपां सु॰`````डियाच्" (अष्टा० ७।१।३६ ) इति डियाच प्रत्ययो जसः स्थाने ।
विशेष
ऋषिः—दध्यङङाथर्वणः (ध्यानशील स्थिर मन बाला) १, २, ७-१२, १७-१९, २१-२४ । विश्वामित्र: (सर्वमित्र) ३ वामदेव: (भजनीय देव) ४-६। मेधातिथिः (मेधा से प्रगतिकर्ता) १३। सिन्धुद्वीप: (स्यन्दनशील प्रवाहों के मध्य में द्वीप वाला अर्थात् विषयधारा और अध्यात्मधारा के बीच में वर्तमान जन) १४-१६। लोपामुद्रा (विवाह-योग्य अक्षतयोनि सुन्दरी एवं ब्रह्मचारिणी)२०। देवता-अग्निः १, २०। बृहस्पतिः २। सविता ३। इन्द्र ४-८ मित्रादयो लिङ्गोक्ताः ९। वातादयः ९० । लिङ्गोक्ताः ११। आपः १२, १४-१६। पृथिवी १३। ईश्वरः १७-१९, २१,२२। सोमः २३। सूर्यः २४ ॥
मराठी (3)
भावार्थ
हे परमेश्वरा ! तुझ्या कृपेने विज्ञानयुक्त सृष्टिरचनेला पाहून निरोगी इंद्रियांनी सावधान राहून शंभर वर्षांपेक्षा जास्त वागावे. सत्य शास्रे वाचावी. तुझे गुण श्रवण करावे. वेद इत्यादींचा उपदेश करावा. कोणत्याही वस्तूच्या अधीन होऊ नये. सदैव स्वतंत्र राहून आनंद भोगावा व इतरांनाही आनंदी करावे.
विषय
आता पुढील मंत्रात ईश्वराची प्रार्थना केली आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे परमेश्वर, आपण (देवहितम्) विद्वज्जनांचे हितकर्ता असून (शुक्रम्) सर्वथा शुद्ध आहात. (चक्षुः) नेत्राप्रमाणे आम्हाला नेत्राप्रमाणे हे सर्व जग दाखविणारे असून (पुरस्तात्) पूर्वीपासून म्हणजे अनादिकाळापासून (उत्, चरत्) उत्तम रीतीने सर्वकाही जाणणारे आहात. (आम्ही आपणांस अशी प्रार्थना करतो की आम्ही) (तत्) त्या चेतम ब्रह्म असलेल्या आपरास (शरदः शतम्) शंभर वर्षापर्यंत (पश्येम) पाहू (आपण निर्माण केलेल्या या सृष्टीत पाहू अथवा सृष्टीतील पदार्थात आपले अस्तित्व पाहू) ((शरदः शतम्) शंभर वर्षापर्यंत (जीवमे) प्राण धारण करून जीवित राहू (शरदः शतम्) शंभर वर्षापर्यंत (शृणुयाम) शास्त्रवाचन वा मंगलमय वाणी ऐकू (शरदः शतम्) शंभर वर्षापर्यंत (प्रब्रवाम) अध्यापन करू वा उपदेश करू (शरदः शतम्) शंभर वर्षापर्यंत (अदीना) दैन्य-दारिद्यापासून दूर (स्याम) असू (च) आणि (शरदः शतम्) शंभर वर्षापर्यंत अधिक काळ पाहू, जिवंत राहू ऐकू, अध्यापन आणि उपदेश करू आणि अदीन होऊन राहू (दीन वा केविलवाणे जीवन, मग ते शंभर वर्षाचे का असे ना, आम्हास नको.) ॥24॥
भावार्थ
भावार्थ - हे परमेश्वर, आपल्या कृपेने आम्ही (आपले उपासक) आपण दिलेल्या वा देत असलेल्या ज्ञान-विज्ञानाद्वारे आपली सृष्टीरचना पाहत नीरोग आणि जागरूक राहू, आमची सर्व इन्द्रिये अबाधित राहून आम्ही शंभर वर्षाहून अधिक काळ जीवित राहू, सत्य शास्त्र आणि आपल्या गुणांचे वर्णन ऐकू, वेदादी शास्त्रांचे अध्यापन करू, सत्याचा वा सत्य उपदेश करू, कोणत्याही बाबतीत आम्ही परावलंबी असू नये. सदैव स्वाधीन राहून आम्ही नित्य आनंदाचा उपभोग आणि आम्ही ही मागणी करीत आहोत. ॥24॥
टिप्पणी
या अध्यायात परमेश्वराची प्रार्थना, सर्वांसाठी सुखाची कामना, पारस्परिक मैत्रीची आवश्यकता, दिनचर्या, धर्माचे लक्षण, आयुष्य अधिक वाढविणे आणि परमेश्वराला जाणणे याविषयांचे वर्णन केले आहे. या अध्यायाच्या (३६ व्या) अर्थाची संगती या पुर्वीच्या (35 व्या) अध्यायाशी आहे, असे जाणावे. ^यजुर्वेद हिन्दी भाष्याचा ३६ व्या अध्यायाचा मराठी अनुवाद समाप्त
विषय
प्रार्थना
व्याखान
(चक्षुः) ब्रह्म ही सर्वद्रष्टा अशी चेतन शक्ती आहे. (देव) अर्थात मन व इंद्रियांचे हित करणारे असून विद्वानांना मोक्षसुख देणारे आहे. (पुरस्तात्) सर्वांचे आदिकरण तेच असून (शुक्रम्) सर्वांचा कर्ता आहे. ते सुखस्वरूप आहे. (उच्चरत) प्रलयामध्ये तेच ब्रह्म [उर्ध्व] उरते. त्याच्या कृपेने आम्ही शंभर वर्षापर्यंत पाहावे जगावे, ऐकावे बोलावे. कधीही पराधीन होता कामा नये. ब्रह्मज्ञान, बुद्धी, व पराक्रम इत्यादींनी युक्त इंद्रिये मिळावीत व शरीर स्वस्थ रहावे माझे कोणतेच अंग क्षीण होऊ नये. मी रोगी बनू नये, अशी तू कृपा का. शंभरवर्षापेक्षा जास्त आम्ही पहावे, जगावे, ऐकावे, व बोलावे आणि पराधीन न राहता स्वाधीन असावे.॥३७॥
इंग्लिश (4)
Meaning
O God, Thou art the well-wisher of the learned. Immaculate, the Exhibitor of every thing like the eye, the Eternal knower of every thing. Through Thy kindness may we see for a hundred years; may we live for a hundred years; may we listen for a hundred years to vedic lore; may we preach the Vedas for a hundred years; may we live content independently for a hundred years; yea, even beyond a hundred years, see, live, hear, preach and be not dependent.
Meaning
That light divine, blissful to the divinities, pure and wide awake since eternity, may we continue to see for a full hundred years, live under its benign eye for a hundred years, hear for a hundred years, speak and celebrate for a hundred years, and be fit and fine in a state of freedom and independence for a hundred years, and even more than a hundred years!
Purport
The Almighty God sees or looks in all the directions, and is Absolute by intelligence conscious. He is beneficial for mind and sense-organs and bestower of supreme bliss for the learned. He is the primitivie cause of all. He is the Creator of the whole universe. He is pure by nature. He exists even after the dissolution of the world. By His grace we should see, hear and speak for a full span of hundred years. We should never be dependent on others. Grant us divine knowledge or intellect, sense-organs with valour and our body be sound and healthy. O God! Be kind so that no part or limb of our body be feeble or diseased. Have a Glance of Mercy so that even after a life of hundred years we may see, live, hear, speak and live ve, hear, independently.
Translation
May we be fortunate enough to look at the eye, set up by the bounties of Nature, rising brightly in front of us for a hundred autumns; may we live for a hundred autumns; may our hearing remain unimparied for a hundred autumns; may we speak clearly for a hundred autumns; may we never be indigent in a life span of a hundred autumns, and even much more than a hundred autumns. (1)
Notes
Devahitam, देवैर्हितं स्थापितं, placed or appointed by gods or God. Also, देवेभ्यो हितं, beneficial for gods, or for the bounties of Nature. Also, देवानां हितं प्रियं, dear to gods. Purastāt, in front of us. Also, in the east. Uccarat, rising up. Pasyema, may we behold or look at. Bhūyasca śaradaḥ śatāt, even much more than a hundred autumns. Saradaḥ śatam, a hundred autumns, i. e. a hundred years.
बंगाली (1)
विषय
অথেশ্বরপ্রার্থনাবিষয়মাহ ॥
এখন ঈশ্বরের প্রার্থনার বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে পরমেশ্বর ! আপনি যে (দেবহিতম্) বিদ্বান্দিগের জন্য হিতকারী (শুক্রম্) শুদ্ধ (চক্ষুঃ) নেত্রতুল্য সর্বদর্শক (পুরস্তাৎ) পূর্বকাল অর্থাৎ অনাদি কাল হইতে (উৎচরৎ) উৎকৃষ্টতা সহ সকলের জ্ঞাতা, (তৎ) সেই চেতন ব্রহ্ম আপনাকে (শতম্, শরদঃ) শতবর্ষ পর্যন্ত (পশ্যেম) দেখিব, (শতম্, শরদঃ) শত বর্ষ পর্যন্ত (জীবেম) প্রাণসকলকে ধারণ করিব, বাঁচিব, (শতম্, শরদঃ) শতবর্ষ পর্য্যন্ত (শৃণুয়াম) শাস্ত্র বা মঙ্গল বচনগুলিকে শ্রবণ করিব (শতম্, শরদঃ) শত বর্ষ পর্য্যন্ত (প্রব্রয়াম) পড়াইব বা উপদেশ করিব (শতম, শরদঃ) শত বর্ষ পর্য্যন্ত (অদীনাঃ) দীনতারহিত (স্যাম) হইব (চ) এবং (শতাৎ, শরদঃ) শতবর্ষ হইতে (ভূয়ঃ) অধিকও দেখিব, বাঁচিব, শুনিব, পড়িব, উপদেশ করিব এবং অদীন থাকিব ॥ ২৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- হে পরমেশ্বর ! আপনার কৃপা ও আপনার বিজ্ঞান বলে আপনার রচনাকে দেখিয়া আপনার সঙ্গে যুক্ত নীরোগ ও সাবধান হইয়া আমরা সমস্ত ইন্দ্রিয় দ্বারা যুক্ত শতবর্ষ অপেক্ষা অধিক বাঁচিব, সত্য শাস্ত্র ও আপনার গুণকে শুনিব, বেদাদিকে পড়াইব, সত্যের উপদেশ করিব, কখনও কোন বস্তু বিনা পরাধীন না হই, সর্বদা স্বতন্ত্র হইয়া নিরন্তর আনন্দ ভোগ করি এবং এবং অন্যকে আনন্দিত করি ॥ ২৪ ॥
এই অধ্যায়ে পরমেশ্বরের প্রার্থনা, (সদ্গুণাবাপ্তি) সকলের সুখের আভাস, পরস্পর মিত্রতা করিবার প্রয়োজনীয়তা, দিনচর্য্যার শোধন, ধর্মের লক্ষণ, ব্যবস্থার বৃদ্ধি করা এবং পরমেশ্বর কে জানা বলা হইয়াছে, ইহাতে এই অধ্যায়ের অর্থের পূর্ব অধ্যায়ে কথিত অর্থ সহ সঙ্গতি আছে, এইরূপ জানিবে ॥
ইতি শ্রীমৎপরমহংসপরিব্রাজকাচার্য়াণাং পরমবিদুষাং শ্রীয়ুতবিরজানন্দসরস্বতীস্বামিনাং শিষ্যেণ পরমহংসপরিব্রাজকাচার্য়েণ শ্রীমদ্দয়ানন্দসরস্বতীস্বামিনা নির্মিতে সুপ্রমাণয়ুক্তে সংস্কৃতার্য়্যভাষাভ্যাং বিভূষিতে
য়জুর্বেদভাষ্যে ষট্ত্রিংশোऽধ্যায়ঃ পূর্ত্তিমগাৎ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
তচ্চক্ষু॑র্দে॒বহি॑তং পু॒রস্তা॑চ্ছু॒ক্রমুচ্চ॑রৎ । পশ্যে॑ম শ॒রদঃ॑ শ॒তং জীবে॑ম শ॒রদঃ॑ শ॒তꣳ শৃণু॑য়াম শ॒রদঃ॑ শ॒তং প্র ব্র॑বাম শ॒রদঃ॑ শ॒তমদী॑নাঃ স্যাম শ॒রদঃ॑ শ॒তং ভূয়॑শ্চ শ॒রদঃ॑ শ॒তাৎ ॥ ২৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
তচ্চক্ষুরিত্যস্য দধ্যঙ্ঙাথর্বণ ঋষিঃ । সূর্য়ো দেবতা । ভুরিগ্ ব্রাহ্মী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ । ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
नेपाली (1)
विषय
प्रार्थनाविषयः
व्याखान
त्यो ब्रह्म, चक्षुः सर्वदृक् चेतन छ तथा देवहितम् देव अर्थात् विद्वान् हरु का लागी वा मन आदि इन्द्रिय हरु का लागि हितकारक मोक्षादि सुख को दाता हो । पुरस्तात् =सबैको आदि=प्रथम कारण उही हो । शुक्रम् = सबैको कर्ता किंवा शु द्धस्वरूप छ उच्चरत्=प्रलय पछि उही रहन्छ, उसैको कृपा ले हामीहरु पश्येम शरदः शतम्= शये वर्ष सम्म देखौं, जीवेम= बाँचौ, श्रृणुयाम = सुनौं, प्रब्रवाम = बोलौं, अदीनाः स्याम = कहिल्यै पराधीन नहौं, अर्थात् ब्रह्मज्ञान, बुद्धि र पराक्रम सहित इन्द्रिय तथा शरीर सबै स्वस्थ रहून् तपाईंले एसतो कृपा गर्नुहोस् कि हाम्रा कुनै अंङ्ग निर्बल [क्षीण] र रोगयुक्त न हुन् तथा भूयः च शरदः शतात्= तपाईंले कृपा गर्नु होला शयेवर्ष भन्दा पनि बढी हामी देखौं, बाँचौं, सुनौ, बोलौं र स्वाधीन रहौं ॥३७॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal