ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 53/ मन्त्र 17
ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा
देवता - रथाङ्गानि
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
स्थि॒रौ गावौ॑ भवतां वी॒ळुरक्षो॒ मेषा वि व॑र्हि॒ मा यु॒गं वि शा॑रि। इन्द्रः॑ पात॒ल्ये॑ ददतां॒ शरी॑तो॒ररि॑ष्टनेमे अ॒भि नः॑ सचस्व॥
स्वर सहित पद पाठस्थि॒रौ । गावौ॑ । भ॒व॒ता॒म् । वी॒ळुः । अक्षः॑ । मा । ई॒षा । वि । व॒र्हि॒ । मा । यु॒गम् । वि । शा॒रि॒ । इन्द्रः॑ । पा॒त॒ल्ये॒ इति॑ । द॒द॒ता॒म् । शरी॑तोः । अरि॑ष्टऽनेमे । अ॒भि । नः॒ । स॒च॒स्व॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
स्थिरौ गावौ भवतां वीळुरक्षो मेषा वि वर्हि मा युगं वि शारि। इन्द्रः पातल्ये ददतां शरीतोररिष्टनेमे अभि नः सचस्व॥
स्वर रहित पद पाठस्थिरौ। गावौ। भवताम्। वीळुः। अक्षः। मा। ईषा। वि। वर्हि। मा। युगम्। वि। शारि। इन्द्रः। पातल्ये३ इति। ददताम्। शरीतोः। अरिष्टऽनेमे। अभि। नः। सचस्व॥
ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 53; मन्त्र » 17
अष्टक » 3; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 2
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अष्टक » 3; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह।
अन्वयः
हे अरिष्टनेमे भवानिन्द्रः शरीतोः सन् पातल्ये ददतां वीळुरक्ष ईषा सन् स्थिरौ गावौ मा वि शारि युगं मा वि वर्हि यतः स्थिरौ गावौ भवतां तस्मात्त्वं नोऽभि सचस्व ॥१७॥
पदार्थः
(स्थिरौ) निश्चलौ (गावौ) वृषभौ (भवताम्) (वीळुः) प्रशंसितः (अक्षः) इन्द्रियछिद्रम् (मा) निषेधे (ईषा) हिंसकः (वि) (वर्हि) उत्सन्नाभूत् (मा) (युगम्) वर्षम् (वि) (शारि) हिंस्यात् (इन्द्रः) ऐश्वर्य्यवान् (पातल्ये) पतनशीले (ददताम्) (शरीतोः) शरीतुं दुष्टस्वभावं हिंसितुं शक्नोति (अरिष्टनेमे) योऽरिष्टान्यहिंसितानि कर्माणि नयति तत्सम्बुद्धौ (अभि) (नः) अस्मान् (सचस्व) ॥१७॥
भावार्थः
मनुष्यैर्महोपकारका गवादयः पशवः कदाचिन्नो हिंसनीयः। व्यर्थः समयश्च न गमनीयः सद्भिः सह सदैव सन्धी रक्षणीयः ॥१७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
पदार्थ
हे (अरिष्टनेमे) नहीं नाश होनेवाले कर्मों को प्राप्त करानेवाले ! आप (इन्द्रः) ऐश्वर्यवाले (शरीतोः) दुष्ट स्वभाव से युक्त के नाश करने में समर्थ हुए (पातल्ये) गिरनेवाले में (ददताम्) दीजिये और (वीळुः) प्रशंसायुक्त (अक्षः) इन्द्रिय के छिद्र को (ईषा) नाश करनेवाला हुआ (स्थिरौ) निश्चल (गावौ) बैलों का (मा) नहीं (वि, शारि) नाश करे (युगम्) वर्ष को (मा) नहीं (वि, वर्हि) बन्ध्या हो जिससे कि निश्चल बैल (भवताम्) होवें जिससे आप (नः) हम लोगों से (अभि, सचस्व) सब प्रकार मिलो ॥१७॥
भावार्थ
मनुष्यों को चाहिये कि बड़े उपकार करनेवाले गौ आदि पशुओं का कभी नाश नहीं करें और व्यर्थ समय न बितावें, श्रेष्ठ पुरुषों के साथ सदा ही मेल की रक्षा करें ॥१७॥
विषय
शरीर-रथ का ठीक होना
पदार्थ
[१] गतमन्त्र के अनुसार ज्ञान प्राप्त करके उसके अनुसार सब व्यवहार करता हुआ पुरुष प्रार्थना करता है कि (गावौ) = शरीर-रथ में जुते हुए इन्द्रियरूप बैल [ज्ञानेन्द्रियाँ एक गौ हैं, कर्मेन्द्रियाँ दूसरा] (स्थिरौ भवताम्) = स्थिर हों। हमारी इन्द्रियशक्ति बड़ी ठीक बनी रहे। (अक्ष:) = [axle pole] मनरूप अक्ष-दण्ड (वीडुः) = बड़ा दृढ़ हो । (ईषा) = [the pole of a cart] बुद्धिरूप रथदण्ड (मा विवर्हि) = हिंसित न हो जाए। (युगम्) = ज्ञान व श्रद्धा का युग [yoke] (मा विशारि) = शीर्ण न हो । इस प्रकार यह शरीर रथ बड़ा ही सुन्दर बना रहे । [२] (इन्द्र:) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (पातल्ये) = पतनशील ग्रन्थिरूप कीलकों में (शरीतो: प्राक्) = शीर्णता से पूर्व ही (ददताम्) = धारण करनेवाले हों। प्रभु कृपा से शरीर में सब glands [ग्रन्थियाँ] ठीक काम करती रहें। हे (अरिष्टनेमे) = अहिंसित परिधियोंवाले रथ! (नः) = हमें (अभिसचस्व) = अभ्युदय व निः श्रेयस दोनों के दृष्टिकोण से सेवित करनेवाला हो। इस शरीरूप रथ द्वारा हम अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों को सिद्ध करनेवाले हों।
भावार्थ
भावार्थ- हमारा शरीररूपी रथ बड़ा सुन्दर बना रहे ।
विषय
रथवत् राष्ट्र, गृहाश्रम, और बैलोंवत् शास्य-शासन और स्त्री पुरुषों का वर्णन। उनके कर्त्तव्य।
भावार्थ
स्त्री और पुरुषो ! राजा और प्रजाजन ! दोनों (स्थिरौ) स्थिर, उत्तम स्थितिमान् होकर भी (गावौ) एक दूसरे के पास जाने वाले एक दूसरे को प्राप्त (भवताम्) होओ। अथवा वे दोनों गौ और वृषभ के समान वा रथमें लगे दो बलवान् बैलों के समान सम्भालने में समर्थ होवें। (अक्षः वीडुः) रथ में लगे अक्ष अर्थात् धुरा के समान (अक्षः) तुम पर चक्षु के समानद्रष्टा, सर्वाश्रय पुरुष बलवान् वीर्यवान् हो। (ईषा) रथमें लगे ईषा दण्ड के समान आगे २ चलने वाली या विघ्नों और कष्टकारी बाधक कारणों का नाश करने वाली दर्शनीय स्त्री (मा वि वर्हि) गृह से उत्सन्न न हो, उखड़ न जाय, वह उच्छिन्न हृदय न होजाय। (युगम्) रथ के जुए के समान परस्पर का जोड़ा (मा वि शारि) कभी एक दूसरे से विरुद्ध होकर नष्ट न हो, टूट फूट न पड़े। एक दूसरे का ताड़न न करें। (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् पुरुष (पातल्ये) गिरने वालों को, मर्यादा से च्युत होने वालों को (शरीतोः) विनाश होने से पूर्व ही (ददताम्) योग्य जीवन सामग्री प्रदान करे वा बचावे। हे (अरिष्टनेमे) ‘अरिष्ट’ अर्थात् हिंसन, पीड़नादि से रहित मङ्गलमय मार्ग में लेजाने वाले नायक ! (नः) हमें तू (अभिसचस्व) सदा प्राप्त हो। राष्ट्रपक्ष में—(गावौ) राजा प्रजा दोनों स्थिर हों, (अक्षः) अध्यक्ष वीर्यवान् हो, (ईषा) शत्रु विपरीत उद्योगशाली न हो। (युगः) परस्पर के सन्धि सम्बन्ध शिथिल न हों। गिरतों को विनष्ट होने से हिंसक सेना (मा वि वहि) बचावे। सन्मार्ग का नायक हमें सब प्रकार से समवाय से संगठित करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वामित्र ऋषिः॥ १ इन्द्रापर्वतौ। २–१४, २१-२४ इन्द्रः। १५, १६ वाक्। १७—२० रथाङ्गानि देवताः॥ छन्दः- १, ५,९, २१ निचृत्त्रिष्टुप्। २, ६, ७, १४, १७, १९, २३, २४ त्रिष्टुप्। ३, ४, ८, १५ स्वराट् त्रिष्टुप्। ११ भुरिक् त्रिष्टुप्। १२,२२ अनुष्टुप्। २० भुरिगनुष्टुप्। १०,१६ निचृज्जगती। १३ निचृद्गायत्री। १८ निचृद् बृहती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्।
मराठी (1)
भावार्थ
माणसांनी उपकार करणाऱ्या गायी इत्यादी पशूंचा कधी नाश करू नये व व्यर्थ वेळ घालवू नये. श्रेष्ठ पुरुषांबरोबर सदैव संपर्क ठेवावा. ॥ १७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Let the oxen of the chariot be strong and steady, let the axle be strong, let the shaft never break, may the yoke never be damaged, May Indra, lord of inviolable chariot and action, be friendly with us to give us strength and to renew whatever is wearing out.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The enlightened persons' set tasks are stated.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O leader of non-violent and inviolable good actions ! being endowed with wealth and the power of destroying the wicked, give helping hand to him, who is faltering down. Strong be the pair of oxen, and be firm the axles. Let not the pole slip nor the yoke be broken. May no slaughterer slay the oxen and the cows. May not the year or any part of it be wasted uselessly. Preserve the yoke pins from decay. Car with undamaged fellies be ready for us.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Men should never kill benevolent animals like the cows and the oxen. They should also never waste their time. They should always have loving relations with good men.
Foot Notes
(ईषा) हिन्सकः = A violent person, a slaughterer, butcher. (पातल्ये) पतनशीले । = Falling. (शरीतो:) शरीतु दुष्टस्वभावं हिंसितु शक्नोति । = Able to destroy the wicked. (अरिष्टनेमे ) योऽरिष्टान्यहिंसितानि कर्माणि नयति तत्सम्बुद्धौ = He who is leader of the non-violent or inviolable good actions. It is not strange on the part of Shri Sayanacharya to have translated गावो here as गच्छत:इति गावो अश्वौ means Horses (2). Prof. Wilson followed it as "may the horses be steady". But Griffith has rightly translated it as "Strong be the pair of Oxen." Rishi Dayananda also did the same.
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