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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 53/ मन्त्र 9
    ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    म॒हाँ ऋषि॑र्देव॒जा दे॒वजू॒तोऽस्त॑भ्ना॒त्सिन्धु॑मर्ण॒वं नृ॒चक्षाः॑। वि॒श्वामि॑त्रो॒ यदव॑हत्सु॒दास॒मप्रि॑यायत कुशि॒केभि॒रिन्द्रः॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    म॒हान् । ऋषिः॑ । दे॒व॒ऽजाः । दे॒वऽजू॑तः । अस्त॑भ्नात् । सिन्धु॑म् । अ॒र्ण॒वम् । नृ॒ऽचक्षाः॑ । वि॒श्वामि॑त्रः । यत् । अव॑हत् । सु॒ऽदास॑म् । अप्रि॑यायत । कु॒शि॒केभिः॑ । इन्द्रः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः। विश्वामित्रो यदवहत्सुदासमप्रियायत कुशिकेभिरिन्द्रः॥

    स्वर रहित पद पाठ

    महान्। ऋषिः। देवऽजाः। देवऽजूतः। अस्तभ्नात्। सिन्धुम्। अर्णवम्। नृऽचक्षाः। विश्वामित्रः। यत्। अवहत्। सुऽदासम्। अप्रियायत। कुशिकेभिः। इन्द्रः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 53; मन्त्र » 9
    अष्टक » 3; अध्याय » 3; वर्ग » 20; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे मनुष्या यद्यो महानृषिर्देवजा देवजूतो नृचक्षा विश्वामित्र इन्द्रः कुशिकेभिः यथा सूर्यो भूमिं सिन्धुमर्णवं चास्तभ्नात् तथा दिव राज्यं धरेच्छ्रियमवहत् सुदासमप्रियायत तं सर्वे सत्कुरुत ॥९॥

    पदार्थः

    (महान्) महत्त्वपरिमाणतः सर्वेभ्योऽधिकः (ऋषिः) मन्त्रार्थवेत्ता (देवजाः) यो देवेषु विद्वत्सु जातः (देवजूतः) देवैः प्रेरितः (अस्तभ्नात्) स्तभ्नाति धरति (सिन्धुम्) नदीम् (अर्णवम्) समुद्रम् (नृचक्षाः) नृणां द्रष्टा (विश्वामित्रः) सर्वेषां सुहृत् (यत्) यः (अवहत्) प्राप्नोति (सुदासम्) शोभनदानम् (अप्रियायत) प्रिय इवाचरति (कुशिकेभिः) कार्यसिद्धान्तविद्भिः (इन्द्रः) परमैश्वर्यकरः ॥९॥

    भावार्थः

    यथा सूर्यः सर्वेभ्यो लोकेभ्यो महान्त्सर्वस्य धर्त्ता प्रकाशकोऽस्ति तथैव वेदविद आप्ता वर्त्तन्त इति वेद्यम् ॥९॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! (यत्) जो (महान्) बड़प्पन रूप परिमाण से सब पदार्थों से बड़ा (ऋषिः) मन्त्रों के अर्थों का जाननेवाला (देवजाः) विद्वानों में उत्पन्न (देवजूतः) विद्वानों से प्रेरित (नृचक्षाः) मनुष्यों का देखनेवाला (विश्वामित्रः) सबका मित्र (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य का करनेवाला (कुशिकेभिः) कार्य्यों के सिद्धान्तों को जाननेवालों से जैसे सूर्य, पृथिवी (सिन्धुम्) नदी और (अर्णवम्) समुद्र को (अस्तभ्नात्) धारण करती है वैसे राज्य को धारण करे तो लक्ष्मी को (अवहत्) प्राप्त होता है (सुदासम्) उत्तम दान को (अप्रियायत) प्रिय के सदृश करता है, उसका सब लोग सत्कार करें ॥९॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य सब लोकों से बड़ा और सबका धारणकर्त्ता तथा प्रकाश करनेवाला है, वैसे ही सबके जाननेवाले यथार्थवक्ता पुरुष हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥९॥

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    विषय

    'प्रभुप्रिय' कुशिक

    पदार्थ

    [१] गतमन्त्र के अनुसार (देवजूतः) = उस प्रकाशमय प्रभु से प्रेरित हुआ हुआ यह महान् बड़ा बनता है, (ऋषि:) = तत्त्वद्रष्टा होता है, (देवजाः) = द्योतमान तेजों को अपने में उत्पन्न करनेवाला होता है। यह (नृचक्षा:) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाला होता हुआ (अर्णवं सिन्धुम्) = इस ज्ञान जलवाली ज्ञानसरित् [नदी - सरस्वती] को अपने अन्दर (अस्तभ्नात्) = थामता है। अपने ज्ञान को अत्यन्त बढ़ाता हुआ अधिक से अधिक लोकहित करनेवाला बनता है। [२] (विश्वामित्र:) सबका मित्र वह प्रभु (यद्) = जब (सुदासम्) = उत्तम दान देनेवाले को अपने समीप प्राप्त कराता है, तो यह (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (कुशिकेभिः) = [क्रोशते: शब्दकर्मणः क्रंशतेर्वा स्यात् प्रकाशयति कर्मणा साधु विक्रोशयितार्थानाम् नि० २।२५] इन अर्थों का उत्तमता से प्रकाश करनेवाले ज्ञानी पुरुषों से (अप्रियायत) = प्रीति को अनुभव करता है। ये ज्ञानीपुरुष लोकहित के लिए ज्ञान को तो देते ही हैं, आवश्यक होने पर धन देने का भी ध्यान करते हैं। इन सर्वभूतहितरत पुरुषों से प्रभु प्रीणित होते हैं और उन्हें अपने समीप प्राप्त कराते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ – प्रभु से प्रेरणा प्राप्त करके हम महान् बनें। तत्त्वद्रष्टा बनकर औरों के लिए भी ज्ञान देनेवाले हों। औरों का हितसाधन करते हुए ही हम प्रभु के प्रिय बनते हैं।

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    विषय

    सर्व प्रिय होने का उपाय।

    भावार्थ

    (यत्) जब (महान्) सामर्थ्य और गुणों में महान् (ऋषिः) मन्त्रों और तत्वार्थों का दृष्टा (देवजाः) देवों, विद्वानों द्वारा उत्पन्न, उनका शिष्य वा दानशील होकर प्रसिद्ध, (देवजूतः) विद्वानों द्वारा प्रेरित और (नृचक्षाः) समस्त नायकों पर अपनी आज्ञा करने और उनके ऊपर आंख रखने हारा, (विश्वामित्रः) सबका मित्र, सहायक, (सुदासम्) उत्तम दानशील एवं उत्तम रीति से शत्रु को नाश करने वाले वीर पुरुष को (अवहत्) सन्मार्ग पर ले जाता है तब वह (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् राजा (कुशिकेभिः) अति कुशल सहयोगियों सहित (अप्रियायत) सबको प्रिय लगने लगता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥ १ इन्द्रापर्वतौ। २–१४, २१-२४ इन्द्रः। १५, १६ वाक्। १७—२० रथाङ्गानि देवताः॥ छन्दः- १, ५,९, २१ निचृत्त्रिष्टुप्। २, ६, ७, १४, १७, १९, २३, २४ त्रिष्टुप्। ३, ४, ८, १५ स्वराट् त्रिष्टुप्। ११ भुरिक् त्रिष्टुप्। १२,२२ अनुष्टुप्। २० भुरिगनुष्टुप्। १०,१६ निचृज्जगती। १३ निचृद्गायत्री। १८ निचृद् बृहती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसा सूर्य सर्व गोलांपेक्षा मोठा व सर्वांचा धारणकर्ता आणि प्रकाशक आहे तसेच यथार्थवक्ते पुरुष सर्वांना जाणणारे असतात हे जाणले पाहिजे. ॥ ९ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Great and glorious is Indra, Rshi, all-seeing, all- revealing, generator of all forces of nature and, manifested in all these, vibrates in and by all these and in great minds. He wields and sustains the river and the ocean, the flow of nature’s energy as well as the ocean of nature’s particles of matter and energy. And he watches all humans for what they do and what they ought to do. He is the friend and well-wisher of the world since he showers his gifts of generosity on all. Universal is his love since he blesses us with guides and teachers who know and show us the right ways of successful living.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject of duties of the enlightened is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men ! you should revere the great sage, who is born among the enlightened persons and is prompted by them to do noble deeds. That sage knows the meaning of the Vedic mantras, visualizes, the real nature of men, is friend of all, and provides great prosperity. He upholds the State with the help of those experienced persons who know how to accomplish great tasks. He bears great splendor and beauty and loves a good and liberal donor. He upholds the State, like the sun upholds the earth, rivers and oceans.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The men should know that the sun is greater and bigger than all the stars and upholds and illuminates all. Likewise most, reliable knowers of the Vedas, who guide humanity are absolutely truthful.

    Foot Notes

    (सुदासम् ) शोभनदानम् सु-दासृ-दाने (भ्वा० ) = Good donor. (कुशिकेभिः) कार्य सिद्धान्तविद्भिः । कुशिकः क्रोशतेः शब्दकर्मणः कुंशतेर्वा स्यात् प्रकाशयतिक्रर्मणः साधु विक्रोशयिता अर्थानाम् इति वा (NRT 2, 25 ) = By the persons who know the fundamental principles of all works and the means to accomplish them.

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