ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 1/ मन्त्र 19
ऋषिः - मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृद्बृहती
स्वरः - मध्यमः
इन्द्रा॑य॒ सु म॒दिन्त॑मं॒ सोमं॑ सोता॒ वरे॑ण्यम् । श॒क्र ए॑णं पीपय॒द्विश्व॑या धि॒या हि॑न्वा॒नं न वा॑ज॒युम् ॥
स्वर सहित पद पाठइन्द्रा॑य । सु । म॒दिन्ऽत॑मम् । सोम॑म् । सो॒त॒ । वरे॑ण्यम् । श॒क्रः । ए॒ण॒म् । पी॒प॒य॒त् । विश्व॑या । धि॒या । हि॒न्वा॒नम् । न । वा॒ज॒ऽयुम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्राय सु मदिन्तमं सोमं सोता वरेण्यम् । शक्र एणं पीपयद्विश्वया धिया हिन्वानं न वाजयुम् ॥
स्वर रहित पद पाठइन्द्राय । सु । मदिन्ऽतमम् । सोमम् । सोत । वरेण्यम् । शक्रः । एणम् । पीपयत् । विश्वया । धिया । हिन्वानम् । न । वाजऽयुम् ॥ ८.१.१९
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 1; मन्त्र » 19
अष्टक » 5; अध्याय » 7; वर्ग » 13; मन्त्र » 4
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अष्टक » 5; अध्याय » 7; वर्ग » 13; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
अथ कर्मयोगिनः प्रयत्नसाफल्यं कथ्यते।
पदार्थः
हे उपासकाः ! (इन्दाय) कर्मयोगिने (मदिन्तमं) आह्लादकं (वरेण्यं) संभजनीयं (सोमं) परमात्मानं (सु, सोत) साधु उपासन्तां, किमर्थं तदाह−(शक्रः) सर्वकर्मसु शक्तः परमात्मा (विश्वया, धिया) विविधक्रियया (हिन्वानं) प्रीणयन्तं (वाजयुं) बलमिच्छन्तं (एनं) एनं कर्मयोगिनं (पीपयत्) वर्धयति सेव्यमानः (न) सम्प्रति ॥१९॥
विषयः
सर्वाणि शुभानि कर्माणि परमात्मने समर्पयितव्यानीत्युपदिश्यते ।
पदार्थः
हे मनुष्याः ! मदिन्तमं=मादयितृतममानन्दयितृतमं । वरेण्यं=श्रेष्ठं संभजनीयम् । सोमम्=आत्मप्रियं शुभं यज्ञम् । सु=शोभनरीत्या । सोत=सम्पादयत तमिन्द्राय समर्पयत । अभिमानमहंकारं च त्यक्त्वा कर्मफलानामाकाङ्क्षां विहाय तमेव महान्तं देवं प्रसादयितुं कर्माणि कुरुतेत्यर्थः । कस्मात् । यतः । स शक्रः=सर्वं कर्त्तुं यः शक्नोति स शक्रः । पुनः । य इन्द्रः । विश्वया=सर्वया । धिया=अग्निष्टोमादिलक्षणया क्रियया । हिन्वानं=जीवात्मानं परमात्मना सह योजयन्तं । वाजयुं=ज्ञानाभिलाषिणं=एनं यजमानम् । नेति निश्चयार्थीयः । निश्चयं यथा तथा । पीपयत्=वर्धयति समुन्नयति । तस्मात्कारणात् सर्वात्मना परमात्मा आराधनीय इत्यर्थः ॥१९ ॥
हिन्दी (4)
विषय
अब कर्मयोगी के प्रयत्न की सफलता कथन करते हैं।
पदार्थ
हे उपासको ! (इन्द्राय) कर्मयोगित्व सम्पादन करने के लिये (मदिन्तमं) आनन्दस्वरूप (वरेण्यं) उपासनीय (सोमं) परमात्मा को (सु, सोत) सम्यक् सेवन करो, क्योंकि (शक्रः) सर्वशक्तिमान् परमात्मा (विश्वया, धिया) अनेक क्रियाओं से (हिन्वानं) प्रसन्न करते हुए (वाजयुम्) बल चाहनेवाले (एनं) इस कर्मयोगी को (न) सम्प्रति (पीपयत्) फलप्रदान द्वारा सम्पन्न करते हैं ॥१८॥
भावार्थ
इस मन्त्र में यह उपदेश किया गया है कि हे उपासक लोगो ! तुम कर्मयोगी बनने के लिये उस महानात्मा प्रभु से प्रार्थना करो, जो बल तथा अनेक प्रकार की क्रियाओं का देनेवाला है। भाव यह है कि कर्मयोगी ही संसार में सब प्रकार के ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता और वही प्रतिष्ठित होकर मनुष्यजन्म के फलों को उपलब्ध करता है, इसलिये पुरुषों को कर्मयोगी बनने की परमात्मा से सदैव प्रार्थना करनी चाहिये ॥१९॥
विषय
सब शुभकर्म परमात्मा को समर्पित करना उचित है, यह उपदेश इससे दिया जाता है ।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! आप (मदिन्तमम्) अतिशय आनन्दप्रद तथा (वरेण्यम्) अतिशय श्रेष्ठ (सोमम्) शुभकर्म (सु+सोत) अच्छे प्रकार करें, वह (इन्द्राय) परमात्मा के लिये ही करें अर्थात् अभिमान और अहङ्कार को त्याग कर्मफलों की आकाङ्क्षा न कर उस महान् देव की प्रसन्नता के लिये ही शुभकर्म करें, क्योंकि वह (शक्रः) सर्वशक्तिमान् है, वह (एनम्) इस (वाजयुम्) ज्ञानीजन को (पीपयत्) प्रत्येक सांसारिक कार्य में बढ़ाता है । किसको बढ़ाता है, सो कहते हैं−(विश्वया) जो सर्व (धिया) ज्ञान से वा निखिल क्रिया द्वारा सर्वभाव से (हिन्वानम्) परमात्मा में अपने आत्मा को प्रेरित करता है ॥१९ ॥
भावार्थ
कपटादि दोषरहित ईश्वरविश्वासी धर्म्माचारी मनुष्यों का कदापि भी अधःपात नहीं करता, यह देख शुभकर्म मनुष्य करें ॥१९ ॥
विषय
प्रभु से प्रार्थनाएं ।
भावार्थ
हे विद्वान् लोगो ! आप लोग ( इन्द्राय ) ऐश्वर्यवान्, शत्रुहन्ता पुरुष के लिये ( मदिन्तमं ) अति आनन्द और तृप्तिकारक (सोमं) ओषधि रसादि के समान ( वरेण्यं ) अति श्रेष्ठ धनैश्वर्य को ( सोत ) सवन करो, उत्पन्न करो । ( शक्रः ) शक्तिशाली पुरुष ही ( एनं ) इस को ( हिन्वानं वाजयुं न ) वृद्धिकारक ऐश्वर्य के स्वामी, ऐश्वर्य के इच्छुक प्रजाजन के समान ही ( पीपयत् ) बढ़ावे । राजा धन की वृद्धि के लिये प्रजा का नाश न करे, प्रत्युत प्रजावत् ही धन की वृद्धि करे ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रगाथो घौरः काण्वो वा। ३–२९ मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ। ३० – ३३ आसङ्गः प्लायोगिः। ३४ शश्वत्याङ्गिरम्यासगस्य पत्नी ऋषिः॥ देवताः१—२९ इन्द्रः। ३०—३३ आसंगस्य दानस्तुतिः। ३४ आसंगः॥ छन्दः—१ उपरिष्टाद् बृहती। २ आर्षी भुरिग् बृहती। ३, ७, १०, १४, १८, २१ विराड् बृहती। ४ आर्षी स्वराड् बृहती। ५, ८, १५, १७, १९, २२, २५, ३१ निचृद् बृहती। ६, ९, ११, १२, २०, २४, २६, २७ आर्षी बृहती। १३ शङ्कुमती बृहती। १६, २३, ३०, ३२ आर्ची भुरिग्बृहती। २८ आसुरी। स्वराड् निचृद् बृहती। २९ बृहती। ३३ त्रिष्टुप्। ३४ विराट् त्रिष्टुप्॥ चतुत्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
'प्रभु प्राप्ति, ज्ञान व शक्ति वर्धन'
पदार्थ
[१] (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिये (सोमं सु सोत) = सोम को [वीर्य को] सम्यक् उत्पन्न करो, जो सोम (मदिन्तमम्) = मादयितृतम है, अधिक से अधिक उल्लास का जनक है और (वरेण्यम्) = वरणीय है, सम्भजनीय है । सोम के रक्षण के द्वारा ही प्रभु की प्राप्ति होती है। [२] (शक्रः) = वे सर्वशक्तिमान् प्रभु (एनम्) = इस सोम को (पीपयत्) = हमारे अन्दर आप्यायित करते हैं। उस सोम को आप्यायित करते हैं, जो (विश्वया धिया हिन्वानम्) = सम्पूर्ण ज्ञान से हमें प्रीणित करता है, (न) = और [न-च] (वाजयुम्) = हमारे साथ शक्ति को जोड़ता है । सोमरक्षण से ज्ञान व शक्ति का वर्धन होता है।
भावार्थ
भावार्थ-उस प्रभु की प्राप्ति के लिये हम सोम का रक्षण करें। सुरक्षित सोम हमारे ज्ञान व बल का वर्धन करेगा।
इंग्लिश (1)
Meaning
O celebrants of Indra, seekers of spiritual perfection, for the attainment of holiness of thought, karma and vision, extract the choicest, most exhilarating soma from life and offer it to Indra, spirit of the universe, and the lord omnipotent would bless this seeker of fulfilment calling upon the lord with universal intelligence and will for a life of perfect action.
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात हा उपदेश केलेला आहे, की हे उपासकांनो! तुम्ही कर्मयोगी बनण्यासाठी त्या महान प्रभूची प्रार्थना करा. जो बल व अनेक प्रकारच्या क्रियांना चालना देणारा आहे. कर्मयोगीच जगात सर्व प्रकारचे ऐश्वर्य प्राप्त करतो व तोच प्रतिष्ठित बनतो व त्यालाच मानवजन्माचे फळ प्राप्त होते. त्यासाठी पुरुषांनी कर्मयोगी बनण्यासाठी सदैव परमेश्वराची प्रार्थना केली पाहिजे. ॥१९॥
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