ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 2/ मन्त्र 20
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृदार्षीगायत्री
स्वरः - षड्जः
मो ष्व१॒॑द्य दु॒र्हणा॑वान्त्सा॒यं क॑रदा॒रे अ॒स्मत् । अ॒श्री॒र इ॑व॒ जामा॑ता ॥
स्वर सहित पद पाठमो इति॑ । सु । अ॒द्य । दुः॒ऽहना॑वान् । सा॒यम् । क॒र॒त् । आ॒रे । अ॒स्मत् । अ॒श्री॒रःऽइ॑व । जामा॑ता ॥
स्वर रहित मन्त्र
मो ष्व१द्य दुर्हणावान्त्सायं करदारे अस्मत् । अश्रीर इव जामाता ॥
स्वर रहित पद पाठमो इति । सु । अद्य । दुःऽहनावान् । सायम् । करत् । आरे । अस्मत् । अश्रीरःऽइव । जामाता ॥ ८.२.२०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 2; मन्त्र » 20
अष्टक » 5; अध्याय » 7; वर्ग » 20; मन्त्र » 5
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अष्टक » 5; अध्याय » 7; वर्ग » 20; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (2)
पदार्थः
(अद्य) इदानीं (दुर्हणावान्) परैः दुःसहनवान् भवान् (अस्मत्, आरे) अस्माकं समीपे आगच्छन्तु (सु) अतिशयेन (सायं) विलम्बं (मा, करत्) मा कार्षीः (अश्रीरः) निर्धनः (जामाता) जामपत्यं माति सत्करोति स जामाता दुहितुः पतिरिव ॥२०॥
विषयः
प्रेमातिशयं दर्शयन्ती श्रुतिराह ।
पदार्थः
दुर्हणावान्=दुःखेन हन्तुं योग्यो दुर्हणः संसारः । रक्ष्यमाणत्वेन सोऽस्यास्तीति दुर्हणावान् संसाररक्षकः । परैर्दुःसहहननं दुर्हणं तद्वान् वा । इन्द्रः । अस्मद् आरे=अस्माकं समीपे । अद्येदानीम् । आयातु किन्तु । सु=सुष्ठु अतिशयेन । सायं=दिनस्यावसानम् । मो करत्=माकार्षीत्, विलम्बं माकार्षीदित्यर्थः । अत्र दृष्टान्तः । अश्रीर इव जामाता=जायते इति जा अपत्यं तस्य निर्माता जामाता दुहितुः पतिः । अश्रीर इव=न श्रीरश्रीः, अश्रीरस्यास्तीति अश्रीरः । मत्वर्थीयो रः । यथा शोभारहितो गुणैर्विहीनो जामाता असकृदाहूतोऽप्यासायङ्कालं विलम्बते । तद्वत् । हे भगवन् ! अस्मत्समीपागमनाय मा विलम्बिष्ठाः ॥२० ॥
हिन्दी (4)
पदार्थ
(अद्य) इस समय (दुर्हणावान्) शत्रुओं से न सहने योग्य हनन करनेवाले आप (अस्मत्, आरे) हमारे समीप आइये (सु) अति (सायं) विलम्ब (मा, करत्) मत करें (अश्रीरः) निर्धन (जामाता, इव) जामाता के समान ॥२०॥
भावार्थ
इस मन्त्र का भाव यह है कि हे सर्वविद्यासम्पन्न कर्मयोगिन् ! आप शत्रुओं का हनन करनेवाले तथा विद्यादाता हैं। कृपा करके हमारे यज्ञ में पधारें। निर्धन जामाता के समान अति विलम्ब न करें अर्थात् जैसे निर्धन जामाता बिना सामग्री के ठीक समय पर नहीं पहुँच सकता, इस प्रकार आप अतिकाल न करें ॥२०॥
विषय
प्रेमातिशय दिखलाती हुई श्रुति कहती है ।
पदार्थ
(दुर्हणावान्) दुर्हण नाम संसार का है, क्योंकि इसका हनन कोई कर नहीं सकता । वह संसार पोष्यस्वरूप से अधीन है जिसका, वह दुर्हणावान् । अथवा दुर्हणा=दुर्हिंसा, तद्वान्, अर्थात् दुष्टजनों का विनाशक वह इन्द्र (अस्मद्+आरे) हम भक्तजनों के निकट (अद्य) आज (सु) अच्छे प्रकार आवे । (सायम्+मो) सायंकाल न (करत्) करे । यहाँ दृष्टान्त देते हैं (अश्रीरः) श्रीरहित गुणविहीन (जामाता+इव) सलज्ज जामाता जैसे श्वशुरालय जाने में विलम्ब करता है, तद्वत् आप भी मेरे निकट आने में विलम्ब न करें ॥२० ॥
भावार्थ
ईश्वर की उपासना में विलम्ब न करना चाहिये । विक्षिप्त चित्त से आराधित परमात्मा प्रसन्न नहीं होता ॥२० ॥
विषय
प्रभु परमेश्वर से बल ऐश्वर्य की याचना
भावार्थ
हे स्वामिन् ! तू ( दुर्हणावान् ) अति दुःसह पीड़ा देने वाला प्रभु ( अद्य ) आज, ( अस्मत् ) हम से दूर रहकर ( मो सु सायं करत् ) कभी सारा दिन व्यतीत कर सायंकाल न कर दे । ( अश्रीरः इव जामाता ) शोभा, लक्ष्मीरूप, सौभाग्यादि से रहित जंवाई जिस प्रकार दिन भर व्यतीत करके रात्रि काल में आता है, जिससे उसके दुर्लक्षणादि प्रकट न हों। उसी प्रकार हे स्वामिन् ! तेरा भी विरह असह्य है। वह तू भी आते २ विलम्ब न कर, शीघ्र दर्शन दो। प्रभो ! तुम अपने उत्तम रूप गुणों सहित शीघ्र दर्शन दो। इति विंशो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मेध्यातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः । ४१, ४२ मेधातिथिर्ऋषिः ॥ देवता:—१—४० इन्द्रः। ४१, ४२ विभिन्दोर्दानस्तुतिः॥ छन्दः –१– ३, ५, ६, ९, ११, १२, १४, १६—१८, २२, २७, २९, ३१, ३३, ३५, ३७, ३८, ३९ आर्षीं गायत्री। ४, १३, १५, १९—२१, २३, २४, २५, २६, ३०, ३२, ३६, ४२ आर्षीं निचृद्गायत्री। ७, ८, १०, ३४, ४० आर्षीं विराड् गायत्री। ४१ पादनिचृद् गायत्री। २८ आर्ची स्वराडनुष्टुप्॥ चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
अश्रीरः इव जामाता
पदार्थ
[१] 'काम' वासना मनुष्य का बुरी तरह से अन्त कर देती है। यह नशे में ले जाकर [मदन:] हमारे ज्ञान को नष्ट करके [ मन्मथः] हमें समाप्त कर देती है [मार: ] । सो कहते हैं कि यह (दुर्हणावान्) = बुरी तरह से मार डालनेवाला काम (अद्य) = आज (मा उ) = मत ही सायं (करत्) = [षो अन्तकर्मणि] हमारा अन्त कर दे। [२] यह काम (अस्मत् आरे) = हमारे से दूर ही रहे। (इव) = जैसे हम चाहते हैं कि (अश्रीरः जामाता) = श्री [शोभा] से शून्य जामाता [हमारी कन्या का पति] हमारे से दूर रहे। यह हमारे विनाश का कारण बनता है।
भावार्थ
भावार्थ- काम-वासना बुरी तरह से हमें नष्ट करनेवाली है। यह हमारे से दूर ही रहे ।
इंग्लिश (1)
Meaning
Invincible and unconquerable, come to our yajnic celebrations today, delay not till the last hour, of evening, hesitating like an indigent son-in-law.
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्राचा भाव असा आहे, की हे विद्यासंपन्न कर्मयोगी! तुम्ही शत्रूंचे हनन करणारे व विद्या देणारे आहात. कृपा करून आमचा यज्ञात या. निर्धन जावयाप्रमाणे अति विलंब करू नका. अर्थात जसा निर्धन जावई सामग्री नसल्यामुळे वेळेवर पोचू शकत नाही. तसा तुम्ही विलंब करू नका. ॥२०॥
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