ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 67/ मन्त्र 15
ऋषिः - विश्वामित्रः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
परि॒ प्र सो॑म ते॒ रसोऽस॑र्जि क॒लशे॑ सु॒तः । श्ये॒नो न त॒क्तो अ॑र्षति ॥
स्वर सहित पद पाठपरि॑ । प्र । सो॒म॒ । ते॒ । रसः॑ । अस॑र्जि । क॒लशे॑ । सु॒तः । श्ये॒नः । न । त॒क्तः । अ॒र्ष॒ति॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
परि प्र सोम ते रसोऽसर्जि कलशे सुतः । श्येनो न तक्तो अर्षति ॥
स्वर रहित पद पाठपरि । प्र । सोम । ते । रसः । असर्जि । कलशे । सुतः । श्येनः । न । तक्तः । अर्षति ॥ ९.६७.१५
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 67; मन्त्र » 15
अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 15; मन्त्र » 5
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अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 15; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(सोम) हे जगन्नियन्तः ! (श्येनो न) यथा विद्युद् (अर्षति) सर्वत्र गच्छति तथा (ते) भवतः (सुतः) स्वयंसिद्धः (तक्तः) सर्वगः (रसः) आनन्दः (परि) सर्वतः (कलशे) पूतान्तःकरणेषु (प्रासर्जि) स्थिरो भवति ॥१५॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(सोम) हे परमात्मन् ! (श्येनो न) जैसे विद्युत् (अर्षति) सर्वत्र गमन करती है तथा (ते) आपका (सुतः) स्वतःसिद्ध (तक्तः) सर्वत्र गमनशील (रसः) आनन्द (परि) चारों ओर (कलशे) पवित्र अन्तःकरण में (प्रासर्जि) स्थिर होता है ॥१५॥
भावार्थ
जिस प्रकार परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इसी प्रकार उसके आनन्द आदि गुण भी सर्वत्र व्यापक हैं ॥१५॥
विषय
कलशे सुतः
पदार्थ
[१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (ते रसः) = तेरा रस (परि असर्जि) = शरीर में सर्वतः सृष्ट होता है। यह सोम रस (कलशे) = इस सोलह कलाओं के निवास स्थान भूत शरीर में ही (सुतः) = उत्पन्न होता है । [२] इस में उत्पन्न हुआ हुआ यह रस (श्येनः न) = शंसनीय गतिवाले के समान (तक्तः) = शरीर में गतिवाला होता हुआ (अर्षति) = हमें प्राप्त होता है ।
भावार्थ
भावार्थ - इस सोम के द्वारा ही यह शरीर 'कलश' बनता है, सब कलाओं का आधार बनता है। यही हमें शंसनीय गतिवाला बनाता है। इससे शरीर व शरीरस्थ वैश्वानर अनि ठीक बनी रहती है, सो सोमरक्षक 'जमदग्नि' बनता है। यह जमदग्नि कहता है-
विषय
वीर राजा का बल-प्रयोग। उसका श्येनवत् आक्रमण।
भावार्थ
हे (सोम) ऐश्वर्यवन् ! विद्वन् ! (ते) तेरे लिये (सुतः) संस्कारयुक्त किया हुआ (रसः) जल जैसे (कलशे) कलश में और (रसः) बल (कलशे) राष्ट्र में (परि असर्जि, प्र असर्जि) चारों ओर हो और अच्छी प्रकार तैयार किया जावे। वह (श्येनः न) बाज के समान श्येन-व्यूह बना कर (तक्तः) वेग से गति करता हुआ (अर्षति) विचरता है। इति पञ्चदशो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः-१—३ भरद्वाजः। ४—६ कश्यपः। ७—९ गोतमः। १०–१२ अत्रिः। १३—१५ विश्वामित्रः। १६—१८ जमदग्निः। १९—२१ वसिष्ठः। २२—३२ पवित्रो वसिष्ठौ वोभौ वा॥ देवताः—१–९, १३—२२, २८—३० पवमानः सोमः। १०—१२ पवमानः सोमः पूषा वा। २३, २४ अग्निः सविता वा। २६ अग्निरग्निर्वा सविता च। २७ अग्निर्विश्वेदेवा वा। ३१, ३२ पावमान्यध्येतृस्तुतिः॥ छन्द:- १, २, ४, ५, ११—१३, १५, १९, २३, २५ निचृद् गायत्री। ३,८ विराड् गायत्री । १० यवमध्या गायत्री। १६—१८ भुरिगार्ची विराड् गायत्री। ६, ७, ९, १४, २०—२२, २, २६, २८, २९ गायत्री। २७ अनुष्टुप्। ३१, ३२ निचृदनुष्टुप्। ३० पुरउष्णिक्॥ द्वात्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O Soma, spirit of light and passion of imagination, the ecstatic joy of your creativity distilled and treasured in the poetic soul flows free like the tempestuous eagle bird traversing space and creates songs of divine adoration for life’s mystery.
मराठी (1)
भावार्थ
ज्या प्रकारे परमात्मा सर्वत्र व्यापक आहे त्याच प्रकारे त्याचे आनंद इत्यादी गुण ही सर्वव्यापक आहेत. ॥१५॥
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