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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 3/ मन्त्र 2
    सूक्त - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त

    अयो॑दंष्ट्रो अ॒र्चिषा॑ यातु॒धाना॒नुप॑ स्पृश जातवेदः॒ समि॑द्धः। आ जि॒ह्वया॒ मूर॑देवान्रभस्व क्र॒व्यादो॑ वृ॒ष्ट्वापि॑ धत्स्वा॒सन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अय॑:ऽदंष्ट्र: । अ॒र्चिषा॑ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । उप॑ । स्पृ॒श॒ । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । सम्ऽइ॑ध्द: । आ । जि॒ह्वया॑ । मूर॑ऽदेवान् । र॒भ॒स्व॒ । क्र॒व्य॒ऽअद॑: । वृ॒ष्ट्वा । अपि॑ । ध॒त्स्व॒ । आ॒सन् ॥३.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः। आ जिह्वया मूरदेवान्रभस्व क्रव्यादो वृष्ट्वापि धत्स्वासन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अय:ऽदंष्ट्र: । अर्चिषा । यातुऽधानान् । उप । स्पृश । जातऽवेद: । सम्ऽइध्द: । आ । जिह्वया । मूरऽदेवान् । रभस्व । क्रव्यऽअद: । वृष्ट्वा । अपि । धत्स्व । आसन् ॥३.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 3; मन्त्र » 2

    भाषार्थ -
    (जातवेदः) हे उत्पन्नप्रज्ञ ! मन्त्रिन् ! (समिद्धः) शस्त्रास्त्र द्वारा सम्यक्-प्रदीप्त हुआ, तथा (अयोदंष्ट्रः) लोह निर्मित दाढ़ों से सम्पन्न हुआ तू (अर्चिषा) जलती आग्नेय-लपटों द्वारा (यातुधानान्) यातना देने वाले परकीय सैनिकों को (उपस्पृश) समीपता से स्पर्श कर। (जिह्वया) आग्नेय लपटों द्वारा (मूरदेवान) परराष्ट्र के मूढ़ विजिगीषु-सैनिकों को (आरभस्व =आलभस्व) तू पकड़, और (क्रव्यादः) इन कच्चा मांस खानेवाले सैनिकों पर (वृष्ट्वा) वाणवर्षा करके (अपि धत्स्व) जेलों में बन्द कर दे, जैसे कि (आसन) मुख में खाद्यवस्तु को बन्द कर दिया जाता है, और मुखाग्नि उन्हें खा जाती है।

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