यजुर्वेद - अध्याय 27/ मन्त्र 20
ऋषिः - अग्निर्ऋषिः
देवता - त्वष्टा देवता
छन्दः - निचृदुष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
105
तन्न॑स्तु॒रीप॒मद्भु॑तं पुरु॒क्षु त्वष्टा॑ सु॒वीर्य॑म्। रा॒यस्पोषं॒ विष्य॑तु॒ नाभि॑म॒स्मे॥२०॥
स्वर सहित पद पाठतम्। नः॒। तु॒रीप॑म्। अद्भु॑तम्। पु॒रु॒क्षु। त्वष्टा॑। सु॒वीर्य॒मिति॑ सु॒ऽवीर्य॑म्। रा॒यः। पोष॑म्। वि। स्य॒तु॒। नाभि॑म्। अ॒स्मे इत्य॒स्मे ॥२० ॥
स्वर रहित मन्त्र
तन्नस्तुरीपमद्भुतम्पुरुक्षु त्वष्टा सुवीर्यम् । रायस्पोषँविष्यतु नाभिमस्मे ॥
स्वर रहित पद पाठ
तम्। नः। तुरीपम्। अद्भुतम्। पुरुक्षु। त्वष्टा। सुवीर्यमिति सुऽवीर्यम्। रायः। पोषम्। वि। स्यतु। नाभिम्। अस्मे इत्यस्मे॥२०॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
ईश्वरात् किं प्रार्थनीयमित्याह॥
अन्वयः
त्वष्टाऽस्मे नाभिं प्रति तुरीपमद्भुतं पुरुक्षु सुवीर्यं तं रायस्पोषं ददातु नो दुःखाद् विष्यतु च॥२०॥
पदार्थः
(तम्) प्रसिद्धम् (नः) अस्मान् (तुरीपम्) यत्तुरः सद्य आप्नोति तम् (अद्भुतम्) आश्चर्यगुणकर्मस्वभावम् (पुरुक्षु) यत् पुरुषु बहुषु क्षियति वसति तत् (त्वष्टा) विद्यया प्रकाशित ईश्वरः (सुवीर्यम्) सुष्ठु बलम् (रायः) धनस्य (पोषम्) पुष्टिम् (वि, स्यतु) विमुञ्चतु (नाभिम्) मध्यप्रदेशम् (अस्मे) अस्माकम्॥२०॥
भावार्थः
हे मनुष्याः! यच्छीघ्रकार्याश्चर्यभूतं बहुव्यापकं धनं बलं वास्ति तद्यूयमीश्वरप्रार्थनया प्राप्यानन्दिता भवत॥२०॥
हिन्दी (3)
विषय
ईश्वर से क्या प्रार्थना करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
(त्वष्टा) विद्या से प्रकाशित ईश्वर (अस्मे) हमारे (नाभिम्) मध्यप्रदेश के प्रति (तुरीपम्) शीघ्रता को प्राप्त होने वाले (अद्भुतम्) आश्चर्यरूप गुण, कर्म और स्वभावों से युक्त (पुरुक्षु) बहुत पदार्थों में बसने वाले (सुवीर्यम्) सुन्दर बलयुक्त (तम्) उस प्रसिद्ध (रायः) धन की (पोषम्) पुष्टि को देवे और (नः) हम लोगों को दुःख से (वि, स्यतु) छुड़ावे॥२०॥
भावार्थ
हे मनुष्यो! जो शीघ्रकारी आश्चर्यरूप बहुतों में व्यापक धन वा बल है, उस को तुम लोग ईश्वर की प्रार्थना से प्राप्त होके आनन्दित होओ॥२०॥
विषय
अग्नि और वाग्मी नाम विद्वानों का वर्णन ।
भावार्थ
(त्वष्टा) अति दीप्तिमान्, अति शीघ्रता से सर्वत्र व्यापने वाला, शीघ्रगामी शिल्पज्ञ पुरुष (नः) हमें ( तुरीपम् ) वेग से पहुँचा देने और प्राप्त होने वाले ( अद्भुतम् ) आश्चर्यकारक ( पुरुक्षु) नाना प्रकार के पदार्थों में विविध प्रकार से विद्यमान ( सुवीर्यम् ) उत्तम वीर्य या बल से युक्त रायस्पोषम् ) धनैश्वर्य के पोषण करने वाले ऐश्वर्य को ( अस्मे नाभिम् ) हमारे राष्ट्र के बीच में ( विष्यतु ) प्रदान करे ।
विषय
कैसा धन ?
पदार्थ
१. जीवन के उत्थान में धन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, अतः अग्निप्रगतिशील जीव इस मन्त्र में प्रार्थना करता है कि (त्वष्टा) = देवशिल्पी - सब धनों का निर्माण करनेवाला प्रभु (न:) = हमें (तत्) = उस (रायस्पोषम्) = धन के पोषण को (विषयतु) = विशेषरूप से दे, छोड़े, अर्थात् हमपर उस धन की वर्षा करे जो [क] (तुरीपम्) = [तुरा वेगेन आप्नोति प्रापयति] शीघ्रता से कार्यों को सिद्ध करनेवाला है अथवा (तुर) = [Great strength ], वेद में प्रबलशक्ति का वाचक हो, उस 'तुरी पाति' तुरी की रक्षा करनेवाला है। प्रभु हमें वह धन दें जोकि हमारी शक्ति की रक्षा करता है। [ख] (अद्भुतम्) = यह धन अभूतपूर्व हो, महान् हो। ऐसा हो जैसाकि पहले किसी ने प्राप्त नहीं किया। [ग] (पुरुक्षु) = यह धन 'पुरुक्षु' पालन-पूरण करनेवाला हो अथवा यह 'पुरूणां क्षु' बहुत के निवास का कारण हो, अर्थात् जो केवल हमारे अपने लिए ही विनियुक्त न हो जाए। [घ] (सुवीर्यम्) = यह हमें उत्तम पराक्रमवाला बनाए। इसके द्वारा हम अपना आहार-विहार इतना सुन्दर बना सकें कि हम उत्तम वीर्य सम्पन्न हो पाएँ और [ङ] अन्त में यह धन (अस्मे) = हमारे लिए (नाभिम्) [नह बन्धने] = परस्पर बन्धन का कारण हो। हमें एक-दूसरे के साथ बाँधनेवाला हो, हमारे बन्धुत्व को करनेवाला हो, हमें परस्पर लड़ा न दे। २. इन गुणों से युक्त धन को प्राप्त करके ही हम अपने जीवनों को धन्य बना पाते हैं। अन्यथा विपरीत धन हमारे निधन का कारण हो जाता है। इस उत्तम धन को प्राप्त करके हम 'अग्नि' बनें, आगे बढ़नेवाले बनें। इस बात का सबसे अधिक ध्यान करें कि यह हमारा धन 'पुरुक्षु' बहुत को निवास देनेवाला हो। ऐसा होने पर यह धन हमें 'प्रजापति' बनाएगा और इस प्रजापति को प्रभु अगले मन्त्र में दान देने की प्रेरणा देते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमें धन दें, वह धन जो कार्यसाधक है, शक्ति की रक्षा करनेवाला है, अभूतपूर्व है, बहुत का निवासक है और उत्तम वीर्यवान् बनाता है। प्रभु हमें वह धन दें जो हमें परस्पर बाँधनेवाला हो, न कि लड़ानेवाला।
मराठी (2)
भावार्थ
हे माणसांनो ! सर्वांमध्ये जे आश्चर्यकारक व्यापक धन किंवा बल आहे ते ईश्वराची प्रार्थना करून प्राप्त करा व आनंदी बना.
विषय
ईश्वराकडे काय प्रार्थना करावी, याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (त्वष्टा) सर्व विद्या विभूषित परमेश्वराने (अस्मे) आमच्या (नाभिम्) शरीराच्या मध्यभागात (जे काही पीडा, रोग आदी दुःख असेल, त्यापासून) दूर ठेवावे. आणि (तुरीयम्) शीघ्र प्राप्त होणारे (अद्भुतम्) आश्चर्यकारक गुण, कर्म, स्वभावाने युक्त, तसेच (पुरुक्षु) अनेक पदार्थ प्राप्त करून देणारे व (सुवीर्यम्) सुंदर शक्ती देणारे (तम्) ते (राय) धन आम्हांस पोषण देईल (नः) आम्हा (उपासकांना) परमेश्वराने (वि, स्यतु) दुःखापासून दूर ठेवावे. ॥20॥
भावार्थ
भावार्थ - हे मनुष्यांनो, शीघ्र कार्य संपन्न करण्याचे जे साधन आश्चर्यकारक आणि अनेक ठिकाणी व्यापक असणारे जे धन अथवा बळ आहे, ते तुम्ही ईश्वराच्या उपासनेने प्राप्त करा आणि सदैव आनंदित रहा. ॥20॥
इंग्लिश (3)
Meaning
May God grant us wealth and strength, eagerly obtainable, possessing wondrous merits, powers and qualities ; residing in various objects, beautifully mighty ; and relieve us of misery.
Meaning
May Tvashta, divine artist of the world, generous to all, gain for us fast-maturing, wonderful and virile health, wealth and nourishment, place it at the hub of the nation’s movement and relieve us of want and suffering.
Translation
May the divine Architect pour on our navel the quickcoming and wonderful abundance of riches contributed by the multitude and enhancing power. (1) (Tvastr = divine architect).
Notes
Tvaṣṭā, Divine Architect. Viṣyatu, विमुंचतु, drop it (in our navel, i. e. in our lap). Puruksu, पुरुषु बहुषु क्षियति निवसति यत् तत्, that which resides in the multitude, i. e. contributed by multitude. Yajurveda Samhitā Turipam,तूर्णं आप्नोति, quick coming.
बंगाली (1)
विषय
ঈশ্বরাৎ কিং প্রার্থনীয়মিত্যাহ ॥
ঈশ্বরের নিকট কী প্রার্থনা করা উচিত, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–(ত্বষ্টা) বিদ্যা দ্বারা প্রকাশিত ঈশ্বর (অস্মে) আমাদের (নাভিম্) মধ্যপ্রদেশের প্রতি (তুরীপম্) শীঘ্রতা অর্জনকারী (অদ্ভুতম্) আশ্চর্য্যরূপ গুণ, কর্ম ও স্বভাবযুক্ত (পুরুক্ষু) বহু পদার্থে নিবাসকারী (সুবীর্য়ম্) সুন্দর বলযুক্ত (তম্) সেই প্রসিদ্ধ (রায়ঃ) ধনের (পোষম্) পুষ্টিদাতা এবং (নঃ) আমাদিগকে দুঃখ হইতে (বি, স্যতু) মুক্তি দিবেন ॥ ২০ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ– হে মনুষ্যগণ! যে শীঘ্রকারী আশ্চর্য্যরূপ বহুর মধ্যে ব্যাপক ধন বা বল তাহাকে ঈশ্বরের প্রার্থনা দ্বারা প্রাপ্ত হইয়া আনন্দিত হও ॥ ২০ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
তং ন॑স্তু॒রীপ॒মদ্ভু॑তং পুরু॒ক্ষু ত্বষ্টা॑ সু॒বীর্য়॑ম্ ।
রা॒য়স্পোষং॒ বি ষ্য॑তু॒ নাভি॑ম॒স্মে ॥ ২০ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
তন্ন ইত্যস্যাগ্নির্ঋষিঃ । ত্বষ্টা দেবতা । নিচৃদুষ্ণিক্ ছন্দঃ ।
ঋষভঃ স্বরঃ ॥
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