यजुर्वेद - अध्याय 33/ मन्त्र 11
ऋषिः - पराशर ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - विराट् त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
78
आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ऽआन॒ट् शुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑।अ॒ग्निः शर्द्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नꣳस्वा॒ध्यं जनयत्सू॒दय॑च्च॥११॥
स्वर सहित पद पाठआ। यत्। इ॒षे। नृ॒पति॒मिति॑ नृ॒ऽपति॑म्। तेजः॑। आन॑ट्। शुचि॑। रेतः॑। निषि॑क्तम्। निषि॑क्त॒मिति॒ निऽसि॑क्तम्। द्यौः। अ॒भीके॑ ॥ अ॒ग्निः। शर्द्ध॑म्। अ॒न॒व॒द्यम्। युवा॑नम्। स्वा॒ध्य᳖मिति॑। सुऽआ॒ध्य᳖म्। ज॒न॒य॒त्। सू॒दय॑त्। च॒ ॥११ ॥
स्वर रहित मन्त्र
आ यदिषे नृपतिन्तेज आनट्शुचि रेतो निषिक्तन्द्यौरभीके । अग्निः शर्धमनवद्यँयुवानँ स्वाध्यञ्जनयत्सूदयच्च ॥
स्वर रहित पद पाठ
आ। यत्। इषे। नृपतिमिति नृऽपतिम्। तेजः। आनट्। शुचि। रेतः। निषिक्तम्। निषिक्तमिति निऽसिक्तम्। द्यौः। अभीके॥ अग्निः। शर्द्धम्। अनवद्यम्। युवानम्। स्वाध्यमिति। सुऽआध्यम्। जनयत्। सूदयत्। च॥११॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यदिषे निषिक्तं शुचि तेजो नृपतिमाऽऽनट् तदाग्निः शर्द्धमनवद्यं युवानं स्वाध्यं रेतो द्यौरभीके जनयत् सूदयच्च॥११॥
पदार्थः
(आ) (यत्) यदा (इषे) वृष्ट्यै (नृपतिम्) सूर्यं राजानमिव (तेजः) यज्ञोत्थम् (आनट्) समन्तात् व्याप्नोति। आनडिति व्याप्तिकर्मा॰॥ (निघं॰२।१८) (शुचि) पवित्रम् (रेतः) वीर्यकरं जलम् (निषिक्तम्) अग्नावाज्यादिप्रक्षेपणेन नितरां सिक्तं विस्तृतम् (द्यौः) आकाशस्य। षष्ठ्यर्थेऽत्र प्रथमा। (अभीके) समीपे (अग्निः) सूर्य्यरूपः (शर्द्धम्) बलहेतुम् (अनवद्यम्) सर्वदोषरहितम् (युवानम्) युवत्वसम्पादकम् (स्वाध्यम्) यः सुष्ठु ध्यायते तम् (जनयत्) जनयति (सूदयत्) क्षरति वर्षयति (च)॥११॥
भावार्थः
यथाऽग्नौ हुतं द्रव्यं तेजसा सहैव सूर्य्यं प्राप्नोति, सूर्य्यो जलाद्याकृष्य वर्षित्वा सर्वान् पालयति, तथा राजा प्रजाभ्यः करानाकृष्य दुर्भिक्षे पुनर्दत्वा श्रेष्ठान् सम्पाल्य दुष्टान् सन्ताड्य प्रागल्भ्यं बलञ्च प्राप्नोति॥११॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! (यत्) जब (इषे) वर्षा के लिये (निषिक्तम्) अग्नि में घृतादि के पड़ने से निरन्तर बढ़ा हुआ (शुचि) पवित्र (तेजः) यज्ञ से उठा तेज (नृपतिम्) जैसे राजा का तेज व्याप्त हो वैसे सूर्य को (आ, आनट्) अच्छे प्रकार व्याप्त होता है, तब (अग्निः) सूर्यरूप अग्नि (शर्द्धम्) बलहेतु (अनवद्यम्) निर्दोष (युवानम्) ज्वानी को करनेहारे (स्वाध्यम्) जिनका सब चिन्तन करते (रेतः) ऐसे पराक्रमकारी वृष्टि जल को (द्यौः) आकाश के (अभीके) निकट (जनयत्) उत्पन्न करता (च) और (सूदयत्) वर्षा करता है॥११॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि में होम किया द्रव्य तेज के साथ ही सूर्य को प्राप्त होता और सूर्य जलादि को आकर्षण कर वर्षा करके सबकी रक्षा करता है, वैसे राजा प्रजाओं से करों को ले, दुर्भिक्षकाल में फिर दे, श्रेष्ठों को सम्यक् पालन और दुष्टों को सम्यक् ताड़ना देके प्रगल्भता और बल को प्राप्त होता है॥११॥
विषय
वीर्यसेचन से पुत्रोत्पत्ति के समान जलसेचन से अन्नादि और राजसामर्थ्य से बल की उत्पत्ति का वर्णन ।
भावार्थ
( यत् ) जिस प्रकार (नृपतिम् ) नर रूप नायक, पति अर्थात् पुरुष को (इषे) कामनापूत्ति वा निषेक के निमित्त (तेजः) तेज, वीर्य ( आनट ) प्राप्त होता है तभी वह ( शुचि) शुद्ध, दीप्तियुक्त (रेतः) उत्पादक वीर्य (द्यौ: अभीके) कामना युक्त स्त्री में ( निषिक्तम् ) निपिक्त हो तो (अग्नि) वह तेजस्वी पुरुष (शर्धम् ) बलवान्, (अनवद्यम् ) निर्दोष, अनिन्द्य, सुन्दर ( स्वाध्यम् ) उत्तम विचारानुसार ( युवानम् ) जवान, दीर्घायु हृष्ट-पुष्ट सन्तान को ( जनयत् ) उत्पन्न करता है और (सूदयत् च ) इसी के निमित्त निषेक करता है उसी प्रकार (यत्) जब (इपे) वर्षा के निमित्त या अन्नादि से उत्पन्न होने के लिये राजा के समान नेतृ शक्तियों के पालक या सब मनुष्यों के पालक सूर्य का (तेजः) तेज ( आ आनट् ) सर्वत्र व्याप्त होता है तब और (द्यौ: अभीके) आकाश में सर्वत्र ( शुचि रेतः निषिक्तम् ) शुद्ध जल रूप से गर्भित हो जाता है । तब (अग्नि) वह सूर्य (शर्धम् ) बलकारी ( अनवद्यम् ) निर्दोष (युवानम् ) 'यौवन या बल के वर्धक परस्पर मिश्रित, (स्वाध्यम् ) सुख से स्मरण या "धारण करने योग्य, उत्तम पोषक जल को ( जनयत् ) उत्पन्न करता है और (सूदयत् च) भूमि पर वर्षाता है । (२) राजा जब (इषे) अन्नादि के 'वितरण के लिये राजा का तेज फैलता है (द्यौरभीके) ज्ञान प्रकाश से युक्त राजसभा में विशुद्ध सामर्थ्य को प्रदान करता है और तब (अग्निः) अग्रणी नेता दोषरहित, स्तुतियोग्य, राष्ट्र के यौवन या धारण करने योग्य (दर्शम् ) सामर्थ्य को उत्पन्न करता है और उसको पुनः प्रजा पर ही वर्षा कर देता है। प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् । सहस्रगुणमुत्सष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥ रघुवंशे ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
पराशरः । अग्निः । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
जनन-सूदन
पदार्थ
१. संसार में मनुष्य प्रयत्न करता है, परन्तु शतशः प्रयत्नों के होते हुए भी कई बार वह ठीक मार्ग पर नहीं चल पाता। विघ्न प्रबल होते हैं, वह उन्हें नहीं जीत पाता, परन्तु प्रभु की (इषे) = प्रेरणा होने पर (नृपतिम्) = [ना चासौ पतिश्च] इस आगे बढ़नेवाले इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव को (तेज:) = तेज (यत्) = जब (आनट्) = समन्तात व्याप्त होता है तब (शुचि रेत:) = वह शुद्ध रेतस् [वीर्य] (द्यौः) = मस्तिष्करूप द्युलोक के (अभीके) = समीप, अर्थात् ज्ञानाग्नि में (निषिक्तम्) = सिक्त होता है, यह वीर्य ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और यह (नृपति) = जितेन्द्रिय मनुष्य उस (नृपतिः) = सब मनुष्यों के स्वामी प्रभु के दर्शन के योग्य बनता है। एवं, इस मन्त्र के पूर्वार्ध में निम्न बातें स्पष्ट हैं- [क] उन्नति प्रभुकृपा से ही होती है जब मनुष्य प्रभुप्रेरणा को सुन पाता है तभी उसमें इन्द्रियों का स्वामी बनने की भावना जागती है। [ख] यह जितेन्द्रिय [नृपति] ही तेजस्वी बन पाता है। [ग] इसका यह वासनाओं से अदूषित, पवित्र तेज इसकी ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है। २. दीप्त ज्ञानाग्निवाला यह (अग्निः) = उन्नतिशील पुरुष (जनयत्) = उस प्रभु के दर्शन करता है, हृदय में उसका प्रादुर्भाव कर पाता है, जो प्रभु [क] (शर्द्धम्) = तेज हैं, तेज के पुञ्ज हैं। [ख] (अनवद्यम्) = जिनमें किसी प्रकार का अवद्य पाप नहीं है, जो अपापविद्ध हैं। [ग] (युवानम्) = जो अशुभ को दूर करके शुभ के साथ हमें संपृक्त करनेवाले हैं। [घ] (स्वाध्यम्) = [सु आध्य] उत्तमता से सर्वथा ध्यान करने योग्य हैं। इस प्रभु के प्रादुर्भाव से यह आत्मा भी तेजस्वी, निष्पाप व अशुभ से दूर व शुभ से युक्त होती है। ३. प्रभु का अपने हृदयान्तरिक्ष में प्रादुर्भाव करनेवाला यह अग्नि इस प्रभु का मित्र बनकर सूदयत् च-सब काम-क्रोधादि वासनाओं को नष्ट कर देता है [सूद to kill]। जब तक जीव अकेला था, वासनाओं का शिकार हो जाता था, परन्तु अब प्रभु से मित्रता करके यह वासनाओं को भस्म करने योग्य हो गया है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु प्रेरणा से जितेन्द्रिय बन हम ऊर्ध्वरेतस् बनें, ज्ञानाग्नि को दीप्त कर प्रभु-दर्शन करें। वासनाओं को सुदूर विशरण करनेवाला व्यक्ति ही 'पराशर' है।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे अग्नीत टाकलेले द्रव्य वेगाने सूर्याकडे जाते आणि सूर्य मेघाद्वारे जलाच्या रूपाने बरसून सर्वांचे रक्षण करतो तसे राजाने प्रजेकडून कर घेऊन दुर्भिक्ष आल्यास पुन्हा प्रजेला तो परत करावा. श्रेष्ठांचे पालन व दुष्टांचे निर्दालन करावे. म्हणजे प्रगल्भता व सामर्थ्य प्राप्त होते.
विषय
पुन्हा त्याच विषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, (इषे) वृष्टीसाठी (निषिक्तम्) अग्नीत घृत आदी पदार्थ पडून (यत्) जो (शुचि) पवित्र (तेजः) यज्ञातून उठणारा तेज उत्पन्न होतो, तो जसा राजाचा प्रताप सर्व राज्यभर व्याप्त असतो, तद्वत तो यज्ञतेज सूर्याला (आ, आनट्) चांगल्याप्रकारे प्राप्त होतो. त्यानंतर (अग्निः) तो सूर्यरुप अग्नी (शर्द्धम्) शक्तीपूर्ण (अनवद्यम्) दोषरहित (युवानम्) यौवन देणारे आणि (स्याध्यम्) ज्याची सर्व कामना करतात, त्या (रेतः) पराक्रमकारी वृष्टिजलाला (घौः) आकाशा (अभीके) जवळ (जनयत्) उत्पन्न करतो (च) आणि (सूदयत्) पृथ्वीवर पाऊस पाडतो॥ (वृष्टिजल युवाजनांना शक्ती देतो.) ॥11॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जसे अग्नीत आहुती द्रव्याचा तेज सूर्याला पोहचतो आणि सूर्य जल औषधी रस आदीना आकर्षणाद्वारे शोषून पुन्हा पृथ्वीवर वर्षा करून सर्वांची रक्षा करतो, तसे राजाने प्रजेकडून कररूपात धन घ्यावे, पण दुष्काळ पडल्यास प्रजेस ते द्यावे तसेच त्या धनाने श्रेष्ठ जनांचे पालन आणि दुष्टांना योग्य ताडण करून आपला प्रताप व शक्ती वाढवावी. ॥11॥
इंग्लिश (3)
Meaning
When, for rain, the pure light, coming out of the fire of a yajna full of ghee oblations, reaches the Sun ; he creates in the atmosphere and sends in the form of rain, water, invigorating, pure, youth-infusing, and drinkable.
Meaning
When the brilliant fragrance, pure and sanctified in yajna for the sake of nourishment and energy, reaches the sun, luminous ruler of the world, then the living energy of the sun creates pure, energising, praiseworthy, youthful, lovable, fertilizing waters close to the light of heaven and showers them as the seed of life on earth.
Translation
When pure, radiant light emerges out of the supreme fire, then from the heaven descends the limpid moisture. The fire-divine urges strong, blameless and ever-young clouds to assist in the production of food. (1)
Notes
Işe, for food. Śardham, strong; vigorous. Anavadyam, blameless. Tejaḥ, तेजसो हेतुभूतं हवि:, oblations that produce light. Nrpatim, to the king, the fire. Retaḥ, जगद्वीजभूत जलम्, water, which is the source of all the world; also, moisture. Yuvānam, परिपक्वरसं मेघं, young clouds.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! (য়ৎ) যখন (ইষে) বর্ষা হেতু (নিষিক্তম্) অগ্নিতে ঘৃতাদি প্রক্ষিপ্ত হওয়ার ফলে নিরন্তর বৃদ্ধি প্রাপ্ত (শুচি) পবিত্র (তেজঃ) যজ্ঞ হইতে উত্থিত তেজ (নৃপতিম্) যেমন রাজার তেজ ব্যাপ্ত হয় সেইরূপ সূর্য্যকে (আ, আনট্) উত্তম প্রকার ব্যাপ্ত হয় তখন (অগ্নিঃ) সূর্য্যরূপ অগ্নি (শর্দ্ধম্) বল হেতু (অনবদ্যম্) নির্দোষ (য়ুবানম্) যুবত্ব সম্পাদক (স্বাধ্যম্) যাহার সকলে চিন্তন করে (রেতঃ) এমন পরাক্রমকারী বৃষ্টি জলকে (দ্যৌঃ) আকাশের (অভীকে) নিকট (জনয়ৎ) উৎপন্ন করে (চ) এবং (সুদয়ৎ) বর্ষা করে ॥ ১১ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যেমন অগ্নিতে হোমকৃত দ্রব্য তেজ সহ সূর্য্যকে প্রাপ্ত হয় এবং জলাদিকে আকর্ষণ করিয়া বর্ষা করিয়া সকলের রক্ষা করে, যেমন রাজা প্রজাদিগের হইতে কর লইয়া দুর্ভিক্ষকালে পুনরায় ফিরাইয়া দেন, শ্রেষ্ঠদিগকে সম্যক্ পালন করা এবং দুষ্টদিগকে সম্যক্ তাড়না দিয়া বুদ্ধি ও বলকে প্রাপ্ত হয় ॥ ১১ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
আ য়দি॒ষে নৃ॒পতিং॒ তেজ॒ऽআন॒ট্ শুচি॒ রেতো॒ নিষি॑ক্তং॒ দ্যৌর॒ভীকে॑ ।
অ॒গ্নিঃ শর্দ্ধ॑মনব॒দ্যং য়ুবা॑নꣳস্বা॒ধ্যং᳖ জনয়ৎসূ॒দয়॑চ্চ ॥ ১১ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
আ য়দিত্যস্য পরাশর ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । বিরাট্ ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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