यजुर्वेद - अध्याय 33/ मन्त्र 42
ऋषिः - कुत्स ऋषिः
देवता - सूर्यो देवता
छन्दः - निचृत त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
194
अ॒द्या दे॑वा॒ऽउदि॑ता॒ सूर्य्य॑स्य॒ निरꣳह॑सः पिपृ॒ता निर॑व॒द्यात्।तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वीऽउ॒त द्यौः॥४२॥
स्वर सहित पद पाठअ॒द्य। दे॒वाः॒। उदि॒तेत्युत्ऽइ॑ता। सूर्य्य॑स्य। निः। अꣳह॑सः। पि॒पृ॒त। निः। अ॒व॒द्यात् ॥ तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। मा॒म॒ह॒न्ता॒म्। म॒म॒ह॒न्ता॒मिति॑ ममहन्ताम्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः ॥४२ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अद्या देवाऽउदिता सूर्यस्य निरँहसः पिपृता निरवद्यात् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
स्वर रहित पद पाठ
अद्य। देवाः। उदितेत्युत्ऽइता। सूर्य्यस्य। निः। अꣳहसः। पिपृत। निः। अवद्यात्॥ तत्। नः। मित्रः। वरुणः। मामहन्ताम्। ममहन्तामिति ममहन्ताम्। अदितिः। सिन्धुः। पृथिवी। उत। द्यौः॥४२॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
विद्वांसः कीदृशाः स्युरित्याह॥
अन्वयः
हे देवा विद्वांसो! यूयं यतः सूर्यस्योदिताऽद्यांहसो नो निष्पिपृतावद्याच्च निष्पिपृत तन्मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौरस्मान् मामहन्ताम्॥४२॥
पदार्थः
(अद्य) अत्र निपातस्य च [अ॰६.३.१३६] इति दीर्घः। (देवाः) विद्वांसः (उदिता) उदिते। अत्राऽऽकारादेशः। (सूर्य्यस्य) सवितुः (निः) नितराम् (अंहसः) अपराधात् (पिपृत) व्याप्नुत। अत्र संहितायाम् [अ॰६.३.११४] इति दीर्घः। (निः) नितराम् (अवद्यात्) निन्द्यात् दुःखात् (तत्) तस्मात् (नः) अस्मान् (मित्रः) सुहृत् (वरुणः) श्रेष्ठः (मामहन्ताम्) सत्कुर्वन्तु (अदितिः) अन्तरिक्षम् (सिन्धुः) सागरः (पृथिवी) भूमिः (उत) अपि (द्यौः) प्रकाशः॥४२॥
भावार्थः
ये विद्वांसो मनुष्याः प्राणादिवत् सर्वान् सुखयन्ति, अपराधाद् दूरे रक्षन्ति, ते जगद्भूषकाः सन्ति॥४२॥
हिन्दी (3)
विषय
विद्वान् लोग कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (देवा) विद्वान् लोगो! जिस कारण (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (उदिता) उदय होते (अद्य) आज (अंहसः) अपराध से (नः) हमको (निः) निरन्तर बचाओ और (अवद्यात्) निन्दित दुःख से (निः, पिपृत) निरन्तर रक्षा करो (तत्) इससे (मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) प्रकाश ये सब हमारा (मामहन्ताम्) सत्कार करें॥४२॥
भावार्थ
जो विद्वान् मनुष्य प्राणादि के तुल्य सबको सुखी करते और अपराध से दूर रखते हैं, वे जगत् को शोभित करनेवाले हैं॥४२॥
विषय
विद्वानों का कार्य निन्दनीय कार्यों से बचना । पक्षान्तर में भौतिक तत्वों से उत्तम देह रचना ।
भावार्थ
हे ( देवाः ) सब अर्थों के प्रकाश करने वाले, प्रिय, विद्वान् पुरुषो! आप (सूर्यस्य) सूर्य के उदय हो जाने पर जैसे किरणें अन्धकार को दूर कर देती हैं वैसे आप लोग (सूर्यस्य उदिता) सूर्य के समान तेजस्वी ब्रह्म ज्ञान के हृदय में उदित हो जाने पर और राष्ट्र में तेजस्वी राजा के उदय हो जाने पर हमें (अंहसः) पाप से और ( अवद्यात् ) निन्दनीय कर्म से भी (पितृत) बचावें । पापों से पृथक करें और (मित्रः ) सबका स्नेही न्यायाधीश, (वरुण) दुष्टों का वारक, सर्वश्रेष्ठ, (अदिति:) अखण्ड शासनाज्ञा वाला, (सिन्धुः) नदी के समान वेगवान्, बलवान्, राष्ट्र को बांधने वाला, प्रबन्धक (पृथिवी ) पृथिवी के समान सर्वाश्रय, उत (द्यौः) आकाश के समान विशाल पुरुष (नः) हमारे (तत्) उस संकल्प को ( मामहन्ताम् ) सत्कार करे । (२) भौतिक पक्ष में- सूर्य के उदय होने पर (देवाः) सूर्य की किरणें हमें बुरे कर्म (अंहसः) पाप और रोग से दूर करें । हम स्वच्छ निरोग, शुभ संकल्पवान् हों । (मित्रः) सूर्य, (वरुणः) जल, (अदितिः) आकाश, ( सिन्धुः) सागर या जल प्रवाह, (पृथिवी) पृथिवी और (द्यौः) सूर्य का प्रकाश ( नः तत् मामहन्ताम् ) हमारे इस शरीर को उत्तम बनावे ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्सः । सूर्यः । निचृत् । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
चैक का कैश होना
पदार्थ
१. प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कुत्स' है। यह वासनाओं को ['कुथ हिंसायाम्'] कुचल डालता है, इसके जीवन का यही ध्येय बनता है। यह प्रार्थना करता है कि (देवाः) = हे देवो ! अथवा हे दिव्य वृत्तियो ! (अद्य) = आज (उदिता सूर्यस्य) = सूर्योदय होते ही (अंहसः) = कष्ट व पीड़ा से (नि: पिपृत) = हमें पार ले चलो। (निः अवद्यात्) = पीड़ा से दूर करने के लिए हमें निन्द्य पापों से बचाओ। [क] 'पीड़ा से दूर होना, [ख] पीड़ा से दूर होने के लिए पापों से ऊपर उठना' यह है कुत्स का निश्चय । इस निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए उसका मुहूर्त कल का नहीं है, आज ही और अभी सूर्योदय के समय ही । यह कुत्स कल-कल की उपासना नहीं करता। २. (नः) = हमारे (तत्) = इस संकल्प को (मित्र:) = स्नेह का देवता (वरुणः) = द्वेषनिवारण का देवता (अदितिः) = अखण्डन व स्वास्थ्य का देवता (सिन्धुः) = 'एतैरिदं सर्वं सितं तस्मात् सिन्धव:'- जिससे ये पाँच भूत बद्ध [integrated] हैं, वह सोमशक्ति (पृथिवी) = [प्रथ विस्तारे] विस्तार व उदारता (उत) = और (द्यौ:) = दिव्=प्रकाश-मस्तिष्क की उज्ज्वलता व ज्ञान की देवता-ये सब (मामहन्ताम्) = आदृत करें। बैंक में जैसे एक चैक आदृत हो जाता है, अर्थात् केश कर दिया जाता है उसी प्रकार कुत्स का 'पीड़ा व पाप से दूर होने का निश्चय' ही एक चैक है। उस चैक का आदर मित्रादि देवों के बैंक ने करना है। इन देवों के बैंक में हमारा क्रेडिट पूँजी होगी तभी चैक आदृत होगा, अतः हमें 'स्नेह व द्वेषराहित्य, स्वास्थ्य, सोम, उदारता व प्रकाश' इन गुणों का बैंक बनने का प्रयत्न करना है। इन्हीं का आदान-प्रदान करनेवाला होना है। इन पाँच का विकास करनेवाले ही 'पञ्चजन' हैं।
भावार्थ
भावार्थ- कुत्स ऋषि वह है जो 'स्नेह व निद्वेषता, स्वास्थ्य, सोम, उदारता व प्रकाश' का पुञ्ज बनने का प्रयत्न करता है। इसी से वह 'पञ्जजन' कहलाएगा।
मराठी (2)
भावार्थ
प्राण जसा सर्वांना सुखी करतो तसे विद्वान लोक सर्वांना सुखी करतात व अपराधापासून दूर करतात असे लोक जगात शोभायमान ठरतात.
विषय
पुनश्च, तोच विषय -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे (देवाः) विद्वज्जनहो, आपण (सूय्यस्य) (उदित) सूर्योदयापासून (सूर्यास्तापर्यंत) (अघ) आज (नः) आम्हाला (अंहसः) पापकर्मापासून (निः) निरंतर दुर ठेवा. तसेच (अवद्यात) निंदनीय वा अप्रिय दुःखापासून (निः, पिपृत) निरंतर दूर ठेवा. (तत्) या व्यतिरिक्त (मित्र) (वरूणः) श्रेष्ठ (आमचे मित्रगण व समाजातील श्रेष्ठ जन) तसेच (आदितिः) अंतरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमी (उत) आणि (द्यौः) प्रकाशलोक, हे सर्व आम्हा (सामान्यजनांना) (मामहन्ताम्) आमचे रक्षण करीत आम्हास कीर्तीमंत करोत ॥42॥
भावार्थ
भावार्थ - जे विद्वज्जन आपल्या सर्वांना आपल्या प्राणासारखे मानून त्यांना सुखी-आनंदित करतात आणि दोषापासून वा दुष्कर्मापासून दूर ठेवतात, ते संसाराची शोभा आहेत. ॥42॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O learned persons, save us today from sin and blameable affliction, when the sun hath ascended. May friends, noble persons, atmosphere, sea, Earth and light all honour our determination.
Meaning
Today on the rise of the sun, the noblest sages and divinities, we pray, may save us from sin and despicable action. Similarly may Mitra, light of the day, Varuna, spirit of the night, the sky, the sea, the earth and heaven exalt us with honour.
Translation
O bounties of Nature, this day at the time of sun-rise may you make us free from sin and ill-repute. May the Lord friendly and venerable, and also the Eternity, the ocean, the earth and the heaven grant us this prayer of ours. (1)
Notes
Udita suryasya, सूर्यस्य उदयकाले, at the time of sun-rise. Ainhasaḥ, पापात् , from sin. Avadyat, दुर्यशस:, from ill-fame, or notoriousness. Nih pipṛtā, release us from, निर्मुंचत I Māmahantām, पूजयन्तु, अङ्गीकुर्वन्तु, may they accept our this prayer.
बंगाली (1)
विषय
বিদ্বাংসঃ কীদৃশাঃ স্যুরিত্যাহ ॥
বিদ্বান্গণ কেমন হইবে এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (দেবা) বিদ্বান্গণ! যে কারণে (সূর্য়্যস্য) সূর্য্যের (উদিত) উদয় হইলে (অদ্য) আজ (অংহসঃ) অপরাধ হইতে (নঃ) আমাদেরকে (নিঃ) নিরন্তর রক্ষা করুন এবং (অবদ্যাৎ) নিন্দিত দুঃখ হইতে (নিঃ, পিপৃত) নিরন্তর রক্ষা করুন (তৎ) ইহাতে (মিত্রঃ) মিত্র (বরুণঃ) শ্রেষ্ঠ (অদিতিঃ) অন্তরিক্ষ (সিন্ধুঃ) সমুদ্র (পৃথিবী) ভূমি (উত) এবং (দ্যৌঃ) প্রকাশ এইগুলি সব আমাদের (মামহন্তাম্) সৎকার করিবে ॥ ৪২ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–যে সব বিদ্বান্ মনুষ্য প্রাণাদি তুল্য সকলকে সুখী করেন এবং অপরাধ হইতে দূরে রাখেন তাঁহারা জগৎকে শোভিত করিয়া থাকেন ॥ ৪২ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
অ॒দ্যা দে॑বা॒ऽউদি॑তা॒ সূর্য়্য॑স্য॒ নিরꣳহ॑সঃ পিপৃ॒তা নির॑ব॒দ্যাৎ ।
তন্নো॑ মি॒ত্রো বর॑ুণো মামহন্তা॒মদি॑তিঃ॒ সিন্ধুঃ॑ পৃথি॒বীऽউ॒ত দ্যৌঃ ॥ ৪২ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
অদ্যা দেবা ইত্যস্য কুৎস ঋষিঃ । সূর্য়ো দেবতা । নিচৃৎ ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal