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यजुर्वेद अध्याय - 33

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  • यजुर्वेद - अध्याय 33/ मन्त्र 37
    ऋषिः - कुत्स ऋषिः देवता - सूर्यो देवता छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    128

    तत्सूर्य्य॑स्य देव॒त्वं तन्म॑हि॒त्वं म॒ध्या कर्त्तो॒र्वित॑त॒ꣳ सं ज॑भार। य॒देदयु॑क्त ह॒रितः॑ स॒धस्था॒दाद्रात्री॒ वास॑स्तनुते सि॒मस्मै॑॥३७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तत्। सूर्य्य॑स्य। दे॒व॒त्वमिति॑ देव॒ऽत्वम्। तत्। म॒हि॒त्वमिति॑ महि॒ऽत्वम्। म॒ध्या। कर्त्तोः॑। वित॑तमिति॑ विऽत॑तम्। सम्। ज॒भा॒र॒ ॥य॒दा। इत्। अयु॑क्त। ह॒रितः॑। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त। आत्। रात्री॑। वासः॑। त॒नु॒ते॒। सि॒मस्मै॑ ॥३७ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तत्सूर्यस्य देवत्वन्तन्महित्वम्मध्या कर्तार्विततँ सञ्जभार । यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    तत्। सूर्य्यस्य। देवत्वमिति देवऽत्वम्। तत्। महित्वमिति महिऽत्वम्। मध्या। कर्त्तोः। विततमिति विऽततम्। सम्। जभार॥यदा। इत्। अयुक्त। हरितः। सधस्थादिति सधऽस्थात। आत्। रात्री। वासः। तनुते। सिमस्मै॥३७॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 33; मन्त्र » 37
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेश्वरविषयमाह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! जगदीश्वरोऽन्तरिक्षस्य मध्या हरितो यदा विततं च सं जभार सिमस्मै रात्री वासस्तनुते। आत्सधस्थादिदयुक्त तत्कर्त्तोः सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं यूयं विजानीत॥३७॥

    पदार्थः

    (तत्) (सूर्यस्य) चराचरात्मनः परमेश्वरस्य (देवत्वम्) देवस्य भावम् (तत्) (महित्वम्) महिमानम् (मध्या) मध्ये। अत्र विभक्तेराकारादेशः। (कर्त्तोः) कर्तुं समर्थस्य (विततम्) विस्तृतं कार्यं जगत् (सम्) (जभार) जहार हरति। अत्र हस्य भः। (यदा) (इत्) (अयुक्त) समाहितो भवति (हरितः) ह्रियन्ते पदार्था यासु ता दिशः (सधस्थात्) समानस्थानात् (आत्) अनन्तरम् (रात्री) रात्रीवत् (वासः) आच्छादनम् (तनुते) विस्तृणाति (सिमस्मै) सर्वस्मै॥३७॥

    भावार्थः

    हे मनुष्याः! भवन्तो येनेश्वरेण सर्वं जगद्रच्यते ध्रियते पाल्यते विनाश्यते च तमेवास्य महिमानं विदित्वा सततमेतमुपासीरन्॥३७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब ईश्वर के विषय में कहते हैं॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जगदीश्वर अन्तरिक्ष के (मध्या) बीच (यदा) जब (हरितः) जिन में पदार्थ हरे जाते उन दिशाओं और (विततम्) विस्तृत कार्यजगत् को (सम्, जभार) संहार कर अपने में लीन करता (सिमस्मै) सबके लिये (रात्री) रात्री के तुल्य (वासः) अन्धकाररूप आच्छादन को (तनुते) फैलाता और (आत्) इसके अनन्तर (सधस्थात्) एक स्थान से अर्थात् सर्व साक्षित्वादि से निवृत्त हो के एकाग्र (इत्) ही (अयुक्त) समाधिस्थ होता है, (तत्) वह (कर्त्तोः) करने को समर्थ (सूर्यस्य) चराचर के आत्मा परमेश्वर का (देवत्वम्) देवतापन (तत्) वही उसका (महित्वम्) बड़प्पन तुम लोग जानो॥३७॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो! आप लोग जिस ईश्वर से सब जगत् रचा, धारण, पालन और विनाश किया जाता है, उसी को और उसकी महिमा को जान के निरन्तर उसकी उपसाना किया करो॥३७॥

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    विषय

    सूर्य के दृष्टान्त से परमेश्वर का वर्णन । उसके शुक्ल, कृष्ण दोनों प्रकार के रूपों का रहस्य ।

    भावार्थ

    (सूर्यस्य) सूर्य सबके प्रेरक सञ्चालक और उत्पादक परमेश्वर का ( तत् देवत्वम् ) यही अवर्णनीय 'देवत्व' अर्थात् सर्वशक्तिप्रद स्वरूप है और (तत्) वही अलौकिक (महित्वम् ) महान् सामर्थ्य है कि वह ( विततम् ) नाना प्रकारों से फैले विस्तृत संसार को ( कत्तः) बनाने में समर्थ है, वही (मध्या) बीच में व्यापक है और वही (सं जभार) इसका संहार करता है । ( यदा इत् ) जब भी वह ( सधस्थात् ) एकत्र होने के केन्द्र स्थान से (हरितः) अपनी तीव्र गतिदायिनी शक्तियों को और विस्तृत दिशाओं को भी, समस्त किरणों को सूर्य के समान (अयुक्त) एकत्र कर लेता है ( भत्) तभी ( रात्रि) रात्रि के समान ही प्रलयकाल की रात्रि (सिमस्मै) इस समस्त ब्रह्माण्ड के ऊपर ( वासः तनुते ) आवरण सा छा देती है । (२) सूर्य के समान तेजस्वी राजा का यही देवत्व और महत्व है कि वह राष्ट्र के बीच में रहकर राष्ट्र को बनाने और बिगाड़ने में समर्थ है । वह एक ही मुख्य पद से समस्त (हरितः) दिशाओं अर्थात् देशों यह समस्त विद्याओं और वीर पुरुषों को रथ में अश्वों के समान, राष्ट्र कार्य में नियुक्त करता है, तभी 'रात्रि' सबको आनन्द सुख देने वाली राज्य व्यवस्था सबके लिये वस्त्र के समान गर्मी, सर्दी, दुःख, पीड़ा विपत से बचाने वाली होकर रक्षा प्रदान करती है ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    [ ३७, ३८ ] कुत्सः । सूर्यः । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥

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    विषय

    उपसंहार=Retirement

    पदार्थ

    १. (तत्) = तभी (सूर्यस्य) = गतमन्त्र में वर्णित सूर्य का (देवत्वम्) = देवपन व (तत्) = तभी (महित्वम्) = बड़प्पन, महिमा होती है (यदा) = जब मध्या (कर्त्तोः) = कामों के बीच में (विततम्) = फैले हुए क्रिया - जाल को (संजभार) = मनुष्य संगृहीत करता है। संसार के कार्यभारों-व्यापार आदि को समेटकर २. (यदा) = जब यह (इत्) = निश्चय से (सधस्थात्) = सदा साथ रहनेवाले प्रभु से (हरित:) = ज्ञान की रश्मियों को (अयुक्त) = अपने साथ जोड़ता है। मनुष्य कार्यों से निपटकर जब प्रभु के समीप बैठता है, तब उसे ज्ञानधन प्रभु की ज्ञानरश्मियाँ क्यों न दीप्त करेंगी ? इन ज्ञानरश्मियों से द्योतित होकर ही यह 'देव' = चमकनेवाला बनता है। चमकने पर ही इसकी महिमा होती है। इस प्रकार यह देवत्व व महत्त्व को प्राप्त करता है। ३. (आत्) = अन्यथा, कार्यों का उपसंहार करके प्रभु की गोद में न बैठने पर रात्री अज्ञानान्धकार सिमस्मै सबके लिए (वासः) = अन्धकारवस्त्र को (तनुते) = तान देती है, अर्थात् मनुष्य गरीब हुआ तो नमक- तेल-ईंधन की चिन्ता में और धनी हुआ तो रुपये-पैसे की चिन्ता में जीवन को बिता देता है। उसे " कोऽहं कुत आजात: ' ' ' मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ' इन प्रश्नों के सोचने का समय ही नहीं मिलता। ४. इस अज्ञानान्धकार को नष्ट करनेवाला व्यक्ति ही 'कुत्स' है। यह 'कुथ हिंसायाम्' अज्ञान की हिंसा करने के लिए ज्ञान के सूर्य का अपने में उदय करता है। इस सूर्योदय के लिए ही लौकिक कार्यों से निवृत्त होकर प्रभु चरणों में बैठता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम जीविका के कार्यों का उपसंहार करके सधस्थ प्रभु से ज्ञान प्राप्त करें, जिससे हमपर अज्ञान का पर्दा न पड़ा रहे।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे माणसांनो ! ज्या ईश्वराने हे जग निर्माण केलेले आहे आणि ते तो धारण करतो, पालन करतो व त्याचा विनाशही करतो त्या ईश्वराची महिमा जाणून त्याचीच निरंतर उपासना करा.

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    विषय

    आता ईश्‍वरा विषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, तो जगदीश्‍वर अंतरिक्षा (मध्या) मधे (यदा) जेव्हां (हरितः) ज्यामधे पदार्थ नष्ट वा हरवतात त्या दिशांचा आणि (विततम्) विस्तीर्ण जगाचा (सम्, गभार) संहार करतो, (प्रलयकाळी आपल्यामधे विलीन करुन घेतो) तसेच (सिमस्मै) सर्वांकरिता (रात्री) रात्रीप्रमाणे (वासः) अंधकाररूप आच्छादन वा पांघरून (तनुते) फैलावतो (त्यामुळे सर्व जीव शांती व जीवन प्राप्त करतात) (आत्) त्यानंतर तो परमात्मा (सधस्थात्) एका स्थानावरून दूर होऊन म्हणजे त्याच्या सर्वसाक्षित्व आदी गुणांपासून निवृत्त होऊन (इत्) एकाग्र होऊन (अयुक्त) समाधिस्थ होतो (तत्) त्या (कर्तोः) सर्वसमर्थ (सूय्यस्य) चराचराचा जो आत्मा परमात्मा, त्याचे (देवत्वम्) देवत्व कशात आहे आणि (तत्) त्याचा तो (महित्वम्) महत्त्व वा मोणेपणा कशात आहे, ते तुम्ही लोक जाणून घ्या. ॥37॥

    भावार्थ

    भावार्थ - हे मनुष्यांनो, ज्या ईश्‍वराने जग रचले जो यास धारण करतो, पालन करतो आणि विनाश करतो, त्यालाच तुम्ही पूर्णपणे जाणण्याचा यत्न करा आणि त्याची महिमा जाणून घेऊन निरंतर त्याचीच उपासना करीत जा. ॥37॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O men, understand the divinity and greatness of God, the soul of the animate and inanimate creation ; Who dissolves in Himself the quarters in the atmosphere, and this vast created universe, and spreads for all darkness like night ; Who again creates the universe with His invisible, divine might.

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    Meaning

    That divine light of the Sun, eternal creator, and that grandeur of His, is positively extended in the midst of the universe as His power and will to create. The same He withdraws (and the structure goes off). When the power is thus disconnected and withdrawn from space back into the centre, then from the centre itself, the Night, the Lord’s power of negation, weaves the cover of darkness for all.

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    Translation

    Such is the divinity, such is the majesty of the radiant sun, that, when he sets, he withdraws into himself the diffused light (which has been shed upon the unfinished task). When he withdraws the beams from his aura of glory, as if unyoking the coursers from the chariot, the night extends the veiling darkness over all. (1)

    Notes

    Devatvam, divinity. Mahitvam, majesty. Sain jabhāra, संहरते, withdraws into himself (the diffused light). Kartorvitatam, being shed upon (unfinished) work. Haritaḥ ayukta, unyokes his horses, as if. Also, draws to himself his yellow rays. Simasmai, सर्वस्मै,for all. Vasaḥ tanute, spreads her veils, i. e. covers everything with darkness.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথেশ্বরবিষয়মাহ ॥
    এখন ঈশ্বরের বিষয়ে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! জগদীশ্বর অন্তরিক্ষের (মধ্যা) মধ্যে (য়দা) যখন (হরিতঃ) যাহাতে পদার্থ হরণ করা হয় সেই সব দিশা এবং (বিততম্) বিস্তৃত কার্য্য জগৎকে (সম্, জভার) সংহার নিজের মধ্যে লীন করেন (সিমস্মৈ) সকলের জন্য (রাত্রী) রাত্রি তুল্য (বাসঃ) অন্ধকাররূপ আচ্ছাদনকে (তনুতে) বিস্তৃত করেন এবং (আৎ) ইহার পশ্চাৎ (সধস্থাৎ) এক স্থান হইতে অর্থাৎ সর্ব সাক্ষিত্বাদি হইতে নিবৃত্ত হইয়া একাগ্র (ইৎ)(অয়ুক্ত) সমাধিস্থ হয় । (তৎ) তিনি (কর্ত্তোঃ) করিতে সক্ষম (সূর্য়স্য) চরাচরের আত্মা পরমেশ্বরের (দেবত্বম্) দেবত্ব (তৎ) সেই তাহার (মহিত্বম্) মহিমা তোমরা জানিবে ॥ ৩৭ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! আপনারা যে ঈশ্বর দ্বারা সর্ব জগৎ রচিত হইয়াছে, ধারণ, পালন ও বিনাশ করা হয়, তাহাকে এবং তাহার মহিমাকে জানিয়া নিরন্তর তাহার উপাসনা করিতে থাক ॥ ৩৭ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    তৎসূর্য়্য॑স্য দেব॒ত্বং তন্ম॑হি॒ত্বং ম॒ধ্যা কর্ত্তো॒র্বিত॑ত॒ꣳ সং জ॑ভার ।
    য়॒দেদয়ু॑ক্ত হ॒রিতঃ॑ স॒ধস্থা॒দাদ্রাত্রী॒ বাস॑স্তনুতে সি॒মস্মৈ॑ ॥ ৩৭ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    তৎসূর্য়স্যেত্যস্য কুৎস ঋষিঃ । সূর্য়্যো দেবতা । ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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