यजुर्वेद - अध्याय 33/ मन्त्र 54
ऋषिः - वामदेव ऋषिः
देवता - विश्वेदेवा देवताः
छन्दः - निचृत त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
147
दे॒वेभ्यो॒ हि प्र॑थ॒मं य॒ज्ञिये॑भ्योऽमृत॒त्वꣳ सु॒वसि॑ भा॒गमु॑त्त॒मम्।आदिद् दा॒मान॑ꣳ सवित॒र्व्यूड्टर्णुषेऽनूची॒ना जी॑वि॒ता मानु॑षेभ्यः॥५४॥
स्वर सहित पद पाठदे॒वेभ्यः॑। हि। प्र॒थ॒मम्। य॒ज्ञिये॑भ्यः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। सु॒वसि॑। भा॒गम्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥ आत्। इत्। दा॒मान॑म्। स॒वि॒तः॒। वि। ऊ॒र्णु॒षे॒। अ॒नू॒ची॒ना। जी॒वि॒ता। मानु॑षेभ्यः ॥५४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
देवेभ्यो हि प्रथमँयज्ञियेभ्यो मृतत्वँ सुवसि भागमुत्तमम् । आदिद्दामानँ सवितर्व्यूर्णुषे नूचीना जीविता मानुषेभ्यः ॥
स्वर रहित पद पाठ
देवेभ्यः। हि। प्रथमम्। यज्ञियेभ्यः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। सुवसि। भागम्। उत्तममित्युत्ऽतमम्॥ आत्। इत्। दामानम्। सवितः। वि। ऊर्णुषे। अनूचीना। जीविता। मानुषेभ्यः॥५४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे सवितर्जगदीश्वर! हि यज्ञियेभ्यो देवेभ्य उत्तमं प्रथमममृतत्वं भागं सुवसि मानुषेभ्यो आदिद्दामानमनूचीना जीविता च व्यूर्णुषे तस्मादस्माभिरुपासनीयोऽसि॥५४॥
पदार्थः
(देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (हि) यतः (प्रथमम्) (यज्ञियेभ्यः) यज्ञसिद्धिकरेभ्यः (अमृतत्वम्) मोक्षस्य भावम् (सुवसि) प्रेरयसि (भागम्) भजनीयम् (उत्तमम्) श्रेष्ठम् (आत्) अनन्तरम् (इत्) एव (दामानम्) यो ददाति तम् (सवितः) सकलजगदुत्पादक (वि) (ऊर्णुषे) विस्तारयसि (अनूचीना) यैरन्वञ्चन्ति जानन्ति तानि (जीविता) जीवनहेतूनि कर्माणि (मानुषेभ्यः)॥५४॥
भावार्थः
हे मनुष्याः! परमेश्वरस्यैव योगेन विद्वत्सङ्गेन च सर्वोत्तमसुखं मोक्षं प्राप्नुत॥५४॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (सवितः) समस्त जगत् के उत्पादक जगदीश्वर! (हि) जिससे आप (यज्ञियेभ्यः) यज्ञसिद्धि करनेहारे (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (उत्तमम्) श्रेष्ठ (प्रथमम्) मुख्य (अमृतत्वम्) मोक्षभाव (भागम्) सेवने योग्य सुख को (सुवसि) प्रेरित करते हो (आत्, इत्) इसके अनन्तर ही (दामानम्) सुख देनेवाले प्रकाश और (अनूचीना) जानने के साधन (जीविता) जीवन के हेतु कर्मों को (मानुषेभ्यः) मनुष्यों के लिये (वि, ऊर्णुषे) विस्तृत करते हो, इसलिये उपासना के योग्य हो॥५४॥
भावार्थ
हे मनुष्यो! परमेश्वर ही के योग और विद्वानों के सङ्ग से सर्वोत्तम सुखवाले मोक्ष को प्राप्त होओ॥५४॥
विषय
वायु, इन्द्र, अश्वी आदि के कर्त्तव्य ।
भावार्थ
हे (सवितः ) सूर्य के समान समस्त पदार्थों के प्रकाशक और उत्पादक परमेश्वर ! तू (हि) जिस कारण ( यज्ञियेभ्यः) आत्मा और परमात्मा के उपासक एवं ज्ञान यज्ञ के करने वाले (देवेभ्यः) ज्ञान के द्रष्टा पुरुषों को ( प्रथमम् ) सबसे प्रथम, सर्वश्रेष्ठ और ( उत्तमम् ) उत्तम ( भागम् ) सेवन करने योग्य ( अमृतत्वम् ) अमृतस्वरूप मोक्ष का (सुवसि) प्रदान करता है ( आत् ) और ( दामानम् इत् ) सब सुखों और ज्ञानों के देने वाले अपने प्रकाशस्वरूप को भी ( व्यूर्णुषे) विविध प्रकार से फैलाता, प्रकट करता है । इसी से ( मानुषेभ्यः) मनुष्यों के हितार्थ (अनूचीना) उनके अनुकूल सुख प्राप्त कराने वाले ( जीवितानि) जीवनों और जीवनोत्पादक कर्मों को भी (वि ऊर्णुषे) विविध प्रकार से उपदेश करता है । (२) राजा ( यज्ञियेभ्यः देवेभ्यः) प्रजा के सुव्यवस्थित राष्ट्र के सञ्चालक एवं विजयी स्त्री पुरुषों को प्रथम ( अमृतत्वम् ) जीवनो- पयोगी अन्न जल और उत्तम सेवन योग्य पदार्थ प्रदान करता है और मनुष्यों को नाना जीवनोपयोगी साधन प्रदान करता है ।
टिप्पणी
इति समाप्तं सार्वमेधिकम् । इति वैश्वदेवस्तुत् चतुर्थमहः ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वामदेव ऋषिः सविता देवता । निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
वामदेव को प्रभु का प्रसाद
पदार्थ
१. पिछले मन्त्र की भावना के अनुसार अपने हृदय को देवासन बनाकर सुहोत्र अब 'वामदेव' = सुन्दर दिव्य गुणोंवाला बन गया है। प्रभु 'सविता' हैं [षु प्रसवैश्वर्ययोः], 'सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करनेवाले हैं और यह सम्पूर्ण ऐश्वर्य उन्हीं प्रभु का ही है। हे (सवितः) = आप ही देवों को देवत्व प्राप्त करानेवाले हैं। प्रभु इन देवों को क्या-क्या प्राप्त कराते हैं, यह देखिए । २. (देवेभ्यः) = देवताओं के लिए (हि) = निश्चय से (यज्ञियेभ्य:) = जिन्होंने अपना जीवन यज्ञमय बनाया है (प्रथमम्) = सबसे पहले (अमृतत्वम्) = अमृतत्व, रोगराहित्य को (सुवसि) = प्राप्त कराते हो। ये यज्ञमय जीवनवाले देव रोगों का शिकार नहीं होते । रोग का सम्बन्ध भोग के साथ है ('भोगे रोगभयम्') । यज्ञमय जीवन के साथ तो अमरता का ही सम्बन्ध है । यज्ञिय जीवनवाले देव रोगाक्रान्त नहीं होते। २. जहाँ देवों को रोगशून्यता व उत्तम स्वास्थ्य मिलता है, वहाँ साथ ही उस उत्तम स्वास्थ्य को स्थिर रखने के लिए उत्तमं भागम् उत्तम भजनीय सेवनीय धन सुवसि = प्राप्त कराते हो। धन को 'भग' कहते हैं। समूचा धन यदि ' भग' है, तो उसमें से मुझे प्राप्त हानेवाला अंश ही मेरा 'भाग' है। वह सवितादेव इन यज्ञशील देवों को सात्त्विक, अकुटिल मार्ग से प्राप्त होनेवाला धन देते हैं। ३. (आत् इत्) = धन के साथ आप इन देवों को (दामानम् र्व्यूर्णुषे) = उदरबन्धन से आच्छादित करते हैं। इनका जीवन बड़ा संयत होता है। पेट पर मानो ये रस्सी बाँधे रखते हैं। ये दामोदर ही तो संयत जीवनवाले होते हैं। इन यज्ञिय देवों को प्रभु धन के साथ संयम शक्ति भी प्राप्त कराते हैं। ये धनों से भोगों के भोगने में नहीं लग जाते। उदर पर दाम बाँधे रखते हैं । ४. इस प्रकार (मानुषेभ्यः) = इन मनुष्यमात्र का हित करनेवाले संयमी जीवनवाले पुरुषों के लिए (जीविता) = जीवन के साधन [यैः जीवति तानि जीवितानि] (अनूचीना) = अनुकूल होते हैं। जब मनुष्य अपने जीवन को सुन्दर बनाने में लगता है तब प्रभु उसे अनुकूल जीवन-साधन प्राप्त कराते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- हम वामदेव बनें ताकि प्रभु से प्रसाद के रूप में अमृतत्व = स्वास्थ्य, उत्तम धन, संयम व अनुकूल जीवन प्राप्त कर सकें।
मराठी (2)
भावार्थ
हे माणसांनो ! परमेश्वराच्या साह्याने व विद्वानांच्या संगतीने सर्वोत्तम सुख देणारा मोक्ष प्राप्त करा.
विषय
पुन्हा त्याच विषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे (सवितः) समस्त जगाचे उत्पत्तिकर्ता जगदीश्वर, (हि) अवश्यमेव आपणच (यज्ञियेभ्यः) यज्ञाच्या माध्यमाने इष्टसिद्धी करणार्या (देवेभ्यः) विद्वानांना (उत्तमम्) श्रेष्ठ (प्रथमम्) आणि मुख्य महत्त्वाचे (भागम्) सेवनीय असे (अमृतत्वम्) मोक्षरूप सुखाकडे (सुवसि) प्रेरणा देत आहात. (आत्, इत्) तसेच या व्यतिरिक्त (दामानम्) सुख देणारे सुख आणि (अनूचीना) ज्ञान प्राप्त करण्याची साधनें देत आहात. तसेच (जीविता) जीवनासाठी आवश्यक कर्म करणार्या (मानुषेभ्यः) मनुष्यांसाठी (वि, ऊर्णु षे) सर्व आवश्यक साधनें उपलब्ध करून देत आहात. यामुळे आपण उपासनीय आहात. (आम्ही आपली उपासना करीत आहोत.) ॥54॥
भावार्थ
भावार्थ – हे मनुष्यहो, परमेश्वराच्या उपासनेने आणि विद्वानांच्या सत्संगामुळे मिळणार्या सर्वोत्तम मोक्ष सुख प्राप्त करा. ॥54॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O God, as Thou bestowest on the learned performers of sacrifice, the noblest and highest bliss of immortality, and preachest for the good of humanity, the light of knowledge that conduces to happiness, and actions worth knowing, Thou art hence worthy of worship.
Meaning
Savita, lord of light and universal yajna of creation, you alone create the first and highest part of the joy of existence, Moksha, for the sagely nobilities of yajna. And then you alone weave the warp and woof of the means of light and knowledge and appropriate means of life and living for humanity.
Translation
O Creator, you grant the best gift of immortality to the enlightened and dedicated men of the first category. To the liberal givers, you open the portals of light and to the common men, you award the continuous cycle of existence. (1)
Notes
Yajniyebhyaḥ, to the dedicated persons. Amrtatvain suvasi, you grant the gift of immortality; also, you urge them to immortality. Dāmānam, दातारं, for the donor, liberal giver. Also, सश्मिसमूहं He, beams of sun-rays. Vyūrņuse, you open up; also, spread out. With this man tra, the Sarvamedha ceremony comes to an end.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (সবিতঃ) সমস্ত জগতের উৎপাদক জগদীশ্বর! (হি) যদ্দ্বারা আপনি (য়জ্ঞিয়েভ্যঃ) যজ্ঞসিদ্ধিকারী (দেবেভ্যঃ) বিদ্বান্দিগের জন্য (উত্তমম্) শ্রেষ্ঠ (প্রথমম্) মুখ্য (অমৃতত্বম্) মোক্ষভাব (ভাগম্) সেবনীয় সুখকে (সুবসি) প্রেরিত করেন (আৎ, ইৎ) ইহার অনন্তরই (দামানম্) সুখদাতা প্রকাশ এবং (অনূচীনা) জানিবার সাধন (জীবিতা) জীবন হেতু কর্ম্মসমূহকে (মানুষেভ্যঃ) মনুষ্যদিগের জন্য (বি, ঊর্ণুষে) বিস্তৃত করেন. এইজন্য উপাসনার যোগ্য ॥ ৫৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! পরমেশ্বরেরই সংযোগ এবং বিদ্বান্দিগের সঙ্গ দ্বারা সর্বোত্তম সুখযুক্ত মোক্ষ প্রাপ্ত করুন ॥ ৫৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
দে॒বেভ্যো॒ হি প্র॑থ॒মং য়॒জ্ঞিয়ে॑ভ্যোऽমৃত॒ত্বꣳ সু॒বসি॑ ভা॒গমু॑ত্ত॒মম্ ।
আদিদ্ দা॒মান॑ꣳ সবিত॒বূ্র্য᳖র্ণুষেऽনূচী॒না জী॑বি॒তা মানু॑ষেভ্যঃ ॥ ৫৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
দেবেভ্য ইত্যস্য বামদেব ঋষিঃ । বিশ্বেদেবা দেবতাঃ । নিচৃৎ ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal