यजुर्वेद - अध्याय 33/ मन्त्र 16
ऋषिः - गोतम ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - स्वराट् पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
121
विश्वे॑षा॒मदि॑तिर्य॒ज्ञिया॑नां॒ विश्वे॑षा॒मति॑थि॒र्मानु॑षाणाम्। अ॒ग्निर्दे॒वाना॒मव॑ऽआवृणा॒नः सु॑मृडी॒को भ॑वतु जा॒तवे॑दाः॥१६॥
स्वर सहित पद पाठविश्वे॑षाम्। अदि॑तिः। य॒ज्ञिया॑नाम्। विश्वे॑षाम्। अति॑थिः। मानु॑षाणाम् ॥ अ॒ग्निः। दे॒वाना॑म्। अवः॑। आ॒वृ॒णा॒न इत्या॑ऽवृ॒णा॒नः। सु॒मृडी॒क इति॑ सुऽमृडी॒कः। भ॒व॒तु॒। जा॒तवे॑दा॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दाः ॥१६ ॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वेषामदितिर्यज्ञियानाँविश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम् । अग्निर्देवानामवऽआवृणानः सुमृडीको भवतु जातवेदाः ॥
स्वर रहित पद पाठ
विश्वेषाम्। अदितिः। यज्ञियानाम्। विश्वेषाम्। अतिथिः। मानुषाणाम्॥ अग्निः। देवानाम्। अवः। आवृणान इत्याऽवृणानः। सुमृडीक इति सुऽमृडीकः। भवतु। जातवेदा इति जातऽवेदाः॥१६॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे सभापते! भवान् विश्वेषां यज्ञियानां देवानां मध्येऽदितिर्विश्वेषां मानुषाणामतिथिरव आवृणानः सुमृडीको जातवेदा अग्निर्भवतु॥१६॥
पदार्थः
(विश्वेषाम्) सर्वेषाम् (अदितिः) अखण्डितबुद्धिः (यज्ञियानाम्) ये यज्ञं पूजनमर्हन्ति ते (विश्वेषाम्) सर्वेषाम् (अतिथिः) पूजनीयः (मानुषाणाम्) मनुष्याणाम् (अग्निः) तेजस्वी राजा (देवानाम्) विदुषाम् (अवः) रक्षणादिकम् (आवृणानः) समन्तात् स्वीकुर्वन् (सुमृडीकः) सुष्ठु सुखप्रदः (भवतु) (जातवेदाः) आविर्भूतविद्यायोगप्रज्ञः॥१६॥
भावार्थः
मनुष्यैर्यः सर्वेषु विद्वत्सु गम्भीरबुद्धिः, सर्वमनुष्येषु मान्यः, प्रजारक्षादिराजकार्यं स्वीकुर्वाणः, सर्वसुखदाता, वेदादिशास्त्रवेत्ता शूरो भवेत्, स राजा कर्तव्यः॥१६॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे सभापते! आप (विश्वेषाम्) सब (यज्ञियानाम्) पूजा सत्कार के योग्य (देवानाम्) विद्वानों के बीच (अदितिः) अखण्डित बुद्धिवाले (विश्वेषाम्) सब (मानुषाणाम्) मनुष्यों में (अतिथिः) पूजनीय (अवः) रक्षा आदि को (आवृणानः) अच्छे प्रकार स्वीकार करते हुए (सुमृडीकः) सुन्दर सुख देनेवाले (जातवेदाः) विद्या और योग के अभ्यास से प्रसिद्ध बुद्धिवाले (अग्निः) तेजस्वी राजा (भवतु) हूजिये॥१६॥
भावार्थ
मनुष्यों को चाहिये कि जो सब विद्वानों में गम्भीर बुद्धिवाला, सब मनुष्यों में माननीय प्रजा की रक्षा आदि राजकार्य को स्वीकार करता, सब सुखों का दाता और वेदादि शास्त्रों का जाननेवाला शूरवीर हो, उसी को राजा करें॥१६॥
विषय
अग्रणी नायक सबको सुखकर और दयाशील हो ।
भावार्थ
(विश्वेषाम् ) समस्त ( यज्ञियानाम् ) पूजनीय, राष्ट्रपालन रूप यज्ञ के सम्पादक पुरुषों में (अदितिः) अखण्ड ज्ञान और आज्ञा वाला (विश्वेषाम् ) और समस्त ( मानुषाणाम् ) मनुष्यों में से (अतिथिः) सबसे अधिक पूज्य, सर्वोपरि स्थित और (देवानाम् ) विद्वान्, विद्या और धन के दानशील एवं विजयेच्छु पुरुषों में से ( जातवेदाः ) ज्ञानवान् (अग्निः) अग्रणी, तेजस्वी विद्वान् राजा ( अव ) रक्षण कार्य और अन्न आदि को( आवृणानः ) प्रदान करता हुआ ( सुमृडोकः भवतु ) उत्तम सुख देने वाला हो ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमः । अग्निर्जातवेदाः । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ।
विषय
अदिति, अतिथि, अविता
पदार्थ
१. [क] गत मन्त्र में 'हम यज्ञों में जानेवाले हों', इन शब्दों से प्रार्थना समाप्त हुई थी। इन (विश्वेषाम्) = सब (यज्ञियानाम्) = यज्ञ की वृत्तिवाले व्यक्तियों का वह प्रभु (अदिति:) = खण्डन न करनेवाला = शरीर को ठीक रखनेवाला है। वस्तुतः यज्ञिय भावना पुरुष को विलास से बचाकर स्वास्थ्य का धनी बनाती है। [ख] 'अदिति' शब्द का अर्थ 'अदीना देवमाता' भी है, न गिड़गिड़ानेवाली, अर्थात् आत्मसम्मान की भावना से युक्त और दिव्य गुणों का निर्माण करनेवाली । यज्ञिय वृत्ति होने पर दिव्य गुण पनपते हैं । २. वे प्रभु (विश्वेषाम्) = सब (मानुषाणाम्) = मनुष्यों का हित करनेवालों के (अतिथि:) = मेहमान व प्राप्त होनेवाले हैं। प्रभुभक्त वे ही हैं जो 'सर्वभूतहिते रत' हैं। मनुष्य मनुष्य की सहायता करता है तो प्रभु उसके हृदय में आसीन होते हैं। प्रभु को पाने का उपाय जन सेवा भी है। ३. मानवहित में लगा हुआ व्यक्ति देव बन जाता है और देवानाम् इन देवों का अग्निः ये अग्रणी प्रभु (अवः) = रक्षण (आवृणान:) = करते हैं ४. (जातवेदा:) = वे सर्वज्ञ प्रभु 'अदिति व मानुष' के लिए (सुमृडीकः भवतु) = उत्तम सुख प्राप्त करानेवाले हों। यज्ञिय, मानुष व देव बननेवाला व्यक्ति प्रशस्तेन्द्रिय होने से 'गोतम' कहलाता है। वही इस मन्त्र का ऋषि है। भावार्थ-हम यज्ञिय बनेंगे तो प्रभु हमारे लिए 'अदिति' होंगे। हम मानुष बनें प्रभु
भावार्थ
अतिथि होंगे। हम देव बनें प्रभु हमारा रक्षण करेंगे। वे जातवेद प्रभु हमें सदा सुख देते हैं। ऋषि:- लुशो धानाकः । देवता-सविता ।
मराठी (2)
भावार्थ
विद्वानांमध्ये गंभीर, बुद्धिमान, सर्व माणसांमध्ये माननीय, प्रजेचे रक्षण करणारा, राज्यकारभार करणारा, सर्व सुख देणारा, वेदादी शास्रे जाणणारा, शूर वीर असेल त्यालाच माणसांनी राजा करावे.
विषय
पुनश्च तोच विषय -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे सभापती (सेनाध्यक्ष आणि राजा दोन्ही पदें म्हणजे तीन पदें एकाच व्यक्तीची आहेत) आपण (यज्ञियानाम्) पूजनीय आणि सत्करणीय (देवानाम्) विद्वानांमधे (अदितिः) अपरिमित बुद्धीमान आहात. (विश्वेषाम्) सर्व (मनुष्याणाम्) मनुष्यांपैकी (अतिथिः) अतिथीप्रमाणे पूजनीय आहात अपण (अवः) रक्षणासाठी (आवृणानः) आवश्यक ते उपाय स्वीकारीत (सुमृडीकः) सुखदायक व सुखोपभोगक व्हा. (जातवेदाः) विदय आणि योगाभ्यासाद्वारे उत्तम बुद्धिदारक तसेच (अग्नीः) तेजस्वी राजा (भवतु) व्हा (अशी आम्हा प्रजाजनांनी कामना आहे) ॥16॥
भावार्थ
भावार्थ - सर्व मनुष्यांनी असे करावे की जो कोणी सर्व विद्वानांपैकी गंभीर बुद्धिमान असेल, सर्वांपेक्षा प्रजारक्षणाचे कौशल्य ज्याच्या ठिकाणी जास्त असेल, जो सर्वांना सुखकारक, वेदादिशास्त्र ज्ञाता असून राज्यकार्य न्यायाने करीत असेल व शूरवीर असेल, त्यालाच राज्याचा राजा करावे. ॥16॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O head of the state thou art the wisest amongst all the honourable learned persons, most adorable amongst all men, responsible for protection, gracious to all, highly renowned for thy knowledge and concentration of mind through the practice of yoga.
Meaning
Inviolable among all the devotees of yajna, guest¬ like honoured by all the humans, protective cover for the noblest divines, may Agni, brilliant ruler and master¬ mind of world knowledge, be kind and gracious to all.
Translation
The universal fire divine is the mother of all those divine powers, to whom the worship is offered. May He be dear, like a guest to all men. Receiving the offered homage, may He, knower of all that is born, be gracious to ws. (1)
Notes
Aditiḥ, mother. In legend, Aditi is the mother of gods. Also, अदीन:, superior. Also, freedom; freest of all. Avṛṇānaḥ, समर्पयन्,offering; granting. Avaḥ, रक्षणं protection. Sumṛḍikaḥ, सुखकारी, (be) gracious.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে সভাপতে! আপনি (বিশ্বেষাম্) সকল (য়জ্ঞিয়ানাম্) পূজা-সৎকারের যোগ্য (দেবানাম্) বিদ্বান্দিগের মধ্যে (অদিতিঃ) অখন্ডিত বুদ্ধিযুক্ত (বিশ্বেষাম্) সমস্ত (মানুষাণাম্) মনুষ্যদিগের মধ্যে (অতিথিঃ) পূজনীয় (অবঃ) রক্ষাদিকে (আবৃণানঃ) উত্তম প্রকার স্বীকার করিয়া (সুমৃডীকঃ) সুন্দর সুখদাতা (জাতবেদাঃ) বিদ্যা ও যোগের অভ্যাস দ্বারা প্রসিদ্ধ বুদ্ধিমন্ত (অগ্নিঃ) তেজস্বী রাজা (ভবতু) হউন ॥ ১৬ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–মনুষ্যদিগের উচিত যে, যিনি সকল বিদ্বান্দিগের মধ্যে গম্ভীর বুদ্ধিযুক্ত, সব মনুষ্যদিগের মধ্যে মাননীয়, প্রজার রক্ষাদি রাজকার্য্যকে স্বীকার করেন, সমস্ত সুখের দাতা এবং বেদাদি শাস্ত্রজ্ঞাতা শূরবীর হয়, উহাকে রাজা করিবে ॥ ১৬ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
বিশ্বে॑ষা॒মদি॑তির্য়॒জ্ঞিয়া॑নাং॒ বিশ্বে॑ষা॒মতি॑থি॒র্মানু॑ষাণাম্ ।
অ॒গ্নির্দে॒বানা॒মব॑ऽআবৃণা॒নঃ সু॑মৃডী॒কো ভ॑বতু জা॒তবে॑দাঃ ॥ ১৬ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
বিশ্বেষামিত্যস্য গোতম ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । স্বরাট্ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal