अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 2/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - नारायणः देवता - ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मप्रकाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (केन) किस करके (पुरुषस्य) मनुष्य की (पार्ष्णी) दोनों एड़ियाँ (आभृते) पुष्ट की गयीं, (केन) किस करके (मांसम्) मांस (संभृतम्) जोड़ा गया, (केन) किस करके (गुल्फौ) दोनों टकने। (केन) किस करके (पेशनीः) सुन्दर अवयवोंवाली (अङ्गुलीः) अङ्गुलियाँ, (केन) किस करके (खानि) इन्द्रियाँ, (केन) किस करके (उच्छ्लङ्खौ) दोनों उच्छ्लङ्ख [पाँव के तलवे, जोड़े गये], (कः) किस ने [भूगोल के] (मध्यतः) बीचों-बीच (प्रतिष्ठाम्) ठिकाना [पाँव रखने को, बनाया] ॥१॥

    भावार्थ -

    मन्त्र १-४ प्रश्न हैं। जिज्ञासु सदा खोजता रहे कि मनुष्य का अद्भुत शरीर, अद्भुत अङ्ग, और स्थान आदि किस अद्भुत स्वरूप ने बनाये हैं ॥१॥

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