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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 15
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी सूक्तम् - शाला सूक्त
    75

    अ॑न्त॒रा द्यां च॑ पृथि॒वीं च॒ यद्व्यच॒स्तेन॒ शालां॒ प्रति॑ गृह्णामि त इ॒माम्। यद॒न्तरि॑क्षं॒ रज॑सो वि॒मानं॒ तत्कृ॑ण्वे॒ऽहमु॒दरं॑ शेव॒धिभ्यः॑। तेन॒ शालां॒ प्रति॑ गृह्णामि॒ तस्मै॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒न्त॒रा । द्याम् । च॒ । पृ॒थि॒वीम् । च॒ । यत् । व्यच॑: । तेन॑ । शाला॑म् । प्रति॑ । गृ॒ह्णा॒मि॒ । ते॒ । इ॒माम् । यत् । अ॒न्तरि॑क्षम् । रज॑स: । वि॒ऽमान॑म् । तत् । कृ॒ण्वे॒ । अ॒हम् । उ॒दर॑म् । शे॒व॒धिऽभ्य॑: । तेन॑ । शला॑म् । प्रति॑ । गृ॒ह्णा॒मि॒ । तस्मै॑ ॥३.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अन्तरा द्यां च पृथिवीं च यद्व्यचस्तेन शालां प्रति गृह्णामि त इमाम्। यदन्तरिक्षं रजसो विमानं तत्कृण्वेऽहमुदरं शेवधिभ्यः। तेन शालां प्रति गृह्णामि तस्मै ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अन्तरा । द्याम् । च । पृथिवीम् । च । यत् । व्यच: । तेन । शालाम् । प्रति । गृह्णामि । ते । इमाम् । यत् । अन्तरिक्षम् । रजस: । विऽमानम् । तत् । कृण्वे । अहम् । उदरम् । शेवधिऽभ्य: । तेन । शलाम् । प्रति । गृह्णामि । तस्मै ॥३.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 15
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    (द्याम्) सूर्य [के प्रकाश] (च च) और (पृथिवीम् अन्तरा) पृथिवी के बीच (यत्) जो (व्यचः) खुला स्थान है, (तेन) उस [विस्तार] से (इमाम् शालाम्) इस शाला को [हे मनुष्य !] (ते) तेरे लिये (प्रति गृह्णामि) मैं ग्रहण करता हूँ। (यत्) जो (रजसः) घर का (अन्तरिक्षम्) अवकाश (विमानम्) विशेष मान परिमाण युक्त है, (तत्) उस [अवकाश] को (कृण्वे) बनाता हूँ। (तेन) उसी [कारण] से (तस्मै) [प्रयोजन] के लिये (शालाम्) शाला को (प्रति गृह्णामि) मैं ग्रहण करता हूँ ॥१५॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को विचार और परिमाण करके शाला ऐसी बनानी चाहिये, जिसमें प्रकाश और वायु का गमन-आगमन रहे और जिस के भीतर कोष आदि रखने के लिये गुप्तघर, तलघर आदि हों ॥१५॥ १५-यह और अगला मन्त्र स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥

    टिप्पणी

    १५−(अन्तरा) मध्ये (द्याम्) सूर्यप्रकाशम् (च) (पृथिवीम्) (च) (यत्) (व्यचः) विस्तारः (तेन) विस्तारेण (शालाम्) गृहम् (प्रति गृह्णामि) स्वीकरोमि (ते) तुभ्यम् (इमाम्) (यत्) (अन्तरिक्षम्) अवकाशः (रजसः) लोकस्य। गृहस्य। लोका रजांस्युच्यन्ते-निरु० ४।१९। (विमानम्) विशेषेण मानपरिमाणयुक्तम् (तत्) अन्तरिक्षम् (कृण्वे) करोमि (अहम्) गृहस्वामी (उदरम्) अ० २।३३।४। जठरमिव रक्षाधारम् (शेवधिभ्यः) अ० ६।१२३।१। निधिभ्यः। कोषेभ्यः (तेन) कारणेन (शालाम्) (प्रति गृह्णामि) (तस्मै) प्रयोजनाय ॥

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    विषय

    द्यौः, पृथिवी, अन्तरिक्ष

    पदार्थ

    १. (द्यां च पृथिवीं च अन्तरा) = धुलोक व पृथिवी लोक के बीच में (यत् व्यचः) = जो विस्तार है, (तेन) = उसी विस्तार के हेतु से (ते) = तेरे लिए (इमां शालाम्) = इस शाला को (प्रति गृह्णमि) = स्वीकार करता हूँ। इस मन्त्रभाग से यह स्पष्ट है कि निवासगृह एकमंजिला ही शोभा देता है, जिसके ऊपर आकाश है और नीचे पृथिवी है। ऐसे घर में सूर्य का प्रकाश सुविधा से पहुँचेगा। यह सूर्यप्रकाश रोगकृमियों को न पनपने देगा। २. (यत्) = जो (रजसः) = इस गृहलोक का [लोका रजांसि उच्यन्ते-नि०४।९] (अन्तरिक्षम्) = मध्यभाग (विमानम्) = विशेष मानपूर्वक निर्मित हुआ है, (तत्) = उसे (अहम्) = मैं (शेवधिभ्यः) = कोशों के लिए-धन के रक्षण के लिए (उदरं कृण्वे) = पेट के समान करता हूँ। इस गृह के मध्य में धन के रक्षण के लिए सुगुप्त स्थान है, (तेन) = उसी कारण से (तस्मै) = उस धन-रक्षण के लिए मैं शाला (प्रतिगृह्णामि) = इस गृह को स्वीकार करता हूँ।

    भावार्थ

    मकान विशेष मानपूर्वक बनाना चाहिए। इसमें सूर्य का प्रकाश और वायु सम्यक् आ सकें, अत: इसकी छत पर आकाश हो, फर्श के नीचे पृथिवी, अर्थात् सामान्यत: यह एक मंजिला ही हो। मध्य में कोश को सुरक्षित रखने के लिए एक गुप्त तलघर [उदर] हो।

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    भाषार्थ

    (द्याम् च पृथिवी च) द्युलोक और पृथिवी के (अन्तरा) अन्तराल में (यद् व्यचः) जो विस्तार है (तेन) उस विस्तार से [युक्त] (ते) तेरी (इमाम् शालाम्) इस शाला का (प्रति गृह्णामि) मैं ग्रहण करता हूं। (यद्) जो (अन्तरिक्षम्) शाला के मध्य में अन्तरिक्ष अवकाश है, जोकि (रजसः) मनोरञ्जक वस्तुजात का (विमानम्) निर्माण करता है (तत्) उसे (अहम्) मैं ग्रहीता (शेवधिभ्यः) नानाविध खजानों अर्थात् निधियों के लिये (उदरम्) उदररूप (कृण्वे) करता हूं। (तेन) इस लिये (तस्मै) उस उदरीकरण के निमित्त (शालाम् प्रति गृह्णामि) मैं शाला को स्वीकार करता हूं।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में शाला की ऊंचाई तथा लम्बाई-चौड़ाई का वर्णन, रूपकालंकार तथा कवियों द्वारा स्वीकृत प्रतिशयोक्ति के अनुसार हुआ है। शाला के छत्र को द्यौः, और आधार भूमि को पृथिवी, तथा बीच के खाली भाग को अन्तरिक्ष कहा है। तथा शाला के अन्तरिक्ष को "रजसः विमानम्" कह कर विविध प्रकार की मनोरञ्जक वस्तुजात का निर्माता कहा है। क्योंकि इस अन्तरिक्ष में ही विचर कर गृहस्थी नाना प्रकार के गृहोपयोगी वस्तुओं का निर्माण करते हैं। इस अन्तरिक्ष को "उदरं शेवधिभ्यः" कहा है। "शेवधि" का अर्थ होता है खजाना, जिसमें कि सुखदायी वस्तुएं सम्भाल कर रखी जाती हैं। चांदी-सुवर्ण के आभूषणों की निधि, अन्न की निधि, गौ, अश्व रूप निधियां आदि सब शेवधियां हैं। इन्हें सुरक्षित रूप में शाला के उदर में रखने का विधान हुआ है। जैसे माता के उदर में अनुत्पन्न शिशु सुरक्षित रहता है, वैसे ही गृह की निधियां भी शाला के उदर में रखी गयी सुरक्षित रहती हैं। ग्रहीता इन निधियों की सुरक्षा के लिये शाला को स्वीकृत करता है। रजसः= रज्जक अर्थात् मनोरञ्जक पदार्थसमूह। उदरम्= अन्तरिक्षमुतोदरम् (अथर्व० १०।७।३१)। शेवधिभ्यः= शेवम् सुखनाम (निघं० ३।६) धिः (निधिः)]।

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    विषय

    शाला, महाभवन का निर्माण और प्रतिष्ठा।

    भावार्थ

    (द्यां च) आकाश और (पृथिवीं च) पृथिवी के बीच में (यत्) जो (व्यचः) विशेष विस्तृत अवकाश है (तेन) उससे (ते) तेरे लिए हे गृहस्थ (इमाम्) इस (शालाम्) शाला को (प्रतिगृह्णामि) स्वीकार करता हूं। और (यत्) जो (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष का भाग या भीतरी का खोखला भाग (रजसः) घर का (विमानम्) विशेष परिमाण है (तम्) उसको (अहम्) मैं (शेवधिभ्यः) सुखप्रद पदार्थों और कक्षाओं के लिए या विशेष सम्पत्तियों के लिए (उदरं कृण्वे) पर्याप्तरूप में अच्छा लम्बा चौड़ा बनाऊं, (तेन) उस निमित्त से (तस्मै) उस गृहपति के लिए (शालाम्) शाला का निर्माण (प्रतिगृह्णामि) स्वीकार करता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। शाला देवता। १, ५ , ८, १४, १६, १८, २०, २२, २४ अनुष्टुभः। ६ पथ्यापंक्तिः। ७ परा उष्णिक्। १५ त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी। १७ प्रस्तारपंक्तिः। २१ आस्तारपंक्तिः। २५, ३१ त्रिपादौ प्रजापत्ये बृहत्यौ। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। २७, २८, २९ प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यः। २५, ३१ एकावसानाः एकत्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    O man, O family, O lady of the house, in heaven, on earth, and in between them the vastness and liberality that there is, with that in view, I take on this house for you. Whatever space and area of the home, well measured there is, that I would convert into a treasure- hold of the best of life’s wealth, and peace and joy of the inmates. With this hope, promise and resolution, I take over and enter this house.

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    Translation

    What space, if there between the heaven and the earth, therewith I take over this mansion-of yours. That midspace, which is the measure of the cloudy region, I make a hollow for the treasures. Therewith I take over the mansion for him (or that).

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    Translation

    O house-hold lady ! I, the master of the house take for your possession the house which is erected in the space spreading between the earth and heaven and the inner space of the house that measures out the wide, void I make the hollow to contain your treasure and wealth. Therefore I take this house for your possession.

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    Translation

    All open space that lies between the earth and heaven, therein I erect this house thy possession. The middle part of the house I erect wide like the belly to contain thy treasures. For this purpose I erect the house for his possession.

    Footnote

    Thy and his refer to the householder.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १५−(अन्तरा) मध्ये (द्याम्) सूर्यप्रकाशम् (च) (पृथिवीम्) (च) (यत्) (व्यचः) विस्तारः (तेन) विस्तारेण (शालाम्) गृहम् (प्रति गृह्णामि) स्वीकरोमि (ते) तुभ्यम् (इमाम्) (यत्) (अन्तरिक्षम्) अवकाशः (रजसः) लोकस्य। गृहस्य। लोका रजांस्युच्यन्ते-निरु० ४।१९। (विमानम्) विशेषेण मानपरिमाणयुक्तम् (तत्) अन्तरिक्षम् (कृण्वे) करोमि (अहम्) गृहस्वामी (उदरम्) अ० २।३३।४। जठरमिव रक्षाधारम् (शेवधिभ्यः) अ० ६।१२३।१। निधिभ्यः। कोषेभ्यः (तेन) कारणेन (शालाम्) (प्रति गृह्णामि) (तस्मै) प्रयोजनाय ॥

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