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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 6
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - शाला सूक्त
    34

    यानि॑ ते॒ऽन्तः शि॒क्यान्याबे॒धू र॒ण्या॑य॒ कम्। प्र ते॒ तानि॑ चृतामसि शि॒वा मा॑नस्य पत्नी न॒ उद्धि॑ता त॒न्वे भव ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यानि॑ । ते॒ । अ॒न्त: । शि॒क्या᳡नि । आ॒ऽबे॒धु: । र॒ण्या᳡य । कम् । प्र । ते॒ । तानि॑ । चृ॒ता॒म॒सि॒ । शि॒वा । मा॒न॒स्य॒ । प॒त्नि॒ । न॒: । उध्दि॑ता । त॒न्वे᳡ । भ॒व॒ ॥३.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यानि तेऽन्तः शिक्यान्याबेधू रण्याय कम्। प्र ते तानि चृतामसि शिवा मानस्य पत्नी न उद्धिता तन्वे भव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यानि । ते । अन्त: । शिक्यानि । आऽबेधु: । रण्याय । कम् । प्र । ते । तानि । चृतामसि । शिवा । मानस्य । पत्नि । न: । उध्दिता । तन्वे । भव ॥३.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    (ते अन्तः) तेरे भीतर (यानि) जिन (शिक्यानि) छींकों को (कम्) सुख से (रण्याय) रमणीय वा सांग्रामिक कर्म के लिये (आबेधुः) उन [शिल्पियों] ने भली-भाँति बाँधा है। (ते) तेरे लिये (तानि) उन सबको (प्र चृतामसि) हम भली-भाँति दृढ़ करते हैं, (मानस्य) सन्मान की (पत्नी) रक्षा करनेवाली तू (नः) हमारे (तन्वे) उपकार के लिये (शिवा) कल्याणी और (उद्धिता) ऊँची उठी हुई (भव) हो ॥६॥

    भावार्थ

    मनुष्य विज्ञानवृद्धि, मन बहलाव और युद्ध आदि के लिये कलायन्त्र आदिकों के लटकाने के लिये सुखदायक ऊँचे घर बनावें ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(यानि) (ते) तव (अन्तः) मध्ये (शिक्यानि) स्रंसेः शिः कुट् किच्च। उ० ५।१६। स्रंसु अधःपतने-यत्, कित्, कुट् च, धातोः शिः। द्रव्यरक्षार्थरज्जुमयाधारविशेषान्। काचान् (आबेधुः) बध बन्धने। समन्तात् संयोजितवन्तः (रण्याय) रमु उपरमे-यत्, मस्य णः, यद्वा, रण शब्दे-यत् रण्या.... रण्यौ रमणीयौ सांग्राम्यौ वा-निरु० ६।३३। रमणीयाय साङ्ग्रामिकाय वा कर्मणे (प्र) प्रकर्षेण (ते) तुभ्यम् (तानि) शिक्यानि (चृतामसि) बध्नीमः (शिवा) कल्याणी (मानस्य) सत्कारस्य (पत्नी) रक्षिका (नः) अस्माकम् (उद्धिता) धि धारणे-क्त। उद्धृता। उच्छ्रिता (तन्वे) उपकृतये (भव) ॥

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    विषय

    'शिक्यों से आबद्ध सुन्दर' शाला

    पदार्थ

    १. हे शाले! (यानि शिक्यानि) = जिन छीको को [A loop or swing made of rope] (कम्) = सुख से (रण्याय) = रमणीयता के लिए (ते अन्त: आबेधु:) = शिल्पियों ने तेरे अन्दर बाँधा है, (ते तानि) = तेरे उन छींकों को (प्रचृतामसि) = प्रकर्षेण दृढ़ करते हैं। २. तू (शिवा) = कल्याणकर हो, (मानस्य पत्नी) = हमारे सम्मान का रक्षण करनेवाली हो। (न: तन्वे) = हमारे शक्ति-विस्तार के लिए, (उत् हिता भव) = ऊपर स्थापित हुई-हुई हो अथवा उत्कृष्ट हित करनेवाली हो।

    भावार्थ

    हमारा घर कार्यार्थ बँधे हुए छौंकों से सुन्दर प्रतीत हो। यह घर कल्याणकर व सम्मानप्रद तथा हमारे शरीरों के स्वास्थ्य के लिए हितकर हो।

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    भाषार्थ

    (रण्याय) रमणीयता के लिये (ते अन्तः) तेरे अन्दर (यानि शिक्यानि) जो छिक्के (आवेधुः) उन्होंने बान्धे हैं, (तानि) उन (ते) तेरे छिक्कों को (प्र चृतामसि) हम सुदृढ़ ग्रथित करते हैं, (मानस्य पत्नि) हे मान की रक्षा करने वाली शाला ! (उद्धिता त्वम्) ऊंची निर्मित हुई तू (नः तन्वे) हमारे शरीरों के लिये (शिवा भव) कल्याणकारिणी हो।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    Those chandeliers, swings and hammocks which have been suspended in the house from the ceiling for beauty, pleasure and comfort, we firmly fix. May the beautiful home of honour and protection, raised high, be auspicious for the health of our body and mind.

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    Translation

    What hanging baskets (antah Sikya) they have tied within you for beauty and enjoyment, on them we put lights. O queen of buildings (manasya pamya), erected high, may you be propitious for our bodies.

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    Translation

    He loose those loops which the men have bound within this house for making it beautiful and comfortable. Let this well-established outline of measurements be auspicious for our bodies and let it stand raised.

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    Translation

    We strengthen the loops which artisans have bound within thee for beauty and comfort. O house, the preserver of our honor, be gracious to our bodies, with thy majestic height.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(यानि) (ते) तव (अन्तः) मध्ये (शिक्यानि) स्रंसेः शिः कुट् किच्च। उ० ५।१६। स्रंसु अधःपतने-यत्, कित्, कुट् च, धातोः शिः। द्रव्यरक्षार्थरज्जुमयाधारविशेषान्। काचान् (आबेधुः) बध बन्धने। समन्तात् संयोजितवन्तः (रण्याय) रमु उपरमे-यत्, मस्य णः, यद्वा, रण शब्दे-यत् रण्या.... रण्यौ रमणीयौ सांग्राम्यौ वा-निरु० ६।३३। रमणीयाय साङ्ग्रामिकाय वा कर्मणे (प्र) प्रकर्षेण (ते) तुभ्यम् (तानि) शिक्यानि (चृतामसि) बध्नीमः (शिवा) कल्याणी (मानस्य) सत्कारस्य (पत्नी) रक्षिका (नः) अस्माकम् (उद्धिता) धि धारणे-क्त। उद्धृता। उच्छ्रिता (तन्वे) उपकृतये (भव) ॥

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