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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 25
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - एकावसाना त्रिपदा प्राजापत्या बृहती सूक्तम् - शाला सूक्त
    71

    प्राच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑ दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्राच्या॑: । दि॒श: । शाला॑या: । नम॑: । म॒हि॒म्ने । स्वाहा॑ । दे॒वेभ्य॑: । स्वा॒ह्ये᳡भ्य: ॥३.२५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्राच्या दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्राच्या: । दिश: । शालाया: । नम: । महिम्ने । स्वाहा । देवेभ्य: । स्वाह्येभ्य: ॥३.२५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 25
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    (प्राच्याः दिशः) पूर्व दिशा से (शालायाः) शाला की (महिम्ने) महिमा के लिये (नमः) अन्न हो, (स्वाह्येभ्यः) सुवाणी के योग्य (देवेभ्यः) कमनीय विद्वानों के लिये (स्वाहा) सुवाणी [वेदवाणी] हो ॥२५॥ मन्त्र २५ से ३१ तक स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में आये हैं ॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि पूर्वादि सब दिशाओं से पुष्कल अन्न आदि पदार्थ संग्रह करके शाला में रक्खें, जिस में विद्वान् लोग वेदों का विचार करते रहें ॥२५-३१॥

    टिप्पणी

    २५−(प्राच्याः) अ० ३।२६।१। पूर्वाया सकाशात् (दिशः) दिशायाः (शालायाः) गृहस्य (नमः) अन्नम्-निघ० २।७। (महिम्ने) महत्त्वाय (स्वाहा) अ० २।१६।१। सुवाणी। वेदवाणी (देवेभ्यः) कमनीयेभ्यो विद्वद्भ्यः (स्वाह्येभ्यः) तदर्हति। पा० ५।१।६३। स्वाहा-यत्। सुवाणीयोगेभ्यः ॥

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    विषय

    प्रभु-नमन-देववन्दन

    पदार्थ

    १. (शालाया:) = इस शाला की (प्राच्याः दिश:) = पूर्व दिशा से (महिने नमः) = उस प्रभु की महिमा के लिए हम नतमस्तक हों और साथ ही (स्वाहोभ्य:) = [सु आह] उत्तम शब्द बोलने योग्य-प्रशस्य (देवेभ्यः) = देववृत्ति के विद्वान् पुरुषों के लिए (स्वाहा) = हम प्रशस्त शब्दों को कहें विद्वानों का समुचित आदर करें। २. इसी प्रकार (शालाया:) = शाला की दक्षिण दिशा से, (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा से (उदिच्याः दिश:) = उत्तर दिशा (ध्रुवायाः दिश:) =  ध्रुव [नीचे की] दिशा से (ऊर्ध्वाया: दिश:) = ऊर्ध्वा दिक् से तथा (दिश:दिशः) = सब दिशाओं-प्रदिशाओं से हम उस प्रभु की महिमा के लिए नतमस्तक हों और प्रशंसनीय देवों के लिए प्रशंसा के शब्दों को कहें।

    भावार्थ

    हमारे घरों में सर्वत्र प्रभु की महिमा के प्रति नमन हो तथा वन्दनीय विद्वानों का उचित समादर हो।

    विशेष

    विशेष-घर में ब्रह्म की महिमा के प्रति सदा नतमस्तक होता हुआ तथा देववन्दन करता हुआ यह उन्नत होता हुआ 'ब्रह्मा' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है। यह ऋषभ नाम से प्रभु-स्तवन करता है

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    भाषार्थ

    (प्राच्याः दिशः) पूर्व दिशा से, (शालायाः महिम्ने) शाला के महत्त्व या महिमा के लिये (नमः) हम अन्नाहुतियां देते हैं, (स्वार्ह्यभ्यः) अर्थात् स्वाहा योग्य (देवेभ्यः) देवों के प्रति, (स्वाहा) स्वाहा पद के उच्चारण पूर्वक, अन्नाहुतियां देते हैं।

    टिप्पणी

    [शाला ग्रहण करने वाला जब शाला में प्रवेश करता है तब शाला प्रवेश संस्कार के अनुसार, यज्ञ करता है, और ग्रहीता के सम्बन्धी१ अग्नि में [अन्नाहुतियां देते हैं। "नम अन्ननाम (निघं० २।७)"] [१. "भरामसि" (२४) द्वारा सूचित।]

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    विषय

    शाला, महाभवन का निर्माण और प्रतिष्ठा।

    भावार्थ

    शाला के भीतर प्रवेश करके गृहपति प्रत्येक दिशा से परमात्मा और देवों की अर्चना किया करे। (शालायाः) शाला के (प्राच्याः दिशः) प्राची, पूर्वाभिमुख दिशा से (महिम्ने नमः) उस महामहिम परमात्मा का शुभ गुणानुवाद करें, और (स्वाह्येभ्यः) उत्तम रीति से स्तुति अर्चा करने योग्य (देवेभ्यः) देव, विद्वान् पुरुषों का भी हम गुणानुवाद और आदर सत्कार करें। इसी प्रकार (दक्षिणायाः) दक्षिण, (प्रतीच्याः) पश्चिम, (उदीच्याः) उत्तर, (ध्रुवायाः) ध्रुवा अर्थात् नीचे की और (ऊर्ध्वायाः) ऊपर की (दिशः) दिशाओं से भी हम परमात्मा को नमस्कार और पूज्य विद्वान् पुरुषों की पूजा सत्कार करें। इसी प्रकार (दिशः दिशः) शाला की सब दिशाओं से (नमो महिम्ने देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः स्वाहा) परमेश्वर और पूजनीय विद्वानों की पूजा हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। शाला देवता। १, ५ , ८, १४, १६, १८, २०, २२, २४ अनुष्टुभः। ६ पथ्यापंक्तिः। ७ परा उष्णिक्। १५ त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी। १७ प्रस्तारपंक्तिः। २१ आस्तारपंक्तिः। २५, ३१ त्रिपादौ प्रजापत्ये बृहत्यौ। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। २७, २८, २९ प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यः। २५, ३१ एकावसानाः एकत्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    Homage and oblation to the beauty and grandeur of the east direction of the home. Homage to the divinities of nature and brillianties of humanity. To all these divinities and nobilities, honour, adoration and oblation in truth of word and faith.

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    Translation

    From the eastern sides, let our homage be to the grandeur of the mansion. Svaha to the enlightened ones, to whom Svaha is due.

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    Translation

    May from the east side of the house we attain grandeur. Whatever is uttered herein is true. Let this house be the resort of the learned scholars performing yajna and propagating the knowledge of the Vedic speeches.

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    Translation

    Now from the east side of the house to the Almighty God be homage paid. Reverence to the learned whom reverence is due.

    Footnote

    (25-31) These verses have been translated by Swami dayanand in the Sanskarvidhi in the Grihastha Ashram Chapter.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २५−(प्राच्याः) अ० ३।२६।१। पूर्वाया सकाशात् (दिशः) दिशायाः (शालायाः) गृहस्य (नमः) अन्नम्-निघ० २।७। (महिम्ने) महत्त्वाय (स्वाहा) अ० २।१६।१। सुवाणी। वेदवाणी (देवेभ्यः) कमनीयेभ्यो विद्वद्भ्यः (स्वाह्येभ्यः) तदर्हति। पा० ५।१।६३। स्वाहा-यत्। सुवाणीयोगेभ्यः ॥

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