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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 20
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शाला सूक्त
    68

    कु॒लायेऽधि॑ कु॒लायं॒ कोशे॒ कोशः॒ समु॑ब्जितः। तत्र॒ मर्तो॒ वि जा॑यते॒ यस्मा॒द्विश्वं॑ प्र॒जाय॑ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कु॒लाये॑ । अधि॑ । कु॒लाय॑म् । कोशे॑ । कोश॑: । सम्ऽउ॑ब्जित: । तत्र॑ । मर्त॑: । वि । जा॒य॒ते॒ । यस्मा॑त् । विश्व॑म् । प्र॒ऽजाय॑ते ॥३.२०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कुलायेऽधि कुलायं कोशे कोशः समुब्जितः। तत्र मर्तो वि जायते यस्माद्विश्वं प्रजायते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कुलाये । अधि । कुलायम् । कोशे । कोश: । सम्ऽउब्जित: । तत्र । मर्त: । वि । जायते । यस्मात् । विश्वम् । प्रऽजायते ॥३.२०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 20
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    [जैसे] (कुलाये अधि) घोंसले पर (कुलायम्) घोंसला और (कोशे) कोश [निधि] पर (कोशः) कोश [धनसंचय] (समुब्जितः) यथावत् दबा होता है, [वैसे ही] (तत्र) वहाँ [शाला में] (मर्तः) मनुष्य (वि जायते) विविध प्रकार प्रकट होता है, (यस्मात्) जिस [कारण] से (विश्वम्) सब [सन्तानसमूह] (प्रजायते) उत्तमता से उत्पन्न होता है ॥२०॥

    भावार्थ

    जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसलों में और अनेक धन धनों के द्वारा बढ़ते हैं, वैसे ही मनुष्य सुखप्रद घर में नीरोग रहकर उत्तम सन्तानों से उन्नति करते हैं ॥२०॥

    टिप्पणी

    २०−(कुलाये) नीडे (अधि) (कुलायम्) कुलानां पक्षिसमूहानामयो वासस्थानम् (कोशे) धनसंचये (कोशः) निधिः (समुब्जितः) संवृतः (तत्र) शालायाम् (मर्तः) मनुष्यः (वि) विविधम् (जायते) प्रादुर्भवति (यस्मात्) कारणात् (विश्वम्) सर्वमपत्यजातम् (प्रजायते) प्रकर्षेणोत्पद्यते ॥

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    विषय

    विश्व प्रजनन

    पदार्थ

    १. 'कुलम् अयते अत्र' इस व्युत्पत्ति से कुलाय शब्द 'एक परिवार के रहने के स्थान' का वाचक है। (कुलाये अधि) = एक कुलाय पर (कुलायम्) = कुलाय तथा (कोशे) = एक कोश पर (कोश:) = दूसरा कोश (समुजित:) = सम्यक् आवृत्त हुआ-हुआ है। एक बड़े परिवार में एक भाई नीचे के मकान में रहता है तो दूसरा ऊपर रह रहा है। २. (तत्र) = वहाँ (मर्त:) = मनुष्य (विजायते) = विशिष्टरूप से अपनी शक्तियों का प्रादुर्भाव करता है, (यस्मात् विश्वं प्रजायते) = जिससे कोई भी सन्तान असर्वाङ्ग [अ-विश्व, विकलांग] उत्पन्न नहीं होती-सब सन्तान सर्वाङ्ग ही होती हैं।

    भावार्थ

    एक बड़े परिवार में एक भाई नीचे के गृह में रहता है तो दूसरा ऊपर के। सब मिलकर प्रेम से अपनी शक्तियों का विस्तार करते हैं, परिणामतः इनकी सब सन्ताने सर्वाङ्ग ही होती हैं।

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    भाषार्थ

    (कुलायेऽधि) जैसे घोंसले पर (कुलायाम्) घोंसला, वैसे (कोशे) कोश पर (कोशः) कोश (समुब्जितः) रखा गया है। (तत्र) उस बीच के कोश में (मर्तः) मरणधर्मा मनुष्य (वि जायताम्) विशेषतया जन्म ग्रहण करे, (यस्मात्) जिस जन्म ग्रहण किये मनुष्य से (विश्वम्) मानो एक नया संसार (प्रजायते) सन्तानुसन्तान रूप में अर्थात् वंश परम्परारूप में पैदा होता है।

    टिप्पणी

    [कमरे के मध्य में निर्मित कमरे को कोश कहा है। कोश अर्थात् खजाने की सुरक्षा में लिये कमरे से कमरा चाहिये। इस प्रकार कमरे के भीतर का कमरा सम्भवतः मानुष प्रसूति के लिये प्रसूतिगृह हो। मन्त्र २९ के अनुसार इस प्रसूतिगृह में गार्हपत्य-अग्नि तथा विद्युत् होनी चाहिये, और औषधि-गृह भी।]

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    विषय

    शाला, महाभवन का निर्माण और प्रतिष्ठा।

    भावार्थ

    (कुलाये अधि कुलायम्) घोंसले पर घोसला अथवा (कोशे कोशः समुब्जितः) कोश पर कोश जिस प्रकार चढ़ाया जाता है इसी प्रकार की यह शाला बनाई जाय, अर्थात् बीच में कमरा, इसके बाहिर इसे घेरने वाले कमरें, इस प्रकार इस शाला में नाना कमरे होने चाहियें। (तत्र मर्त्तः विजायते) वहां प्राणधारी जीवों के मरणधर्मा शरीर नाना प्रकार से प्रकट होते हैं, (यस्मात् विश्वम् प्रजायते) जिन द्वारा कि समस्त संसार प्रजा रूप समझा जाता है। अर्थात् तू प्रत्येक गृहस्थी गृहस्थाश्रम में रहता हुआ समग्र संसार को अपनी सन्तानवत् जान कर उसकी रक्षा करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। शाला देवता। १, ५ , ८, १४, १६, १८, २०, २२, २४ अनुष्टुभः। ६ पथ्यापंक्तिः। ७ परा उष्णिक्। १५ त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी। १७ प्रस्तारपंक्तिः। २१ आस्तारपंक्तिः। २५, ३१ त्रिपादौ प्रजापत्ये बृहत्यौ। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। २७, २८, २९ प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यः। २५, ३१ एकावसानाः एकत्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    As one storey of the house is added to another, as one layer of integument is laid upon another, as one treasure is added upon another, thus things grow on in a simple progressive order line to maturity and progress higher and higher, so in that very process of evolution mortal man emerges and from that very process the entire world evolves from one generation to another.

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    Translation

    A nest upon a nest (kuldyedhi kulayam) is place; a treasure upon treasure (kose kosah) is laid. There the mortal is procreated, from whom all others spring out.

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    Translation

    This house is built up as the nest rests on the-nest and the compartment on the compartment. In this the men propagates his kind and thus everything is born.

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    Translation

    In the nest of the house, lies the nest of the body. In the sheaf of the body, lies the embryo in the womb. There mortal man shall propagate Ms kind, and there shall everything be born.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २०−(कुलाये) नीडे (अधि) (कुलायम्) कुलानां पक्षिसमूहानामयो वासस्थानम् (कोशे) धनसंचये (कोशः) निधिः (समुब्जितः) संवृतः (तत्र) शालायाम् (मर्तः) मनुष्यः (वि) विविधम् (जायते) प्रादुर्भवति (यस्मात्) कारणात् (विश्वम्) सर्वमपत्यजातम् (प्रजायते) प्रकर्षेणोत्पद्यते ॥

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