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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 22
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शाला सूक्त
    78

    प्र॒तीचीं॑ त्वा प्रती॒चीनः॒ शाले॒ प्रैम्यहिं॑सतीम्। अ॒ग्निर्ह्यन्तराप॑श्च॒र्तस्य॑ प्रथ॒मा द्वाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒तीची॑म् । त्वा॒ । प्र॒ती॒चीन॑: । शाले॑ । प्र । ए॒मि॒ । अहिं॑सतीम् । अ॒ग्नि: । हि । अ॒न्त: । आप॑: । च॒ । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒थ॒मा । द्वा: ॥३.२२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रतीचीं त्वा प्रतीचीनः शाले प्रैम्यहिंसतीम्। अग्निर्ह्यन्तरापश्चर्तस्य प्रथमा द्वाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रतीचीम् । त्वा । प्रतीचीन: । शाले । प्र । एमि । अहिंसतीम् । अग्नि: । हि । अन्त: । आप: । च । ऋतस्य । प्रथमा । द्वा: ॥३.२२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 22
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    (शाले) हे शाला ! (प्रतीचीनः) [तेरे] सन्मुख चलता हुआ मैं (प्रतीचीम्) [मेरे] सन्मुख होती हुई, (अहिंसतीम्) न पीड़ा देती हुई (त्वा) तुझको (प्र एमि) अच्छे प्रकार प्राप्त होता हूँ। (हि) निश्चय करके (अन्तः) [तेरे] भीतर (अग्निः) अग्नि [का घर] और (आपः) जल [का स्थान] (च) और (ऋतस्य) सत्य [के ध्यान] का (प्रथमा) पहिला (द्वाः) द्वार है ॥२२॥

    भावार्थ

    जिस शाला में शिल्प आदि यज्ञों के लिये कार्यालय और सत्य-असत्य विचारने के लिये वेदपठन-स्थान होता है, वहाँ मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक आते-जाते हैं ॥२२॥

    टिप्पणी

    २२−(प्रतीचीम्) अ० १।२८।२। प्रत्यक्षं गच्छन्तीम् (त्वा) शालाम् (प्रतीचीनः) अ० ४।३२।६। प्रत्यक्षं गच्छन् (अहिंसतीम्) अपीडयन्तीम् (अग्निः) अग्निस्थानम् (हि) निश्चयेन (अन्तः) मध्ये (आपः) जलस्थानम् (च) (ऋतस्य) सत्यस्य। वेदस्य (प्रथमा) मुख्या (द्वाः) द्वृ संवरणे-णिच्-विच्। द्वारम् ॥

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    विषय

    अग्नि: आपः

    पदार्थ

    १. हे (शाले) = गृह ! (प्रतीचीम्) = मेरे सम्मुख स्थित हुई-हुई (अहिंसतीम्) = किसी भी प्रकार से हिंसन न करती हुई (त्वा) = तेरे प्रति (प्रतीचीन:) = मुख किये हुए आता हुआ (प्र एमि) = तुझे प्राप्त होता हूँ। (अन्तः हि) = तेरे अन्दर निश्चय से (अग्नि: आपः च) = अग्नि और जल-दोनों ही तत्त्व विद्यमान हैं जोकि (ऋतस्य) = यज्ञ के (प्रथमा द्वा:) = मुख्य द्वार हैं। प्रत्येक यज्ञ की सिद्धि के लिए 'अग्नि और जल' आवश्यक है।

    भावार्थ

    हम अनुकूल परिस्थितिवाले घरों को प्राप्त हों। इन घरों में रोगादि से किसी भी प्रकार हमारा हिंसन न हो। घरों में 'अग्नि और जल' दोनों तत्त्व सुलभ हों, क्योंकि इन्हीं के द्वारा सब यज्ञ सिद्ध होंगे।

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    भाषार्थ

    (अहिंसतिम्) हिंसा न करने वाली [अर्थात् रक्षा करने वाली], (प्रतीचीम्) मेरी ओर मुखवाली (शाले) हे शाला ! (त्वा प्रतीचीनः) तेरी ओर मुखवाला (प्रैमि) मैं जाता हूं। (अग्निः आपः च) अग्नि और जल (ऋतस्य) यज्ञ के (प्रथमा=प्रथमौ) दो मुख्य (द्वाः) द्वार है, साधन हैं [उन्हें] (अन्तः) तेरे भीतर (प्रभरामि) मैं लाता हूं। (इमाः आपः) ये जल (अयक्ष्माः) यक्ष्मरोग रहित हैं, (यक्ष्मनाशनीः) और यक्ष्म रोग का नाश करते हैं। तथा (अमृतेन) अमृत (अग्निना सह) अग्नि के साथ (गृहान्) घरों में (उप सीदामि) उपस्थित होता हूं, तथा (प्रसीदामि) प्रसन्न होता हूं।

    टिप्पणी

    [अग्नि और जल गृहस्थ-यज्ञ के दो मुख्य साधन हैं। जल ऐसे स्थान से लाने चाहिये जहां यक्ष्म रोग न हो। जल चिकित्सा यक्ष्म रोग का नाश करती है। घरों में अग्निहोत्र आदि करते रहना चाहिये। यज्ञाग्नि अमृतव का अर्थात् शीघ्र न मरने का साधन है। इस से घर में प्रसन्नता बढ़ती है। घर से बाहिर जब जाय तो घर की ओर पीठ करता हुआ न जाय।

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    विषय

    शाला, महाभवन का निर्माण और प्रतिष्ठा।

    भावार्थ

    हे (शाले) शाले ! (प्रतीचीं) अपने समक्ष खड़ी हुई (अहिंसतीम्) किसी प्रकार का कष्ट न देती हुई. सुखकारिणी (त्वा) तेरे प्रति (प्रतीचीनः) प्रतीचीन, तेरे अभिमुख होकर (प्रैमि) आता हूं। और (अत्र) इसके भीतर (अग्निः) आग और (आपः) जल ही (ऋतस्य) जीवन के (प्रथमा) उत्तम (द्वाः) द्वार हैं। अथवा (अन्तः) भीतर (अग्निः) ज्ञानवान् विद्वान् और (आपः) आप्त पुरुष रहें। वे ही (ऋतस्य) सत्यज्ञान के (द्वाः) द्वार हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। शाला देवता। १, ५ , ८, १४, १६, १८, २०, २२, २४ अनुष्टुभः। ६ पथ्यापंक्तिः। ७ परा उष्णिक्। १५ त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी। १७ प्रस्तारपंक्तिः। २१ आस्तारपंक्तिः। २५, ३१ त्रिपादौ प्रजापत्ये बृहत्यौ। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। २७, २८, २९ प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यः। २५, ३१ एकावसानाः एकत्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    Home, sweet home of honour and prestige, protective and not violative in any way, facing you I come and enter straight through the front door. Fire and water therein are the first door to the yajna of truth and rectitude.

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    Translation

    O mansion, turned towards me, I, turned towards you, approach you; unharming. Within you is the fire and the waters, the main door of the sacrifice.

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    Translation

    I come to this comfortable house which stands in my front keeping it face to face. The fire of yajna and water are always within it. This is the first door of yajna or social and moral order.

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    Translation

    O house, standing in the west, afforder of comfort, I come unto thee with my face towards the west. Within thee are fire and water, the main doors of life.

    Footnote

    The verse may also mean; within thee reside learned persons, and men who have renounced worldly desires and attachments, the main sources of knowledge.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २२−(प्रतीचीम्) अ० १।२८।२। प्रत्यक्षं गच्छन्तीम् (त्वा) शालाम् (प्रतीचीनः) अ० ४।३२।६। प्रत्यक्षं गच्छन् (अहिंसतीम्) अपीडयन्तीम् (अग्निः) अग्निस्थानम् (हि) निश्चयेन (अन्तः) मध्ये (आपः) जलस्थानम् (च) (ऋतस्य) सत्यस्य। वेदस्य (प्रथमा) मुख्या (द्वाः) द्वृ संवरणे-णिच्-विच्। द्वारम् ॥

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