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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 56/ मन्त्र 18
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - मरुतः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आ वो॒ होता॑ जोहवीति स॒त्तः स॒त्राचीं॑ रा॒तिं म॑रुतो गृणा॒नः। य ईव॑तो वृषणो॒ अस्ति॑ गो॒पाः सो अद्व॑यावी हवते व उ॒क्थैः ॥१८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । वः॒ । होता॑ । जो॒ह॒वी॒ति॒ । स॒त्तः । स॒त्राची॑ । रा॒तिम् । म॒रु॒तः॒ । गृ॒णा॒नः । यः । ईव॑तः । वृ॒ष॒णः॒ । अस्ति॑ । गो॒पाः । सः । अद्व॑यावी । ह॒व॒ते॒ । वः॒ । उ॒क्थैः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ वो होता जोहवीति सत्तः सत्राचीं रातिं मरुतो गृणानः। य ईवतो वृषणो अस्ति गोपाः सो अद्वयावी हवते व उक्थैः ॥१८॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। वः। होता। जोहवीति। सत्तः। सत्राची। रातिम्। मरुतः। गृणानः। यः। ईवतः। वृषणः। अस्ति। गोपाः। सः। अद्वयावी। हवते। वः। उक्थैः ॥१८॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 56; मन्त्र » 18
    अष्टक » 5; अध्याय » 4; वर्ग » 25; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्ते कीदृशा भवेयुरित्याह ॥

    अन्वयः

    हे मरुतो ! यो गृणानः सत्तोऽद्वयावी होता ईवतो वृषणो वो युष्माना जोहवीति सत्राची रातिं ददाति गोपा अस्ति उक्थैर्वो हवते स उत्तमोऽस्तीति विजानीत ॥१८॥

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (वः) युष्मान् (होता) दाता (जोहवीति) भृशमाह्वयति (सत्तः) निषण्णः (सत्राचीम्) या सत्रा सत्यमञ्चति प्रापयति ताम् (रातिम्) दानम् (मरुतः) वायव इव मनुष्याः (गृणानः) स्तुवन् (यः) (ईवतः) गच्छतः (वृषणः) वृष्टिकरस्य (अस्ति) (गोपाः) रक्षकः (सः) (अद्वयावी) छलकपटादिरहितः (हवते) आह्वयति (वः) युष्मान् (उक्थैः) वक्तुमर्हैः वचनैः ॥१८॥

    भावार्थः

    यो राजादिर्जनो भयदाता सर्वस्य रक्षकः मायादिदोषरहितः सत्यविद्याप्रदाता सत्यग्राहकोऽस्ति स एवात्र प्रशंसितो वर्त्तते तमेवोत्तमं मनुष्या विजानन्तु ॥१८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वे राजजन कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (मरुतः) पवनों के तुल्य मनुष्यो ! (यः) जो (गृणानः) स्तुति करता (सत्तः) बैठा हुआ (अद्वयावी) छल-कपट आदि से रहित (होता) देनेवाला (ईवतः) जाते हुए (वृषणः) वर्षा करनेवाले के सम्बन्ध में (वः) तुम लोगों को (आ, जोहवीति) निरन्तर बुलाता (सत्राचीम्) जो सत्य को देती है उस (रातिम्) दान को देता और (गोपाः) रक्षा करनेवाला (अस्ति) है तथा (उक्थैः) कहने योग्य वचनों से (वः) तुम लोगों को (हवते) बुलाता है, वह उत्तम है, इस को जानो ॥१८॥

    भावार्थ

    जो राजा आदि जन अभय देने और सब की रक्षा करनेवाला, छलकपट आदि दोषरहित, सत्यविद्या दाता और सत्यग्राहक है, वही यहाँ प्रशंसित वर्त्तमान है, उसी को मनुष्य उत्तम जानें ॥१८॥

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    विषय

    वीरों विद्वानों के वायुओं के तुल्य कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे ( मरुतः ) वीरो ! विद्वान् पुरुषो ! (होता) उत्तम दाता, ( गृणान: ) उपदेश करने हारा ( सत्तः ) उत्तमासन पर विराज कर ( सत्राचीं ) सत्य से युक्त वा एक साथ मिलकर प्राप्त करने योग्य (दातिं) दान, ज्ञान वा ऐश्वर्य को ( जोहवीति ) प्रदान करता है और जो (ईवतः) जल से युक्त ( वृषणः गोपाः ) मेघ के रक्षक वायु के समान ( ईवतः ) धनशाली, (वृषणः ) बलवान् पुरुष का ( गोपाः ) रक्षक है ( सः ) वह (अद्वयावी) भीतर बाहर दो भाव न करता हुआ, निष्कपट होकर (उक्थैः) उत्तम वचनों से ( वः ) आप लोगों के प्रति ( हवते ) ज्ञान प्रदान करे और आप लोगों को आदर से बुलावे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः ।। मरुतो देवताः ॥ छन्दः -१ आर्ची गायत्री । २, ६, ७,९ भुरिगार्ची गायत्रीं । ३, ४, ५ प्राजापत्या बृहती । ८, १० आर्च्युष्णिक् । ११ निचृदार्च्युष्णिक् १२, १३, १५, १८, १९, २१ निचृत्त्रिष्टुप् । १७, २० त्रिष्टुप् । २२, २३, २५ विराट् त्रिष्टुप् । २४ पंक्तिः । १४, १६ स्वराट् पंक्तिः ॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    सुपात्र को दान

    पदार्थ

    पदार्थ - हे (मरुतः) = वीरो ! विद्वान् पुरुषो! (होता) = उत्तम दाता, (गृणानः) = उपदेश करने (हारा सत्तः) = उत्तमासन पर बैठकर (सत्राचीं) = सत्य से युक्त (दातिं) = दान, ज्ञान वा ऐश्वर्य को (जोहवीति) = देता है और जो (ईवतः) = जल-युक्त (वृषणः गोपा:) = मेघ के तुल्य रक्षक (ईवतः) = धनशाली, (वृषण:) = बलवान् (गोपाः) = रक्षक है (सः) = यह (अद्वयावी) = भीतर - बाहर दो-भाव न करता हुआ, निष्कपष्ट होकर (उक्थैः) = उत्तम वचनों से (वः) = आपको हवते ज्ञान दे, वा आदर से बुलावे ।

    भावार्थ

    भावार्थ- उत्तम दानशील पुरुष सुपात्र को ही दान देवे। जो विद्वान् उपदेशक हैं, जो राष्ट्र रक्षक बलवान् हैं वे दान के पात्र हैं। विद्या का दान भी निष्कपट, मधुरभाषी, विनयी जिज्ञासु को देवें ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो राजा अभयदाता, सर्वांचा रक्षक, छळ-कपट द्वेषरहित, सत्य विद्येचा दाता, सत्याचा ग्राहक असतो तो प्रशंसित असतो. त्यालाच उत्तम मनुष्य समजावे. ॥ १८ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The yajaka settled on the vedi invokes you, O Maruts, praising and praying for your blissful generosity which is the harbinger of truth and life of real value. He is the protector of the dynamic and the generous. He is free from double dealing and he invokes and celebrates you with the right works of truth and sincerity.

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