ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 56/ मन्त्र 22
सं यद्धन॑न्त म॒न्युभि॒र्जना॑सः॒ शूरा॑ य॒ह्वीष्वोष॑धीषु वि॒क्षु। अध॑ स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रा॒तारो॑ भूत॒ पृत॑नास्व॒र्यः ॥२२॥
स्वर सहित पद पाठसम् । यत् । हन॑न्त । म॒न्युऽभिः॑ । जना॑सः । शूराः॑ । य॒ह्वीषु॑ । ओष॑धीषु । वि॒क्षु । अध॑ । स्म॒ । नः॒ । म॒रु॒तः॒ । रु॒द्रि॒या॒सः॒ । त्रा॒तारः॑ । भू॒त॒ । पृत॑नासु । अ॒र्यः ॥
स्वर रहित मन्त्र
सं यद्धनन्त मन्युभिर्जनासः शूरा यह्वीष्वोषधीषु विक्षु। अध स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रातारो भूत पृतनास्वर्यः ॥२२॥
स्वर रहित पद पाठसम्। यत्। हनन्त। मन्युऽभिः। जनासः। शूराः। यह्वीषु। ओषधीषु। विक्षु। अध। स्म। नः। मरुतः। रुद्रियासः। त्रातारः। भूत। पृतनासु। अर्यः ॥२२॥
ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 56; मन्त्र » 22
अष्टक » 5; अध्याय » 4; वर्ग » 26; मन्त्र » 2
Acknowledgment
अष्टक » 5; अध्याय » 4; वर्ग » 26; मन्त्र » 2
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्ते वीराः कीदृशा भवेयुरित्याह ॥
अन्वयः
हे मरुतो यद्ये रुद्रियासो जनासः शूरा मनुष्या ! मन्युभिश्शत्रून् संयत् हनन्ताध यह्वीष्वोषधीषु विक्षु पृतनासु स्म नस्त्रातारो भूत यो युष्माकमर्यः स्वामी तस्यापि त्रातारो भवत ॥२२॥
पदार्थः
(संयत्) (हनन्त) घ्नन्ति (मन्युभिः) क्रोधादिभिः (जनासः) जनाः प्रसिद्धाः (शूराः) निर्भयाः (यह्वीषु) महतीषु (ओषधीषु) (विक्षु) प्रजासु च (अध) अथ (स्मा) एव। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (नः) युष्माकम् (मरुतः) वायव इव मनुष्याः (रुद्रियासः) रुद्र इवाचरन्तः (त्रातारः) रक्षकाः (भूत) भवत (पृतनासु) शूरवीरमनुष्यसेनासु (अर्यः) स्वामी ॥२२॥
भावार्थः
ये वीराः शत्रूणां हन्तारः प्रजानां रक्षका महौषधीषु चतुरास्सन्ति तान् स्वामी राजा प्रीत्या रक्षेत् ॥२२॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वे वीर कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (मरुतः) पवनों के समान ! (यत्) जो (रुद्रियासः) रुद्र के समान आचरण करनेवाले (जनासः) प्रसिद्ध (शूराः) निर्भय मनुष्यो ! (मन्युभिः) क्रोधादिकों से शत्रुओं को (संयत्) संग्राम में (हनन्त) मारिये (अध) इसके अनन्तर (यह्वीषु) बहुत बड़ी (ओषधीषु) ओषधियों में और (विक्षु) प्रजाओं में (पृतनासु) शूरवीरों की सेनाओं में (स्म) निश्चित (नः) हमारे (त्रातारः) रक्षा करनेवाले (भूत) हूजिये जो (वः) तुम्हारा (अर्यः) स्वामी है, उसकी भी रक्षा करनेवाले हूजिये ॥२२॥
भावार्थ
जो वीरजन शत्रुओं को मारनेवाले, प्रजाओं के रक्षक और बड़ी-बड़ी ओषधियों में चतुर हैं, उनको स्वामी राजा प्रीति से रक्खें ॥२२॥
विषय
वीरों विद्वानों के वायुओं के तुल्य कर्त्तव्य ।
भावार्थ
( यत् ) जो ( जनासः ) मनुष्य ( विक्षु ) प्रजाओं के बीच में ( शूराः ) शूरवीर होकर ( यह्वीषु ओषधीषु ) बड़ी और बहुत सी ओषधियों में से ( मन्युभिः ) नाना ज्ञानों द्वारा ( संहनन्त ) नाना ओषधियों को मिलाते हैं हे ( मरुतः ) विद्वान् पुरुषो ! वे आप लोग ( रुद्रियासः ) रोगों को दूर करने वाले वैद्यजन ( पृतनासु अर्यः ) सेनाओं में स्वामी के समान ( नः त्रातारः भूत ) हमारे रक्षक होओ। वीरों के पक्ष में—प्रजाओं में जो ( संयत् ) युद्ध क्षेत्र में (शूराः) शूरवीर ( जनासः ) जन ( मन्युभिः हनन्त ) क्रोधों से प्रेरित होकर आघात करते हैं वे ( रुद्रियासः ) दुष्टों के रुलाने वाले वीर पुरुष के जन, और ( अर्यः ) स्वामी स्वयं भी ( पृतनासु नः त्रातारः भूत स्म ) संग्रामों में हमारे रक्षक होवें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वसिष्ठ ऋषिः ।। मरुतो देवताः ॥ छन्दः -१ आर्ची गायत्री । २, ६, ७,९ भुरिगार्ची गायत्रीं । ३, ४, ५ प्राजापत्या बृहती । ८, १० आर्च्युष्णिक् । ११ निचृदार्च्युष्णिक् १२, १३, १५, १८, १९, २१ निचृत्त्रिष्टुप् । १७, २० त्रिष्टुप् । २२, २३, २५ विराट् त्रिष्टुप् । २४ पंक्तिः । १४, १६ स्वराट् पंक्तिः ॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम् ॥
विषय
सद् वैद्य के लक्षण
पदार्थ
पदार्थ- (यत्) = जो (जनासः) = मनुष्य (विक्षु) = प्रजाओं के बीच (शूराः) = वीर होकर (यह्वीषु ओषधीषु) = बड़ी और बहुत-सी ओषधियों में से (मन्युभिः) = नाना ज्ञानों द्वारा (संहनन्त) = नाना ओषधियों को मिलाते हैं, हे (मरुतः) = विद्वान् पुरुषो! वे आप (रुद्रियासः) = रोगों को दूर करनेवाले वैद्यजन (पृतनासु अर्यः) = सेनाओं में स्वामी के तुल्य (नः त्रातारः भूत) = हमारे रक्षक होओ।
भावार्थ
भावार्थ- जिस प्रकार सेना नायक प्रजा की रक्षा करते हैं उसी प्रकार कुशल उत्तम वैद्य भी प्रजाओं के बीच में जाकर सामान्य तथा विशिष्ट ओषधियों से रोगों को दूर कर प्रजा की रक्षा करें।
मराठी (1)
भावार्थ
जे वीर शत्रूंचे मारक, प्रजेचे रक्षक, अनेक महान औषधींमध्ये चतुर असतील त्यांना राजाने प्रेमाने ठेवावे. ॥ २२ ॥
इंग्लिश (1)
Meaning
If people with rage and passions join together and strike and kill, then O Maruts, brave heroes of the line of Rudra, saviour with drugs and medicaments and with justice and punishment, you be our saviours and defenders and defend the ruler and master of the land in the strifes and contests of life extending to the people and great herbs and forests.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal