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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 56/ मन्त्र 24
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - मरुतः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः

    अ॒स्मे वी॒रो म॑रुतः शु॒ष्म्य॑स्तु॒ जना॑नां॒ यो असु॑रो विध॒र्ता। अ॒पो येन॑ सुक्षि॒तये॒ तरे॒माध॒ स्वमोको॑ अ॒भि वः॑ स्याम ॥२४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्मे इति॑ । वी॒रः । म॒रु॒तः॒ । शु॒ष्मी । अ॒स्तु॒ । जना॑नाम् । यः । असु॑रः । वि॒ऽध॒र्ता । अ॒पः । येन॑ । सु॒ऽक्षि॒तये॑ । तरे॑म । अध॑ । स्वम् । ओकः॑ । अ॒भि । वः॒ । स्या॒म॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्मे वीरो मरुतः शुष्म्यस्तु जनानां यो असुरो विधर्ता। अपो येन सुक्षितये तरेमाध स्वमोको अभि वः स्याम ॥२४॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्मे इति। वीरः। मरुतः। शुष्मी। अस्तु। जनानाम्। यः। असुरः। विऽधर्ता। अपः। येन। सुऽक्षितये। तरेम। अध। स्वम्। ओकः। अभि। वः। स्याम ॥२४॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 56; मन्त्र » 24
    अष्टक » 5; अध्याय » 4; वर्ग » 26; मन्त्र » 4
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्ते मनुष्याः कीदृशा भवेयुरित्याह ॥

    अन्वयः

    हे मरुतो ! यो वीरोऽसुरो जनानां विधर्ता सोऽस्मे शुष्म्यस्तु येन सुक्षितये वयमपस्तरेमाऽध स्वमोकोऽभितरेम वो युष्माकं रक्षकाः स्याम ॥२४॥

    पदार्थः

    (अस्मे) अस्माकम् (वीरः) प्राप्तबलबुद्धिशौर्यादिः (मरुतः) प्राणवद् बलकारकाः (शुष्मी) बहुबलयुक्तः (अस्तु) (जनानाम्) (यः) (असुरः) असुषु प्राणेषु विद्युदग्निरिव (विधर्ता) विशेषेण धर्ता (अपः) जलानि (येन) (सुक्षितये) शोभनायै पृथिव्याः प्राप्त्यै (तरेम) (अध) अथ (स्वम्) स्वकीयम् (ओकः) गृहम् (अभि) (वः) युष्माकम् (स्याम) भवेम ॥२४॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या मनुष्यान् बलयुक्तान् कुर्वन्ति नौकादिभिः समुद्रं तीर्त्वा द्वितीयं देशं गत्वा धनमार्जयन्ति ते युष्माकमस्माकं च रक्षकास्सन्तु ॥२४॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वे मनुष्य कैसे होवें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (मरुतः) प्राणों के सदृश बल करनेवाले जनो ! (यः) जो (वीरः) वीर अर्थात् प्राप्त हुई बल, बुद्धि और शूरता आदि जिसको (असुरः) प्राणों में रमता हुआ बिजुली अग्नि के सदृश (जनानाम्) मनुष्यों का (विधर्ता) विशेष करके धारण करनेवाला है वह (अस्मे) हमारा (शुष्मी) बहुत बल से युक्त (अस्तु) हो (येन) जिससे (सुक्षितये) सुन्दर पृथिवी की प्राप्ति के लिये हम लोग (अपः) जलों को (तरेम) तरें (अध) इसके अनन्तर (स्वम्) अपने (ओकः) गृह के पार होवें और (वः) आप लोगों के रक्षक (स्याम) होवें ॥२४॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य, मनुष्यों को बलयुक्त करते और नौका आदिकों से समुद्र के पार होकर दूसरे देश में जाकर धन बटोरते हैं, वे आप लोगों और हम लोगों के रक्षक हों ॥२४॥

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    विषय

    वीरों विद्वानों के वायुओं के तुल्य कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे ( मरुतः ) वायुवत् बलवान् पुरुषो ! हे प्राणवत् प्रियजनो ! (वीरः ) शूरवीर और विविध विद्याओं का प्रवक्ता पुरुष और हमारा पुत्र ( अस्मे ) हमारे उपकारार्थ ( शुष्मी अस्तु ) बलवान् हो । ( यः ) जो ( असुरः ) उत्तम प्राणों के बल पर रमण करता हुआ (असुरः) शत्रुओं को उखाड़ने में समर्थ बलवान् होकर ( जनानां ) मनुष्यों का ( विधर्त्ता) विशेष रूप से धारण पालन करने में समर्थ हो । ( येन ) और जिसके द्वारा हम ( सु-क्षितये ) उत्तम भूमि को प्राप्त करने के लिये ( अपः ) जलों के समान शत्रु और कर्मबन्धनों को और (अपः ) आप्त, धर्मदाराओं को भी ( तरेम) तरें, उनको प्राप्त कर गृहस्थ को सफल करें । ( अध ) और ( स्वम् ओकः ) अपने गृह को प्राप्त कर (वः अभि स्याम) आप लोगों के कृतज्ञ होकर रहें । समुद्रों में उत्तम भूमि प्राप्त करने के लिये विशेष दिशा में जहाज़ को लेजाने वाला विशेष वेगवान् प्रबल वायु भी ‘वीर’ है जिसके बलपर हम ( अपः तरेम ) समुद्री जलों को पार करने में समर्थ होते हैं और ( स्वम् ओक: अभि स्याम ) पुनः विदेशादि भ्रमण के बाद अपने गृह को कुशल से प्राप्त करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः ।। मरुतो देवताः ॥ छन्दः -१ आर्ची गायत्री । २, ६, ७,९ भुरिगार्ची गायत्रीं । ३, ४, ५ प्राजापत्या बृहती । ८, १० आर्च्युष्णिक् । ११ निचृदार्च्युष्णिक् १२, १३, १५, १८, १९, २१ निचृत्त्रिष्टुप् । १७, २० त्रिष्टुप् । २२, २३, २५ विराट् त्रिष्टुप् । २४ पंक्तिः । १४, १६ स्वराट् पंक्तिः ॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    समुद्रपार यात्रा

    पदार्थ

    पदार्थ - हे (मरुतः) = वायुवत् बलवान् पुरुषो! (वीरः) = वीर और विविध विद्याओं का प्रवक्ता पुरुष और हमारा पुत्र (अस्मे) = हमारे उपकारार्थ (शुष्मी अस्तु) = बलवान् हो । (यः) = जो (असुरः) = शत्रुओं को उखाड़ने में समर्थ होकर (जनानां) = मनुष्यों का (विधर्त्ता) = विशेष रूप से धारक पालक हो, येन = जिसके द्वारा हम सु-क्षितये उत्तम भूमि की प्राप्ति के लिये अपः-जलों के समान शत्रु और कर्मबन्धनों को तरेम-तरें । अध= और स्वम् ओकः = अपने गृह को प्राप्त कर वः अभि स्याम = आप लोगों के कृतज्ञ होकर रहें ।

    भावार्थ

    भावार्थ- समुद्र के अन्दर जो भूमि अर्थात् टापू हैं राजा की सेना समुद्री जहाजों के द्वार उन पर अपनी वीर सेना को भेजकर उन पर अधिकार करे। और विजय यात्रा सम्पन्न करके लौटे। व्यापारी लोग भी समुद्री यात्रा द्वारा विदेशों में व्यापार करने आते-जाते रहें।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे माणसांना बलवान करतात, नौका इत्यादींनी समुद्रापार दुसऱ्या देशात जाऊन धन मिळवितात ते तुमचे-आमचे रक्षक असतात. ॥ २४ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Maruts, let our young hero be strong and powerful who, vibrant as energy itself, may defend and sustain the people, and by virtue of whom we may cross the seas of life for the achievement of success on earth and live free in our own home as friends with you.

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