ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 10
बृ॒बदु॑क्थं हवामहे सृ॒प्रक॑रस्नमू॒तये॑ । साधु॑ कृ॒ण्वन्त॒मव॑से ॥
स्वर सहित पद पाठबृ॒बत्ऽउ॑क्थम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । सृ॒प्रऽक॑रस्नम् । ऊ॒तये॑ । साधु॑ । कृ॒ण्वन्त॑म् । अव॑से ॥
स्वर रहित मन्त्र
बृबदुक्थं हवामहे सृप्रकरस्नमूतये । साधु कृण्वन्तमवसे ॥
स्वर रहित पद पाठबृबत्ऽउक्थम् । हवामहे । सृप्रऽकरस्नम् । ऊतये । साधु । कृण्वन्तम् । अवसे ॥ ८.३२.१०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 10
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 2; मन्त्र » 5
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 2; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
We invoke the lord divine and master ruler who is highly adorable, of long and supple arms of generosity, and always does good for the protection and promotion of all.
मराठी (1)
भावार्थ
प्राण्यांची देखरेख करणे परमेश्वराचा स्वभावच आहे. आम्हाला राज्याचा रक्षकही अशा व्यक्तीला बनविले पाहिजे जी प्रजेचे रक्षण स्वेच्छेने करेल व स्वत: आपण आपल्या आत्म्याला परमेश्वराच्या उपासनेने या योग्यतेचे बनविले पाहिजे की, आपला बचाव स्वत: आपण करावा. ॥१०॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हम (बृबदुक्थम्) व्यापक स्तोत्र या वर्णनीय गुण वाले (ऊतये) अपने संरक्षण में लेने हेतु (सृप्रकरस्नम्) रक्षणीय को आश्वासन देने को मानो भुजायें फैलाये और (अवसे) देखभाल के लिए (साधु कृण्वन्तम्) प्रयत्नशील परमेश्वर, राजा व विद्वान् अपने अन्तरात्मा आदि के रूप में विद्यमान इन्द्र की (हवामहे) प्राप्ति के इच्छुक हों ॥१०॥
भावार्थ
प्राणियों की रक्षा करना प्रभु का तो स्वभाव है ही; राज्य का रक्षक भी ऐसा व्यक्ति होना चाहिये कि जो प्रजा की रक्षा स्वेच्छासहित करे तथा अपने आत्मा को परमेश्वर की उपासना से इस योग्य बनाना चाहिये कि अपनी रक्षा स्वयं कर सकें ॥१०॥
विषय
राजा प्रजा को समृद्ध करे।
भावार्थ
हम लोग ( बृहदुक्थ्यम् ) वेद वाणी के उत्तम वचन जानने हारे, ( ऊतये ) रक्षा के लिये ( सृप्रकरस्तम् ) आगे बढ़े बाहु वाले, अन्यों दीनों को आगे हाथ बढ़ा कर बचाने वाले और ( साधु कृण्वन्तम् ) उत्तम काम करने वाले धर्मात्मा, पुण्यवान् पुरुष को ( अवसे ) रक्षा के निमित्त प्रार्थना करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥
विषय
'बृबदुक्थ-सृप्रकरस्त्र' प्रभु
पदार्थ
[१] हम (बृबदुक्थम्) = [बृहत् उक्थं] महान् स्तुतिवाले प्रभु को (ऊतये) = रक्षण के लिये (हवामहे) = पुकारते हैं। प्रभु का स्तवन ही हमें सब आसुर भावों के आक्रमण से बचाता है। ये प्रभु (सृप्रकरस्त्रम्) = प्रसृत बाहुवाले हैं, विशाल क्रियामय भुजाओंवाले हैं। प्रभु इन भुजाओं से हमारा पालन करते हैं। वे सर्वव्यापक प्रभु 'सर्वतो बाहु' हैं, उनमें सर्वत्र भुजाओं के गुण विद्यमान हैं। [२] हम अवसे पालन के लिये इस प्रभु को पुकारते हैं जो साधु (कृण्वन्तम्) = प्रत्येक वस्तु को सुन्दरता से कर रहे हैं। प्रभु के किसी भी कार्य में असौन्दर्य व अपूर्णता नहीं है। प्रभु की उपासना करते हुए हम इन वस्तुओं का ठीक प्रयोग करेंगे तो अवश्य अपना रक्षण व पालन कर पायेंगे।
भावार्थ
भावार्थ-वे प्रभु महान् स्तुतिवाले, प्रसृत भुजाओंवाले व सब बातों को सुन्दरता से करनेवाले हैं। इन प्रभु को हम रक्षण व पालन के लिये पुकारते हैं।
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