ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 25
य उ॒द्नः फ॑लि॒गं भि॒नन्न्य१॒॑क्सिन्धूँ॑र॒वासृ॑जत् । यो गोषु॑ प॒क्वं धा॒रय॑त् ॥
स्वर सहित पद पाठयः । उ॒द्नः । फ॒लि॒ऽगम् । भि॒नत् । न्य॑क् । सिन्धू॑न् । अ॒व॒ऽअसृ॑जत् । यः । गोषु॑ । प॒क्वम् । धा॒रय॑त् ॥
स्वर रहित मन्त्र
य उद्नः फलिगं भिनन्न्य१क्सिन्धूँरवासृजत् । यो गोषु पक्वं धारयत् ॥
स्वर रहित पद पाठयः । उद्नः । फलिऽगम् । भिनत् । न्यक् । सिन्धून् । अवऽअसृजत् । यः । गोषु । पक्वम् । धारयत् ॥ ८.३२.२५
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 25
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 5
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra breaks the clouds of rain, releases the waters for the rivers to flow down to the sea, and provides mature milk in the cows, knowledge and wisdom in the words of language and ripe grain in the fields of earth.
मराठी (1)
भावार्थ
सूर्य अथवा विद्युत मेघाचे भेदन करतात व कोणत्या प्रकारे जलाची वृष्टी होते तसेच पृथ्वीवर लहान-मोठ्या जलाशयाची रचना कशी होते? कोणत्या प्रकारे वृष्टिजल भूमीत पोचून अन्नाचे उत्पादन, वर्धन व परिपक्व करते? हे विज्ञान जाणले पाहिजे. ॥२५॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(यः) जो सूर्य (उद्नः) जल हेतु (फलिगम्) उसके धारण करने वाले मेघ को छिन्न-भिन्न करता है और (न्यक्) उसको नीचे पृथ्वी पर पहुँचा कर (सिन्धून्) तालाब, समुद्र, आदि जलाशयों की रचना करता है और (यः) जो सूर्य (गोषु) भूमियों में (पक्वम्) पक्व अन्न आदि को (धारयत्) परिपुष्टि देता है, वही इन्द्र है ॥२५॥
भावार्थ
सूर्य या विद्युत् मेघ को भेद कर किस तरह उससे कार्य कर पृथ्वी पर छोटे-बड़े जलाशयों की रचना करता है, किस प्रकार वृष्टिजल भूमि में पहुँचकर अन्न का उत्पादन, वर्धन और उसको परिपक्व करता है--इस सब विज्ञान को जानना अभीष्ट है ॥२५॥
विषय
राजा को वा उत्साही को आदेश उपदेश।
भावार्थ
जिस प्रकार तीव्र विद्युत् ( फलिगं भिनत्) मेघ का छेदन भेदन करता और ( उद्नः सिन्धून् न्यक् अव असृजत् ) जल की धाराओं को नीचे फेंकता है और ( गोषु पक्वं धारयत् ) भूमियों में परिपक्व अन्न को पुष्ट करता है, उसी प्रकार जो राजा ( फलिगं भिनत् ) फलयुक्त सशस्त्र सैन्य से आक्रमण करने वाले शत्रु को छिन्न भिन्न करता, और राष्ट्र में ( उद्नः सिन्धून् न्यक् अव असृजत् ) जल की नाना नहरों को नीची भूमियों में प्रवाहित करता है और जो ( गोषु ) भूमियों में ( पक्वम् ) पके अन्न को लेता है वही भूमि का स्वामी ( इन्द्रः ) ऐश्वर्यवान् कहाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥
विषय
प्रभु के आश्चर्यकारक कर्म
पदार्थ
[१] गत मन्त्र के अनुसार तू उस प्रभु का हृदय में धारण कर [भर] (यः) = जो (उद्नः) = जल के हेतु से (फलिगम्) = मेघ को [विशीर्ण होकर इधर-उधर गति करनेवाला फल् + गम् ] (भिनत्) = विदीर्ण करता है। इसे विदीर्ण करके (न्यक्) = नीचे (सिन्धून्) = जल-प्रवाहों को (अवासृजत्) = उत्पन्न करता है। [२] उस प्रभु का धारण कर (यः) = जो गोषु गौओं में (पक्वम्) = परिपक्व दूध को (धारयत्) = धारण करते हैं। गोस्तन से वे बाहिर आता हुआ दूध खूब उष्णता को लिये हुए होता है। इस प्रभु के धारण से ही हम शरीर में सोम का रक्षण कर सकेंगे।
भावार्थ
भावार्थ- 'मेघों का विदारण, जलप्रवाहों की सृष्टि व गौवों से उष्ण दुग्ध की प्राप्ति' ये सब बातें ही हमें आश्चर्य में डाल देती हैं और प्रभु की महिमा का स्मरण कराती हैं।
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