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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 12
    ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    स न॑: श॒क्रश्चि॒दा श॑क॒द्दान॑वाँ अन्तराभ॒रः । इन्द्रो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभि॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सः । नः॒ । श॒क्रः । चि॒त् । आ । श॒क॒त् । दान॑ऽवान् । अ॒न्त॒र॒ऽआ॒भ॒रः । इन्द्रः॑ । विश्वा॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स न: शक्रश्चिदा शकद्दानवाँ अन्तराभरः । इन्द्रो विश्वाभिरूतिभि: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सः । नः । शक्रः । चित् । आ । शकत् । दानऽवान् । अन्तरऽआभरः । इन्द्रः । विश्वाभिः । ऊतिऽभिः ॥ ८.३२.१२

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 12
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 3; मन्त्र » 2
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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The Lord Almighty strengthens us, is generous, and enriches our inner self with vision and love and with all strength and modes of protection and progress.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जर आम्ही अभ्यासाने हा अनुभव घेतला, की दानशील भगवान अथवा आमचा समर्थ राजा आमचे रक्षण करण्यास तयार असेल तर आमचे मनोबल वाढते व आम्ही स्वत:ला शक्तिमान समजतो. ॥१२॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सः इन्द्रः) वह इन्द्र (परमेश्वर) अथवा राजा (शक्रः चित्) समर्थ ही है; (दानवान्) दान देने वाला है। (विश्वाभिः) सब प्रकार की सभी (ऊतिभिः) रक्षा-सामग्रियों के साथ विद्यमान हो (अन्तः आभरः) हमारे अन्तःकरण को पुष्ट करता है और (आशकत्) इस तरह हमें सभी तरह से समर्थ बनाता है ॥१२॥

    भावार्थ

    यदि हम अभ्यास द्वारा यह अनुभव करें कि दानवान् प्रभु अथवा हमारा समर्थ शासक हमारी सब प्रकार से रक्षा के लिये सिद्ध है तो हमारा मनोबल बढ़ता है और हम स्वयं को शक्तिमान् अनुभव करते हैं ॥१२॥

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    विषय

    माता के तुल्य राजा का कर्त्तव्य। बड़े भारी पालक प्रभु की स्तुति।

    भावार्थ

    ( सः ) वह ( शकः ) शक्तिशाली ( इन्द्रः ) ऐश्वर्यवान् राजा ( दानवान् ) नाना दान योग्य धनैश्वर्यवान् होकर (नः आ शकत्) हमें सब ओर से शक्तिमान् करे। और वह ( विश्वाभिः ऊतिभिः ) सब प्रकार की रक्षाओं से ( नः अन्तः-आ-भरः ) हमें अपने राष्ट्र के भीतर गर्भ में माता के समान धारण पोषण एवं पालन करने वाला हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥

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    विषय

    'शक्र दान-वान्' प्रभु

    पदार्थ

    [१] (सः) = वे प्रभु (शक्रः) = शक्तिशाली हैं (नः) = हमें (चित्) = भी (आशकत्) = सब प्रकार से शक्तिशाली बनाते हैं। (दान-वान्) = वे प्रभु सब कुछ देनेवाले हैं [दा दाने] अथवा शत्रुओं का खण्डन करनेवाले हैं, [दाप लवने] । (अन्तः आभरः) = वे प्रभु हमें अपने अन्दर धारण करते हैं। [२] (इन्द्रः) = वे सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले परमैश्वर्यशाली प्रभु (विश्वाभिः ऊतिभिः) = सब रक्षणों के द्वारा हमारा भरण व पोषण करते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- वे प्रभु हमें शक्तिशाली बनाते हैं, हमारे लिये सब कुछ देते हैं। सब रक्षणों के साथ हमारा भरण व पोषण करते हैं।

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