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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 21
    ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अती॑हि मन्युषा॒विणं॑ सुषु॒वांस॑मु॒पार॑णे । इ॒मं रा॒तं सु॒तं पि॑ब ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अति॑ । इ॒हि॒ । म॒न्यु॒ऽसा॒विन॑म् । सु॒सु॒ऽवांस॑म् । उ॒प॒ऽअर॑णे । इ॒मम् । रा॒तम् । सु॒तम् । पि॒ब॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अतीहि मन्युषाविणं सुषुवांसमुपारणे । इमं रातं सुतं पिब ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अति । इहि । मन्युऽसाविनम् । सुसुऽवांसम् । उपऽअरणे । इमम् । रातम् । सुतम् । पिब ॥ ८.३२.२१

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 21
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Ignore the man who offers yajnic soma in a mood of anger, frustration and protest. Ignore the man who offers yajna and soma but in a joyless and conflictive mood. Accept this soma of homage distilled and offered in a state of delight, love and faith.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे रोष, अभिमान इत्यादी दुर्गुण उत्पन्न करतात अशा आनंदाचा उपभोग व्यक्तीने घेता कामा नये. त्यामुळे त्यांच्यासमोर कठीण परिस्थिती उत्पन्न होऊ शकते. ॥२१॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे सेनापति अथवा मेरे साधक मन! (मन्युषाविणम्) क्रोध व अभिमान के उत्पादक (उपारणे) अरमणीय कष्टदायी स्थिति की ओर (सुषुवांसम्) प्रेरित करने वाले भोग्य रस को (अतीहि) पार कर जा; उसको ग्रहण न कर। (इमं रातम्) इस उपहार रूप से दिए गए अतएव प्रकृष्ट (सुतम्) प्राप्त आनन्द का अथवा ध्यान योग से प्रस्तुत परमानन्द का (पिब) उपभोग कर॥२१॥

    भावार्थ

    ऐसे आनन्द का उपभोग करना व्यक्ति के लिए उचित नहीं जो रोष, अभिमान आदि दुर्गुणों को जन्म दे और इस प्रकार उसके लिए कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दे ॥२१॥

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    विषय

    राजा को वा उत्साही को आदेश उपदेश।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! तू ( मन्यु-साविनम् ) मन्यु, क्रोध वा अभिमान से आधिपत्य करने वाले को ( अति इहि ) अतिलंघन कर । और ( उप-अरणे ) अरमणीय, कष्टदायी स्थान में ( सुसुवांसम् ) स्वामित्व करने वाले से भी ( अति इहि ) अधिक बढ़ जा। तू ( इमं ) इस ( रातम् ) अपने हाथ सौंपे ( सुतं ) उत्पन्न प्रजागण को ( पिब ) पालन कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥

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    विषय

    सोमरक्षण व प्रभु प्राप्ति

    पदार्थ

    [१] (मन्युषाविणम्) = ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले प्रभु को [मन्यु ज्ञान, षु = पैदा करना] (अति इहि) = अतिशयेन प्राप्त हो। (उपारणे) = [Proximity समीपता] समीपता के निमित्त (सुषुवांसम्) = इस सोम का सम्पादन करनेवाले प्रभु को [अति इहि: ] अतिशयेन प्राप्त हो। प्रभु ने हमारे शरीरों में सोम का सम्पादन किया है। इसके रक्षण के द्वारा हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनते हैं। [२] इसलिए हे जीव ! (इमम्) = इस (रातम्) = दिये हुए (सुतम्) = सोम को (पिब) = तू पीनेवाला बन। इस सोम के पान से ही हम प्रभु के सान्निध्य को प्राप्त करेंगे। यह प्रभु सान्निध्य हमारे अन्दर उत्कृष्ट ज्ञान - ज्योति को जगायेगा।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु ने हमें यह सोमशक्ति प्राप्त कराई है। इसके पान से हम प्रभु की समीपतावाले होंगे। प्रभु की समीपता में उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करेंगे।

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