ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 22
इ॒हि ति॒स्रः प॑रा॒वत॑ इ॒हि पञ्च॒ जनाँ॒ अति॑ । धेना॑ इन्द्राव॒चाक॑शत् ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒हि । ति॒स्रः । प॒रा॒वतः॑ । इ॒हि । पञ्च॑ । जना॑न् । अति॑ । धेनाः॑ । इ॒न्द्र॒ । अ॒व॒ऽचाक॑शत् ॥
स्वर रहित मन्त्र
इहि तिस्रः परावत इहि पञ्च जनाँ अति । धेना इन्द्रावचाकशत् ॥
स्वर रहित पद पाठइहि । तिस्रः । परावतः । इहि । पञ्च । जनान् । अति । धेनाः । इन्द्र । अवऽचाकशत् ॥ ८.३२.२२
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 22
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 2
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 5; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra, come from far, cross over the five classes of people to exhaust the possibilities of their life, transcend the three versions of knowledge, action and prayer, and listen with love and approval the sole one voice of my soul.
मराठी (1)
भावार्थ
आध्यात्मिक रूपाने सुखी होण्यासाठी माणसांनी ज्ञान, कर्म व भक्तीचा निर्देश करणाऱ्या वेदवाणीचा स्वीकार करावा. ॥२२॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे इन्द्र जीवात्मा! (तिस्रः परावतः) तीन दूरस्थ स्थितियों को (अति इहि) लाँघकर और (पञ्चजनान्) पाँच सामान्य जनों [ब्राह्मण आदि चार वर्ण तथा पञ्चम निषाद] को भी (अति इहि) लाँघकर मेरे समीप पहुँच। तू (धेनाः) दूध देने वाली गायों के समान आनन्दरस की वर्षा करने वाली वाणियों की (अवचाकशत्) प्रगाढ़ कामना कर ॥२२॥
भावार्थ
आध्यात्मिक रूप से सुखी होने के लिए मनुष्य ज्ञान, कर्म और भक्ति का निर्देश करनेवाली वेदवाणियों का सेवन करे ॥२२॥
विषय
राजा को वा उत्साही को आदेश उपदेश।
भावार्थ
तू ( परावतः ) दूर के ( तिस्रः ) तीनों प्रकार के उत्तम मध्यम, निकृष्ट प्रजाओं को ( अति इहि ) अपने वश कर। और (पञ्चजनान् अति इहि ) चार वर्ण और पांचवें निषाद इन पाँचों को भी अपने वश कर। हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! तू ( धेना ) नाना वाणियों को ( अव चाकशत् ) देख। अथवा हे ( इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! तू ( परावतः ) दूर से भी ( तिस्रः ) धेनाः ( इहि ) तीनों प्रकार के ऋग यजुः साम वाणियों को प्राप्त कर ( अव चाकशत् ) उनसे देख, न्याय और ज्ञान का दर्शन कर। पांचों जनों को अपने अधीन कर, उन इन्द्रियों पर आत्मावत् शासन कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥
विषय
इहि तिस्रः, इहि पञ्च
पदार्थ
[१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (परावतः) = दूर देश से इन्द्रियों के इधर-उधर भटकने को छोड़कर (तिस्त्रः) = ऋग्, यजु, सामरूप तीन प्रभु की वाणियों को (इहि) = प्राप्त हो। इन वाणियों को प्राप्त करके (पञ्च) = पाँचों जनान् विकासों को, पाँचों कोशों के उत्कर्ष को (अति इहि) = अतिशयेन प्राप्त कर । [२] हे इन्द्र ! तू (धेनाः) = इन ज्ञान की वाणियों को (अवचाकशत्) = देखता हुआ हो। सदा तू इन ज्ञान की वाणियों का अध्ययन करनेवाला बन।
भावार्थ
भावार्थ- हम जितेन्द्रिय बनकर, इन्द्रियों के विषयों में न भटकने देकर ज्ञान की वाणियों का ध्ययन करें। पाँचों कोशों के विकास को ठीक प्रकार से कर पायें। सदा प्रभु की इन ज्ञान- वाणियों को देखनेवाले बनें।
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