ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 32/ मन्त्र 17
पन्य॒ इदुप॑ गायत॒ पन्य॑ उ॒क्थानि॑ शंसत । ब्रह्मा॑ कृणोत॒ पन्य॒ इत् ॥
स्वर सहित पद पाठपन्ये॑ । इत् । उप॑ । गा॒य॒त॒ । पन्ये॑ । उ॒क्थानि॑ । शं॒स॒त॒ । ब्रह्म॑ । कृ॒णो॒त॒ । पन्ये॑ । इत् ॥
स्वर रहित मन्त्र
पन्य इदुप गायत पन्य उक्थानि शंसत । ब्रह्मा कृणोत पन्य इत् ॥
स्वर रहित पद पाठपन्ये । इत् । उप । गायत । पन्ये । उक्थानि । शंसत । ब्रह्म । कृणोत । पन्ये । इत् ॥ ८.३२.१७
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 32; मन्त्र » 17
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 4; मन्त्र » 2
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 4; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Sing in honour of adorable Indra, recite your hymns of praise in honour of admirable Indra, create your orations to celebrate the glorious Indra.
मराठी (1)
भावार्थ
तस्य (पुरुषस्य) मन व ब्रह्मा (कौ. १७.७) कौषीतकि ब्राह्मणाप्रमाणे पुरुषाचे मन ‘ब्रह्मा’ आहे. माणसाचा एकमेव स्त्युत्य परमैश्वर्यवान (इन्द्र) परमेश्वर आहे. आम्ही या शास्त्रवचनांनी परमेश्वराच्या गुणांचा न केवळ मान करावा तर त्यांचे मनन करावे. ॥१७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
स्तुतियोग्य प्रभु के लिए ही (उप) उसकी उपस्थिति को अनुभव कर (गायत) उसका गुण-गान करो; (पन्ये, इत्) उस स्तुत्य प्रभु को लक्ष्य कर (उक्थानि) शास्त्रोक्त स्तुति वचनों से (पन्ये शंसत) उस स्तुत्य के गुण कथन करो। (उत) और ( ब्रह्मा) मन को (पन्ये, इत्) स्तुत्य में ही (कृणोत) लगाओ ॥१७॥
भावार्थ
‘तस्य (पुरुषस्य) मन एव ब्रह्मा’ (कौ० १७.७) कौषीतकि ब्राह्मण के अनुसार पुरुष का मन ही 'ब्रह्मा' है। मनुष्य का एकमात्र स्तुत्य (इन्द्र) परमेश्वर है। हम शास्त्र वचन से प्रभु के न केवल गुणगान करें, अपितु उनका मनन करना भी जरूरी है ॥१७॥
विषय
उपास्य का स्तवन।
भावार्थ
हे विद्वान् पुरुषो ! आप लोग ( पन्ये इत् ) स्तुति योग्य परमेश्वर के निमित्त ही, उसको लक्ष्य करके ही ( उप गायत ) उपासना पूर्वक स्तुति गान करो। ( पन्ये उक्थानि शंसत ) उस स्तुत्य प्रभु के निमित्त ही उत्तम वेद-चचनों का उच्चारण करो । ( पन्ये इत् ब्रह्म कृणोत) उस स्तोतव्य प्रभु के निमित्त ही वेद मन्त्रों का और यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
काण्वो मेधातिथि: ऋषिः॥ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—१, ७, १३, १५, २७, २८ निचृद् गायत्री। २, ४, ६, ८—१२, १४, १६, १७, २१, २२, २४—२६ गायत्री। ३, ५, १९, २०, २३, २९ विराड् गायत्री। १८, ३० भुरिग् गायत्री॥
विषय
गायन-स्तवन- तप
पदार्थ
[१] (पन्ये इत्) = उस स्तुति के योग्य प्रभु के विषय में ही उपगायत गायन करो । (पन्ये) = उस स्तुत्य प्रभु के विषय में ही (उक्थानि) = स्तोत्रों का शंसत-शंसन व उच्चारण करो। [२] (पन्ये) = उस प्रभु की प्राप्ति के निमित्त (इत्) = निश्चय से (ब्रह्मा) = विविध तपस्याओं को (कृणोत) = करो।
भावार्थ
भावार्थ- हम प्रभु के गुणों का गायन करें। प्रभु का ही स्तवन करें। प्रभु प्राप्ति के निमित्त विविध तपस्याओं को करनेवाले बनें।
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