ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 66/ मन्त्र 14
अस्य॑ ते स॒ख्ये व॒यमिय॑क्षन्त॒स्त्वोत॑यः । इन्दो॑ सखि॒त्वमु॑श्मसि ॥
स्वर सहित पद पाठअस्य॑ । ते॒ । स॒ख्ये । व॒यम् । इय॑क्षन्तः । त्वाऽऊ॑तयः । इन्दो॒ इति॑ । स॒खि॒ऽत्वम् । उ॒श्म॒सि॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्य ते सख्ये वयमियक्षन्तस्त्वोतयः । इन्दो सखित्वमुश्मसि ॥
स्वर रहित पद पाठअस्य । ते । सख्ये । वयम् । इयक्षन्तः । त्वाऽऊतयः । इन्दो इति । सखिऽत्वम् । उश्मसि ॥ ९.६६.१४
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 66; मन्त्र » 14
अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 9; मन्त्र » 4
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अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 9; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(इन्दो) प्रकाशरूपपरमेश्वर ! (अस्य ते सख्ये) प्रागुक्तगुणविशिष्टस्य भवतो मित्रतायां (वयम्) वयं जनाः (इयक्षन्तः) तव यजनं कुर्मः (त्वोतयः) भवता सुरक्षिता वयं तव (सखित्वम्) मित्रत्वं (उश्मसि) वाञ्छामः ॥१४॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(इन्दो) प्रकाशरूपपरमेश्वर ! (अस्य ते सख्ये) पूर्वोक्त गुणविशिष्ट आपके मैत्री भाव में (वयम्) हम लोग (इयक्षन्तः) आपका यजन करते हैं। (त्वोतयः) आपसे सुरक्षित हुए हम लोग आपकी (सखित्वम्) मित्रता को (उश्मसि) चाहते हैं ॥१४॥
भावार्थ
परमात्मा के साक्षात्कार से जब मनुष्य अत्यन्त सन्निहित हो जाता है, तब ब्रह्म के सत्यादि गुणों के धारण करने से उसमें ब्रह्मसाम्य हो जाता है। उसी का नाम ब्रह्ममैत्री है। इसी भाव का कथन इस मन्त्र में किया है कि हे परमात्मन् ! हम तुम्हारे मैत्रीभाव को प्राप्त हों ॥१४॥
विषय
यज्ञशीलता व प्रभु-मित्रता
पदार्थ
[१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! (अस्य) = इस (ते) = तेरी (सख्ये) = मित्रता में, अर्थात् तुझे शरीर में सुरक्षित करते हुए (वयम्) = हम (इयक्षन्तः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों की कामनावाले होते हुए, (त्वा ऊतया) = तेरे द्वारा रक्षणवाले हों । [२] हे (इन्दो:) = सोम ! तेरे से रक्षित हुए हुए हम (सखित्वम्) = प्रभु की मित्रता को (उश्मसि) = चाहते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ - शरीर में सोम के सुरक्षित होने पर [क] हमारी वृत्ति यज्ञ आदि उत्तम कर्मों की ओर झुकती है, [ख] हमारी प्रभु - मित्रता की कामना होती है ।
विषय
प्रभु शासक के सख्य की कामना।
भावार्थ
हे (इन्दो) ऐश्वर्यवन्! शत्रु के प्रति वेग से जाने वाले ! (वयम्) हम (त्वा ऊतयः त्वा ऊतयः) तेरी रक्षा, प्रेम से युक्त होकर, (ते सख्ये) तेरे मित्रभाव में रहते हुए, (इयक्षन्तः) ईश्वर की उपासना, परस्पर का आदर-सत्कार दान-प्रतिदान करते हुए, (ते सखित्वम्) तेरे ही मित्र-भाव को (उश्मसि) सदा चाहें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शतं वैखानसा ऋषयः॥ १–१८, २२–३० पवमानः सोमः। १९—२१ अग्निर्देवता ॥ छन्दः- १ पादनिचृद् गायत्री। २, ३, ५—८, १०, ११, १३, १५—१७, १९, २०, २३, २४, २५, २६, ३० गायत्री। ४, १४, २२, २७ विराड् गायत्री। ९, १२,२१,२८, २९ निचृद् गायत्री। १८ पाद-निचृदनुष्टुप् ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O spirit of love and peace, beauty and grace, Indu, so gracious as you are, we offer yajna in honour of your friendship under your protection, and we pray we may enjoy your friendship and we may exalt and glorify that friendship.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्म्याच्या साक्षात्काराने जेव्हा मनुष्य त्याच्या अत्यंत सन्निहित होतो तेव्हा ब्रह्माच्या सत्य इत्यादी गुणांना धारण करून त्याच्यात ब्रह्मसाम्य होते. त्याचेच नाव ब्रह्ममैत्री आहे. हाच भाव या मंत्रात सांगितलेला आहे. हे परमात्मा! आम्ही तुझ्याशी मैत्री करावी ॥१४॥
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