ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 66/ मन्त्र 29
ऋषिः - शतं वैखानसाः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
ए॒ष सोमो॒ अधि॑ त्व॒चि गवां॑ क्रीळ॒त्यद्रि॑भिः । इन्द्रं॒ मदा॑य॒ जोहु॑वत् ॥
स्वर सहित पद पाठए॒षः । सोमः॑ । अधि॑ । त्व॒चि । गवा॑म् । क्री॒ळ॒ति॒ । अद्रि॑ऽभिः । इन्द्र॑म् । मदा॑य । जोहु॑वत् ॥
स्वर रहित मन्त्र
एष सोमो अधि त्वचि गवां क्रीळत्यद्रिभिः । इन्द्रं मदाय जोहुवत् ॥
स्वर रहित पद पाठएषः । सोमः । अधि । त्वचि । गवाम् । क्रीळति । अद्रिऽभिः । इन्द्रम् । मदाय । जोहुवत् ॥ ९.६६.२९
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 66; मन्त्र » 29
अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 12; मन्त्र » 4
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अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 12; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(एष सोमः) अयं परमात्मा (गवाम्) इन्द्रियाणां (अधित्वचि) मनोरूपशक्तौ (अद्रिभिः) इन्द्रियवृत्तिभिः साक्षात्क्रियते। (इन्द्रम्) कर्मयोगिनः कर्मक्षेत्रे (जोहुवत्) प्राणापानगतिं निघ्नन्ति। अथ च कर्मयोगिनं कर्मक्षेत्रे (क्रीडति) क्रीडयति। अन्तर्भावितण्यर्थोऽत्र वर्तते ॥२९॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(एष सोमः) यह परमात्मा (गवाम्) इन्द्रियों की (अधित्वचि) मनोरूप शक्ति में (अद्रिभिः) इन्द्रियवृत्तियों द्वारा साक्षात्कार किया जाता है। (इन्द्रम्) कर्मयोगी के कर्मक्षेत्र में (जोहुवन्) प्राणापान की गति को हवन करता है और कर्मयोगी को कर्मक्षेत्र में (क्रीडति) क्रीडा कराता है ॥२९॥
भावार्थ
परमात्मा की कृपा से ही कर्मयोगी जन प्राण-अपान की गति को रोककर प्राणायाम करते हैं और वही परमात्मा इस ब्रह्माण्डरूपी अद्भुत कर्मक्षेत्र में उनसे सर्वोपरि कर्म कराता है। इसमें “अधित्वचि” नाम मन का है, क्योंकि “इन्द्रियाणां शक्तिं तनोतीति त्वक्” इससे यहाँ आध्यात्मिक यज्ञ का अभिप्राय है। सायणाचार्य ने यहाँ “अधित्वचि” इसके अत्यन्त घृणित अर्थ किये थे। अर्थात् “गवामधित्वचि” इसका “अनडुहचर्मणि” अर्थ किये हैं। सायणाचार्य के मत में अनुडुहचर्म बिछाकर उसके ऊपर सोम कूटा जाता था। विचार करने से यह अर्थ योग्यता से भी विरुद्ध है, क्योंकि सोम किसी कड़ी चीज़ पर ही कूटा जा सकता है, न कि चमड़े पर। कुछ हो, परन्तु “गवामधित्वचि” इसके “अनुडुहचर्मणि” अर्थ करना वेद के आशय से सर्वथा विरुद्ध है ॥२९॥
विषय
गवां त्वचि अधिक्रीडति
पदार्थ
[१] = (एषः) = यह (सोमः) = सोम [वीर्य] (गवाम्) = ज्ञान की वाणियों के (अधि) = आधिक्येन (त्वचि) = सम्पर्क में (अद्रिभि:) = [ adore ] उपासनाओं के द्वारा (क्रीडति) = क्रीडावाला होता है। प्रभु की उपासना से ही इस सोम का शरीर में रक्षण होता है। शरीर में रक्षित सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करके हमें ज्ञान की वाणियों के सम्पर्क में सदा रखता है। [२] यह सोम (मदाय) = आनन्द को प्राप्ति के लिये (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (जोहुवत्) = पुकारता है। सोमरक्षक पुरुष सदा प्रभु के स्तवन की वृत्तिवाला बनता है। इसी में वह आनन्द का अनुभव करता है ।
भावार्थ
भावार्थ- सोमरक्षण से हम ज्ञान व उपासना की रुचिवाले बनते हैं। यह सोमी पुरुष प्रभु को पुकारता है और आनन्द का अनुभव करता है ।
विषय
इसी प्रकार प्रजा का रोजा को पुकारना।
भावार्थ
(एषः सोमः) यह उत्पन्न होने वाला जीव (गवां त्वचि अधि) इन्द्रियों के आवरणकारी देह के ऊपर अध्यक्ष रूप से (अद्रिभिः क्रीडति) अविनश्वर शक्तियों वा प्राणों से खेलता है, नाना सुख प्राप्त करता है, और (मदाय) परमानन्द सुख को प्राप्त करने के लिये (इन्द्रं) उस ऐश्वर्यवान् परम प्रभु को (जोहुवत्) पुकारता, उसकी स्तुति प्रार्थना करता है। इसी प्रकार अभिषिक्त जन भूमियों पर शस्त्र बलों से युद्ध क्रीड़ा करता है और सब के हर्ष के लिये इन्द्र पद को प्राप्त करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शतं वैखानसा ऋषयः॥ १–१८, २२–३० पवमानः सोमः। १९—२१ अग्निर्देवता ॥ छन्दः- १ पादनिचृद् गायत्री। २, ३, ५—८, १०, ११, १३, १५—१७, १९, २०, २३, २४, २५, २६, ३० गायत्री। ४, १४, २२, २७ विराड् गायत्री। ९, १२,२१,२८, २९ निचृद् गायत्री। १८ पाद-निचृदनुष्टुप् ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
This Soma, omnipresent spirit of absolute bliss, plays in and on top of the universe with the stars, planets and clouds of its creation and invites and inspires the soul to participate in the play for joy.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्म्याच्या कृपेनेच कर्मयोगी प्राणापानाच्या गतीला रोखून प्राणायाम करतात व तोच परमात्मा या ब्रह्मांडरूपी अद्भुत् कार्यक्षेत्रात त्यांच्याकडून सर्वश्रेष्ठ कर्म करवितो यात ‘‘अधित्वचि’’ नाव मनाचे आहे. कारण ‘‘इन्द्रियाणां शक्तिं तनोतीति त्वक’’ ‘‘त्वचि अधि इति अधित्वचि’’ ‘‘अधित्वचि’’ याचे अत्यंत घृणित अर्थ केले गेलेले आहेत. ‘‘गवामधित्वचि’’ याचा अर्थ ‘‘अनुडुहचर्मणि’’ असा केलेला आहे. सायणाचार्याचे हे मत आहे की अनुडुहचर्म अंथरूण त्यावर सोम कुटला जात होता. विचार केल्यास हा अर्थ औचित्याच्या विरुद्ध आहे. कारण सोम एखाद्या मोठ्या वस्तूवर कुटला जात नाही किंवा कातड्यावरही. काहीही असो ‘‘गवामधित्वचि’’ याचा ‘‘अनुडुहचर्म’’ अर्थ करणे वेदाच्या आशयाच्या सर्वस्वी विरुद्ध आहे. ॥२९॥
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