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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 66 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 66/ मन्त्र 5
    ऋषिः - शतं वैखानसाः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    तव॑ शु॒क्रासो॑ अ॒र्चयो॑ दि॒वस्पृ॒ष्ठे वि त॑न्वते । प॒वित्रं॑ सोम॒ धाम॑भिः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तव॑ । शु॒क्रासः॑ । अ॒र्चयः॑ । दि॒वः । पृ॒ष्ठे । वि । त॒न्व॒ते॒ । प॒वित्र॑म् । सो॒म॒ । धाम॑ऽभिः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तव शुक्रासो अर्चयो दिवस्पृष्ठे वि तन्वते । पवित्रं सोम धामभिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तव । शुक्रासः । अर्चयः । दिवः । पृष्ठे । वि । तन्वते । पवित्रम् । सोम । धामऽभिः ॥ ९.६६.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 66; मन्त्र » 5
    अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 7; मन्त्र » 5
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सोम) हे परमेश्वर ! (धामभिः) भवान् स्वशक्तिभिः (पवित्रम्) पवित्रोऽस्ति (तव) भवतः (शुक्रासः) बलवत्यः (अर्चयः) प्रकाशोर्मयः (दिवस्पृष्ठे) द्युलोकोपरि (वितन्वते) विस्तृताः सन्ति ॥५॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सोम) हे परमात्मन् ! (धामभिः) आप अपनी शक्तियों से (पवित्रम्) पवित्र हैं। (तव) तुम्हारी (शुक्रासः) बलवाली (अर्चयः) प्रकाश की लहरें (दिवस्पृष्ठे) द्युलोक के ऊपर (वितन्वते) विस्तृत हो रही हैं ॥५॥

    भावार्थ

    परमात्मा की ज्योति सर्वत्र दीप्तिमती है, उसके प्रकाश से एक रेणु भी खाली नहीं। द्युलोक में उसका प्रकाश इस प्रकार फैला हुआ है, जैसे मकड़ी के जाले के तन्तुओं के आतान-वितान का पारावार नहीं मिलता, इसी प्रकार उसका पारावार नहीं ॥ अथवा यों कहो कि मयूरपिच्छ की शोभा के समान उसके द्युलोक की अनन्त प्रकार की शोभा है, जिसको परमात्मज्योति ने देदीप्यमान किया है ॥५॥

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    विषय

    शुक्रासः अर्ययः

    पदार्थ

    [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! (दिवः पृष्ठे) = मस्तिष्क रूप द्युलोक के आधार में (तव) = तेरी (शुक्रासः) = चमकती हुई अर्चया ज्ञान की ज्वालायें हैं। तेरे रक्षित होने पर तेरे द्वारा ज्ञानाग्नि की ये ज्वालायें चमक उठती हैं । [२] ये ज्वालायें ही वस्तुतः (धामभिः) = अपने तेजों से (पवित्रम्) = पवित्र हृदय को (वितन्वते) = विस्तृत करती हैं। ज्ञानदीप्त होकर के हृदय को पवित्र करता है 'नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ' ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम ज्ञान को दीप्त करता है। दीप्त ज्ञान हृदय को पवित्र करता है ।

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    विषय

    सर्वप्रकाशक प्रभु।

    भावार्थ

    हे (सोम) प्रभो ! (तव) तेरी (शुक्रासः) कान्तिमान् (अर्चयः) तेज, रश्मियां ज्वालाएं (दिवः पृष्ठे) सूर्य और भूमि के पृष्ठ पर अपने (धामभिः) तेजों से (पवित्रं वितन्वते) पवित्र प्रकाश करती हैं। इति सप्तमो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शतं वैखानसा ऋषयः॥ १–१८, २२–३० पवमानः सोमः। १९—२१ अग्निर्देवता ॥ छन्दः- १ पादनिचृद् गायत्री। २, ३, ५—८, १०, ११, १३, १५—१७, १९, २०, २३, २४, २५, २६, ३० गायत्री। ४, १४, २२, २७ विराड् गायत्री। ९, १२,२१,२८, २९ निचृद् गायत्री। १८ पाद-निचृदनुष्टुप् ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, the mighty sublime radiations of your glory extend over the top of heaven and on the earth, spreading the holy light by their beauty and lustre.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वराची ज्योती सर्वत्र दीप्तिमान आहे. प्रत्येक कणात त्याचा प्रकाश असतो. द्युलोकात त्याचा प्रकार या प्रकारे पसरलेला आहे. जसे कोळ्याच्या तंतूच्या आतान वितानाची सीमा जाणता येत नाही. त्याचप्रकारे त्याची सीमा जाणता येत नाही.

    टिप्पणी

    मयूरपंखाच्या शोभेप्रमाणे त्याच्या द्युलोकाची शोभा ही अनंत प्रकारची आहे. ज्या शोभेला परमात्मज्योतीने देदीप्यमान केलेले आहे. ॥५॥

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