ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 66/ मन्त्र 18
ऋषिः - शतं वैखानसाः
देवता - अग्निः
छन्दः - पादनिचृदनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
त्वं सो॑म॒ सूर॒ एष॑स्तो॒कस्य॑ सा॒ता त॒नूना॑म् । वृ॒णी॒महे॑ स॒ख्याय॑ वृणी॒महे॒ युज्या॑य ॥
स्वर सहित पद पाठत्वम् । सो॒म॒ । सूरः॑ । आ । इषः॑ । तो॒कस्य॑ । सा॒ता । त॒नूना॑म् । वृ॒णी॒महे॑ । स॒ख्याय॑ । वृ॒णी॒महे॑ । युज्या॑य ॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वं सोम सूर एषस्तोकस्य साता तनूनाम् । वृणीमहे सख्याय वृणीमहे युज्याय ॥
स्वर रहित पद पाठत्वम् । सोम । सूरः । आ । इषः । तोकस्य । साता । तनूनाम् । वृणीमहे । सख्याय । वृणीमहे । युज्याय ॥ ९.६६.१८
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 66; मन्त्र » 18
अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 10; मन्त्र » 3
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अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 10; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(सोम) जगदीश ! (त्वम्) भवन्तं (युज्याय सख्याय) योग्यमित्रतायै (वृणीमहे) वयं वृणुमः। कथम्भूतं त्वां वृणुमो वयं तथाहि (सूरः) सर्वप्रेरकोऽसि (इषः) सर्वैश्वर्यप्रदोऽसि। अथ च (तोकस्य) पुत्रस्य (तनूनाम्) शरीरत उत्पन्नानां पुत्रपौत्रादीनां (साता) दातासि ॥१८॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(सोम) हे परमात्मन् ! (त्वम्) तुमको हम (युज्याय-सख्याय) योग्य सख्य के लिए (वृणीमहे) हम वरण करें। तुम कैसे हो ? (सूरः) सर्वप्रेरक हो (इषः) सब ऐश्वर्य देनेवाले हो और (तोकस्य) पुत्र के (तनूनाम्) शरीर से उत्पन्न पुत्रादिकों के (साता) देनेवाले हो। उक्त गुणसंपन्न आपको (आवृणीमहे) हम भली-भाँति स्वीकार करते हैं ॥१८॥
भावार्थ
इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वोपरि मित्ररूप से कथन किया गया है। वस्तुतः मित्र शब्द के अर्थ स्नेह करने के हैं। वास्तव में परमात्मा के बराबर स्नेह करनेवाला कोई नहीं है। इसी भाव को “त्वं वा अहमस्मि भवो देवते अहं वा त्वमसि” इस उपनिषद् में भली-भाँति वर्णन किया है कि तू मैं और मैं तू हूँ। अर्थात् मैं आपके निष्पाप आदि गुणों को धारण करके शुद्ध आत्मा बनूँ ॥१८॥
विषय
सख्याय युज्याय
पदार्थ
[१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! (त्वम्) = तू (सूरः) = उत्तम कर्मों में प्रेरित करनेवाला है [ सू प्रेरणे], (इषः आसाता) = प्रेरणाओं को प्राप्त करानेवाला है, हृदय को निर्मल करके प्रभु प्रेरणाओं को तू ही प्राप्त कराता है। (तोकस्य साता) = सब वृद्धियों का तू दाता है, (तनूनाम्) = शरीरों का तू देनेवाला है। शरीरों को यह सोम ही तो नीरोग करता है। [२] तुझे हम (सख्याय) = उस प्रभु से मित्रता के लिये (वृणीमहे) = वरते हैं । युज्याय उस प्रभु से सदा मेल के लिये (वृणीमहे) = वरते हैं । तेरे रक्षण से ही हम उस प्रभु को पानेवाले बनते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ- यह सोम शरीरों को नीरोगता बनाता है । ऋषिः - शतं वैखानसाः ।
विषय
प्रभु को मित्र-भाव के लिये वरण।
भावार्थ
हे (सोम) जगत् के शासन करने हारे ! सब के सञ्चालक ! परमैश्वर्यवन् ! प्रभो ! (त्वं) तू (सूरः) उत्तम वीर्यवान्, सब का प्रेरक, सूर्य के समान तेजस्वी, सब का उत्पादक है तू (तोकस्य तनूनाम्) पुत्र और वंशकर्त्ता पौत्रों का भी (साता) देने वाला है। तुझे हम (सख्याय वृणीमहे) मित्रभाव के लिये वरते हैं और तुझे (युज्याय वृणीमहे) अपने सहायक साथी रूप से वरते हैं।
टिप्पणी
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शतं वैखानसा ऋषयः॥ १–१८, २२–३० पवमानः सोमः। १९—२१ अग्निर्देवता ॥ छन्दः- १ पादनिचृद् गायत्री। २, ३, ५—८, १०, ११, १३, १५—१७, १९, २०, २३, २४, २५, २६, ३० गायत्री। ४, १४, २२, २७ विराड् गायत्री। ९, १२,२१,२८, २९ निचृद् गायत्री। १८ पाद-निचृदनुष्टुप् ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O brave and generous Soma, you are the giver of food, energy, honour and excellence, you are the giver of children and grand children. We pray for your favour of friendship, we cherish you for companionship.
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात परमात्मा सर्वश्रेष्ठ मित्र असल्याचे कथन आहे. मित्र शब्दाचा अर्थ स्नेह असा आहे. परमेश्वरासारखा स्नेह करणारा दुसरा कुणी नाही. याचे उपनिषदात चांगले वर्णन आहे. ‘‘त्वं वा अहमस्मि भवोदेवते अहं वा त्वमसि’’ तू मी व मी तू आहेस अर्थात् मी तुझे निष्पाप इत्यादी गुण धारण करून शुद्धात्मा बनावे. ॥१८॥
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