ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 66/ मन्त्र 27
ऋषिः - शतं वैखानसाः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - विराड्गायत्री
स्वरः - षड्जः
पव॑मानो॒ व्य॑श्नवद्र॒श्मिभि॑र्वाज॒सात॑मः । दध॑त्स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठपव॑मानः । वि । अ॒श्न॒व॒त् । र॒श्मिऽभिः॑ । वा॒ज॒ऽसात॑मः । दध॑त् । स्तो॒त्रे । सु॒ऽवीर्य॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
पवमानो व्यश्नवद्रश्मिभिर्वाजसातमः । दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम् ॥
स्वर रहित पद पाठपवमानः । वि । अश्नवत् । रश्मिऽभिः । वाजऽसातमः । दधत् । स्तोत्रे । सुऽवीर्यम् ॥ ९.६६.२७
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 66; मन्त्र » 27
अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
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अष्टक » 7; अध्याय » 2; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(वाजसातमः) आध्यात्मिकबलदः परमेश्वरस्तथा (रश्मिभिः) स्वशक्तिभिः (व्यश्नवत्) सर्वान्स्वायत्ते कुर्वन् सः (पवमानः) पविता जगदीशः (स्तोत्रे) वेदाध्ययनशीलेभ्यः (सुवीर्यम्) ब्रह्मवर्चः (दधत्) प्रददाति ॥२७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(वाजसातमः) आध्यात्मिक बल देनेवाला परमात्मा, जो (रश्मिभिः) अपनी शक्तियों से (व्यश्नवत्) सबको स्वाधीन किये हुए है, वह (पवमानः) सबको पवित्र करनेवाला ईश्वर (स्तोत्रे) वेदाध्ययनशीलों में (सुवीर्यम्) ब्रह्मवर्चस का (दधत्) प्रदान करता है ॥२७॥
भावार्थ
स्वयंज्योति परमात्मा से ही विद्वानों को ब्रह्मवर्चस मिलता है, इसलिए एकमात्र उसी ईश्वर की उपासना करनी चाहिए ॥२७॥
विषय
'वाजसातम' सोम
पदार्थ
[१] (पवमानः) = यह सोम हमारे जीवन को पवित्र करनेवाला है। यह (रश्मिभिः) = ज्ञान की किरणों से इसे (व्यश्नवत्) = व्याप्त करता है । (वाजसातम:) = अधिक से अधिक शक्ति को देनेवाला है। [२] यह सोम (स्तोत्रे) = प्रभु स्तवन करनेवाले के लिये सुवीर्यं दधत् उत्तम शक्ति को धारण करता है।
भावार्थ
भावार्थ- सोम जीवन को शक्ति व ज्ञानरश्मियों से व्याप्त करता है ।
विषय
उसके कर्त्तव्य। उत्तम वीर्यः धारण करे, दयालु हो। पक्षान्तर में इन्द्र प्रभु, की परस्पर प्राप्ति।
भावार्थ
(पवमानः) अभिषेक को प्राप्त होने वाला, (वाज-सातमः) ज्ञान, बल, धन का सर्वोत्तम दाता, आदाता और विभक्ता पुरुष (रश्मिभिः) रश्मियों से (वि अश्ववत्) विशेष रूप से व्यापे और वह (स्तोत्रे) स्तुति, उपदेशादि करने वाले के हितार्थ (सुवीर्यं दधत्) उत्तम वीर्य को धारण करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शतं वैखानसा ऋषयः॥ १–१८, २२–३० पवमानः सोमः। १९—२१ अग्निर्देवता ॥ छन्दः- १ पादनिचृद् गायत्री। २, ३, ५—८, १०, ११, १३, १५—१७, १९, २०, २३, २४, २५, २६, ३० गायत्री। ४, १४, २२, २७ विराड् गायत्री। ९, १२,२१,२८, २९ निचृद् गायत्री। १८ पाद-निचृदनुष्टुप् ॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Pure and purifying, omnipresent with its radiations of self- refulgence, omnipotent giver of strength, power and advancement, inspirer of the celebrants and celebrations with divine bliss and energy, such is Soma.
मराठी (1)
भावार्थ
स्वयंज्योती परमात्म्याकडूनच विद्वानांना ब्रह्मवर्चस मिळते त्यासाठी त्याच एकमेव परमेश्वराची उपासना केली पाहिजे. ॥२७॥
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