ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 96/ मन्त्र 7
ऋषिः - प्रतर्दनो दैवोदासिः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
प्रावी॑विपद्वा॒च ऊ॒र्मिं न सिन्धु॒र्गिर॒: सोम॒: पव॑मानो मनी॒षाः । अ॒न्तः पश्य॑न्वृ॒जने॒माव॑रा॒ण्या ति॑ष्ठति वृष॒भो गोषु॑ जा॒नन् ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । अ॒वी॒वि॒प॒त् । वा॒चः । ऊ॒र्मिम् । न । सिन्धुः॑ । गिरः॑ । सोमः॑ । पव॑मानः । म॒नी॒षाः । अ॒न्तरिति॑ । पश्य॑न् । वृ॒जना॑ । इ॒मा । अव॑राणि । आ । ति॒ष्ठ॒ति॒ । वृ॒ष॒भः । गोषु॑ । जा॒नन् ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रावीविपद्वाच ऊर्मिं न सिन्धुर्गिर: सोम: पवमानो मनीषाः । अन्तः पश्यन्वृजनेमावराण्या तिष्ठति वृषभो गोषु जानन् ॥
स्वर रहित पद पाठप्र । अवीविपत् । वाचः । ऊर्मिम् । न । सिन्धुः । गिरः । सोमः । पवमानः । मनीषाः । अन्तरिति । पश्यन् । वृजना । इमा । अवराणि । आ । तिष्ठति । वृषभः । गोषु । जानन् ॥ ९.९६.७
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 96; मन्त्र » 7
अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 7; मन्त्र » 2
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अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 7; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
स परमात्मा (वाचः, ऊर्मिं) वाण्या तरङ्गान् (सिन्धुः, न) यथा सिन्धुः स्ववीचीः तथा (प्र अवीविपत्) कम्पयति (सोमः) स एव (पवमानः) सर्वपावकः (मनीषाः) मनसोऽपि प्रेरकः (अन्तः, पश्यन्) सर्वान्तर्यामी भवान् (वृजना) अस्मिन् संसाररूपयज्ञे (इमा, अवराणि, आ, तिष्ठति) इमानि प्रकृतिकार्याणि आश्रयते यथा (वृषभः) सर्वबलप्रदः जीवात्मा (जानन्) चेतनरूपेण अधिष्ठातृत्वं सम्पाद्य (गोषु) इन्द्रियेषु विराजते ॥७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
वह परमात्मा (वाज ऊर्मिम्) वाणी की लहरों को (सिन्धुर्न) जैसे कि सिन्धु (प्रावीविपत्) कम्पाता है, इसी प्रकार से कम्पाता है। (सोमः) वह सोमरूप परमात्मा (पवमानः) सबको पवित्र करता है। (मनीषाः) मन का भी प्रेरक है। (अन्तः पश्यन्) सबका अन्तर्यामी होकर (वृजना) इस संसाररूपी यज्ञ में (इमा अवराणि आतिष्ठति) इन प्रकृति के कार्य्यों को आश्रयण करता है। जिस प्रकार (वृषभः) सब बल को देने वाला जीवात्मा (जानन्) चेतनरूप से अधिष्ठाता बनकर (गोषु) इन्द्रियों में विराजमान होता है ॥७॥
भावार्थ
परमात्मा सबका अन्तर्यामी है। वह सर्वान्तर्यामी होकर सर्वप्रेरक है, “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्यामन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः” इत्यादि वाक्य उक्त वेद के आधार पर निर्माण किये गये हैं ॥७॥
विषय
उत्तम शासक उपदेष्टा और आत्मा का वर्णन
भावार्थ
(पवमानः सोमः) सब को प्रेरित करने वाला, सब के दोष दूर करने वाला, उत्तम शासक (सिन्धुः ऊर्मि न) तरंग को बड़े नदी प्रवाह के तुल्य (वाचः ऊर्भिम्ः) वाणी के उत्तम ज्ञान को प्रकट करता है। वह (गिरः) नाना उपदेशों और (मनीषाः प्रावीविपद्) उत्तम बुद्धियों को भी प्रकट करता है। वह (जानन्) ज्ञानवान् आत्मा (गोषु वृषभः) गौओं में बलशाली वीर्यदायक सांड के समान, (गोषु) इन्द्रियगण में (वृषभः) बलदायक है। वही (अन्तः पश्यन्) भीतर को देखता हुआ (इमा) इन (अवरा) अवरणीय, अपने अधीन, गौण (वृजना) अनेक आत्मिक बलों और सैन्यों को राजा के तुल्य (आतिष्ठति) धारण करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रतदनो दैवोदासिर्ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:- १, ३, ११,१२, १४, १९, २३ त्रिष्टुप्। २, १७ विराट् त्रिष्टुप्। ४—१०, १३, १५, १८, २१, २४ निचृत् त्रिष्टुप्। १६ आर्ची भुरिक् त्रिष्टुप्। २०, २२ पादनिचृत् त्रिष्टुप्॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्॥
विषय
अन्तः पश्यन्
पदार्थ
(पवमानः) = जीवन को पवित्र करता हुआ (सोमः) = सोम (वाचः) = ज्ञान की वाणियों को और (मनीषाः) = बुद्धियों को (प्रावीविषत्) = इस प्रकार प्रेरित करता है, (न) = जैसे कि (सिन्धुः) = समुद्र (ऊर्मिम्) = लहरों को प्रेरित करता है । सोमरक्षण से हमारे जीवन में बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का विकास होता है । यह (वृषभः) = शक्तिशाली सोम (गोषु जानन्) = ज्ञान की वाणियों में तत्त्वज्ञान वाला होता हुआ, (अन्तः पश्यन्) = विषय व्यावृत्त होकर अन्तर्मुखी वृत्ति वाला होता हुआ (इमा) = इन (अवराणि) = [न निवारवितुं शक्यानि] (अधर्षणीय वृजना) = बलों का (आतिष्ठति) = अधिष्ठाता होता है । सोम से ज्ञान बढ़ता है, वृत्ति बहिर्मुखी न होकर अन्तर्मुखी होती है। शत्रुओं से अधर्षणीय शक्ति प्राप्त होती है ।
भावार्थ
भावार्थ- सोम ज्ञान की वाणियों व बुद्धियों को हमारे में प्रेरित करता है। अधर्मणीय बलों को प्राप्त कराता है। हमें अन्तर्मुखी वृत्ति वाला बनाता है।
इंग्लिश (1)
Meaning
Soma stirs and inspires the flow of thought into speech as the sea stirs and rolls the waves of the flood. Pure and purifying, it inspires imagination, poetry and adoration. Pervading all within and watching, it abides in the closest intimacies of all yajna within and without and, potent as it is, knowing every thing, it energises all organs of thought and sense.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्मा सर्वांचा अंतर्यामी आहे. तो सर्वांतर्यामी व सर्व प्रेरक आहे ‘य: पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो ‘‘यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं य: पृथिवी मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत:’’ (बृहदारण्यक ३.७.३) इत्यादी वाक्ये वरील वेदाच्या आधारावर निर्माण केलेली आहेत. ॥७॥
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